February 26, 2017

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गुरबत, गरीबनवाज और खैरात

गरीबी तब समाप्त होती है किसी देश में जब उससे लड़ने के औजार गरीबों के हाथों में दिए जाते हैं। औजारों की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन दो सबसे महत्त्वपूर्ण औजार हैं- बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं। मसलन, अगर मनरेगा में करोड़ों रुपए खर्च करने के बदले हमने यह पैसा लगाया होता सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को बेहतर बनाने पर तो शायद आज भारत की गिनती विकसित देशों में होती।

Author January 15, 2017 04:06 am
मजदूरी करता एक बालक।

भारत में जितने गरीबनवाज राजनेता हैं, शायद ही किसी और देश में होंगे। नोटबंदी के बाद ऐसे प्रकट हुए हैं ये नेता कि जैसे गरीबों के मसीहा बन कर आए हों। और ऐसे पेश आए हैं जैसे किसी मुकाबले में हिस्सा ले रहे हों, जिसमें सबसे बड़ा पुरस्कार उसको मिलेगा, जो साबित कर सके कि उसके दिल में गरीबों के लिए औरों से ज्यादा दर्द है। इस स्पर्धा में पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं राहुल गांधी, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल। ममताजी ने तो दिल्ली में डेरा डाल रखा है और हर दूसरे-तीसरे दिन दिखती हैं टीवी पर यह कहते हुए कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री रहने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि नोटबंदी के बहाने गरीबों को तकलीफ देने की साजिश रची गई है। राहुल गांधी ने विदेशों में छुट््टी मनाने के बाद वतन वापस आते ही पिछले हफ्ते कह दिया फिल्मी अंदाज में कि ‘राम नाम जपना, गरीबों का माल अपना’। और जिनके राजनीतिक दल का नाम ही आम आदमी पार्टी हो वे आम आदमी की तरफ से दुहाई तो देते फिरेंगे ही।

विपक्षी खेमे से जब ऐसी आवाजें उठने लगीं तो प्रधानमंत्री घबरा से गए और खुद हिस्सा लेने लगे गरीबों के हमदर्द होने के इस अजीब मुकाबले में। नोटबंदी कराने के बाद शायद ही उनका कोई ऐसा भाषण रहा होगा, जिसमें स्पष्ट शब्दों में न कहा हो कि उन्होंने यह कदम उठाया है गरीबों को आगे बढ़ाने और भ्रष्टाचार में लिप्त रईसों को नीचे घसीट कर दंडित करने के लिए। सवाल यह पूछना चाहिए हम जैसे राजनीतिक पंडितों को कि जिस देश में गरीबों के इतने हमदर्द हों उसमें गरीबी क्यों आज तक आम आदमी को तड़पाती है। ऐसा क्यों है कि आज भी भारत की गिनती दुनिया के सबसे गरीब देशों में होती है? इस सवाल का जवाब क्या यह नहीं है कि हमारे रहनुमाओं ने गुरबत में इसीलिए निवेश किया है, संपन्नता में नहीं।

यह परंपरा पुरानी है। याद कीजिए कि महात्मा गांधी ने किस तरह हमेशा कोशिश की अपने आप को गरीबों की तरह पेश करने की। ट्रेन में यात्रा करते थे तो थर्ड क्लास डिब्बे में, लिबास उनका अति-गरीब भारतीय का था उस जमाने में और दलितों के साथ हमदर्दी जताने के लिए उन्होंने शौचालय भी साफ किए अपने हाथों से। उस समय जब भारत की अस्सी फीसद आबादी गरीब और अशिक्षित थी, शायद लोगों को ये बातें अच्छी लगी होंगी, लेकिन क्या आज भी ऐसा करने की जरूरत है? क्या हकीकत यह नहीं है कि हमारे गरीबनवाज राजनेता खुद अक्सर अमीर हो जाते हैं गरीबों से हमदर्दी जताते-जताते?
क्या हकीकत यह नहीं है कि जब मतदाता गुरबत के शिकंजे में जकड़े रहते हैं तो उनको बेवकूफ बनाना आसान होता है। गुरबत के इस शिकंजे में कौन पूछता है अपने राजनेताओं से ऐसे सवाल, जिनके जवाब वे दे नहीं सकते हैं? हम राजनीतिक पंडितों का लेकिन फर्ज बनता है उन सवालों के जवाब मांगना। यथार्थ यह है कि गरीबी तब समाप्त होती है किसी देश में जब उससे लड़ने के औजार गरीबों के हाथों में दिए जाते हैं। औजारों की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन दो सबसे महत्त्वपूर्ण औजार हैं- बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं। मसलन, अगर मनरेगा में लाखों करोड़ों रुपए खर्च करने के बदले हमने यह पैसा लगाया होता सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को बेहतर बनाने पर तो शायद आज भारत की गिनती विकसित देशों में होती।

हमारे राजनेताओं ने इन चीजों में निवेश न करके शुरू से खैरात बांटने पर ज्यादा ध्यान दिया है। मनरेगा जैसी कई अन्य समाज कल्याण योजनाएं हैं, जिनकी उपलब्धि सिर्फ यह रही है कि गरीबों को गरीब रख कर उनको राहत पहुंचाने का काम हुआ है। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मनरेगा का विरोध किया था और गरीबी के गुण गाने के बदले संपन्नता के गुण गाए थे। इसलिए समझना मुश्किल है कि अब अपनी भाषा क्यों बदलते दिखते हैं। क्या उनको भी गरीबी में निवेश करने के फायदे दिखने लगे हैं? क्या उनको भी दिखने लगा है कि गुरबत को जिंदा रखना आसान है और संपन्नता लाना बहुत कठिन? ऐसा हो गया है अगर तो प्रधानमंत्रीजी, विनम्रता से मैं आपको याद दिलाना चाहती हूं कि आपको इस देश की जनता ने पुर्ण बहुमत इसलिए दिया था 2014 में क्योंकि उनको विश्वास था कि आप परिवर्तन और विकास लाकर दिखाएंगे। परिवर्तन और विकास लाने के लिए जरूरी है देश को एक नई दिशा में ले जाने की। इस दिशा में चलने के लिए डिजिटल के अलावा बहुत कुछ करना होगा। कम से कम इतना तो आज दिखना चाहिए कि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं उनमें वे बुनियादी चीजें बेहतर हो गई हों, जिनके बिना जनता को सशक्त करना बिल्कुल असंभव है।

जनता सशक्त तब होगी जब शिक्षित और स्वस्थ होगी और जब उसके पास वे बुनियादी चीजें होंगी, जो डिजिटल से ज्यादा जरूरी हैं- आवास, बिजली, पीने लायक पानी। दुनिया के जो देश गरीबी खत्म करने में सफल रहे हैं उनमें आम लोगों के पास ये चीजें होती हैं हमेशा। समानता लाने की इतनी जरूरत नहीं है जितनी हर देशवासी को आगे बढ़ने के लिए बराबर के अवसर उप्लब्ध कराना जरूरी है। भारत अगर आगे नहीं बढ़ा है उस रफ्तार से जितना उसे बढ़ना चाहिए था तो सिर्फ इसलिए कि हमने गरीबों को सशक्त करने के बदले उन्हें खैरात देने का काम किया है। खैरात बांट कर किसी देश ने गरीबी को समाप्त करने में सफलता हासिल नहीं की है।

 

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First Published on January 15, 2017 4:06 am

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