February 26, 2017

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वक्त की नब्ज: नोटबंदी का उत्तरपक्ष

नोटबंदी के बाद और जनता ने अभी तक धीरज और सब्र से बर्दाश्त किया है इस फैसले को, बावजूद इसके कि घंटों इंतजार करने के बाद कई बार बैंक में पैसे ही खत्म हो जाते हैं

Author December 11, 2016 03:49 am
नोटबंदी से परेशान लोग बैंक के बाहर खड़े हुए।

एक पूरा महीना गुजर गया नोटबंदी के बाद और जनता ने अभी तक धीरज और सब्र से बर्दाश्त किया है इस फैसले को, बावजूद इसके कि घंटों इंतजार करने के बाद कई बार बैंक में पैसे ही खत्म हो जाते हैं। प्रधानमंत्री ने अपने एक भाषण में कहा था यकीन से कि ‘गरीब चैन की नींद सो रहे हैं और अमीर नींद की गोलियां ढूंढ़ते फिर रहे हैं’ उनके इस फैसले के बाद। यथार्थ यह है प्रधानमंत्रीजी, कि आपके इस फैसले से सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी है उन लोगों को, जिनके पास काला धन होने का सवाल ही नहीं है। इतनी थोड़ी है इन लोगों की कमाई कि एक दिन की दिहाड़ी बर्बाद हो जाए तो घर में चूल्हा नहीं जलता है। इसके बावजूद अभी तक सब्र-शांति दिखाई है इस देश के आम आदमी ने।  अब लेकिन ऐसा लगने लगा है कि उनके धीरज का बांध टूटने लगा है। पिछले हफ्ते मैं गोवा में थी और अरविंद केजरीवाल का बड़ा सारा पोस्टर देखते मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर से आने वाले चुनावों के बारे में पूछा। उसने इन शब्दों में जवाब दिया- ‘जी मैंने पिछली बार भाजपा को वोट दिया और इस बार भी दूंगा, लेकिन सच तो यह है कि मोदी की लोकप्रियता कम हो गई है उनके इस फैसले से।’

‘अच्छा?’ ‘जी। इसलिए कि लोगों को लग रहा है कि सारी परेशानी वे लोग झेल रहे हैं, जिनके पास काला धन है ही नहीं। और जिनके पास है वे आराम से अपना काम चला रहे हैं। आपको पता है कि कल गोवा में पुलिस ने एक ट्रक पकड़ा, जिससे एक करोड़ से ज्यादा नए नोट बरामद हुए हैं। कहां से आ रहा है यह पैसा, जब बैंकों के पास नहीं है। मैंने घंटों लाइन में लगने के बाद एक नोट पाया दो हजार रुपए का, जिसको कोई लेता नहीं है, क्योंकि किसी के पास छुट्टा नहीं है।’  इस तरह की कहानियां देश भर से अब सुनने को मिल रही हैं और उधर प्रधानमंत्री हैं, जो दावा कर रहे हैं कि गरीब चैन की नींद सो रहे हैं और अमीर परेशान हैं। खैर, अब जो हो गया, सो हो गया। अब देखना होगा कि आम लोगों की परेशानियां दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। इस महीने के आखिर तक पचास दिन पूरे हो जाएंगे और अगर उसके बाद भी जनता को परेशानियां झेलनी पड़ेंगी, तो मोदी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं बेहिसाब। ऐसा भी लगने लगा है कि उनके सलाहकारों ने प्रधानमंत्री को इंटरनेट की स्थिति के बारे में सही जानकारी नहीं दी, वरना मोदी इतनी आसानी से न कहते फिरते आम सभाओं में कि समय आ गया है जब सेलफोन बन जाएंगे बैंक। क्या वे जानते नहीं हैं कि भारत के ज्यादातर हिस्सों में इंटरनेट के सिग्नल इतने कमजोर हैं कि न होने के बराबर? क्या जानते नहीं हैं मोदी कि बैंक खातों से गरीबों के पैसे गायब हो जाते हैं?

पिछले हफ्ते उत्तराखंड से मैंने सुनी सोनिया नाम की एक गरीब महिला की कहानी। उसने अपने खाते में बीस हजार रुपए जमा किए थे बड़े शौक से, लेकिन जब पैसे निकालने गई तो मालूम पड़ा कि उसके खाते से पैसे गायब हो गए थे। बैंक अधिकारियों के पास जब शिकायत करने गई, तो उनका जवाब बस इतना था कि ‘गलती हो गई’। ऐसी गलतियां न जाने कितनी बार होती होंगी, उन देहाती क्षेत्रों में, जहां बैंकों के तौर-तरीके भी कच्चे हैं और बैंक के ग्राहकों को भी इन चीजों की जानकारी कम है। प्रधानमंत्री खुशकिस्मत हैं कि विपक्ष ने रणनीति अपनी इतनी गलत बनाई कि संसद का पूरा स्तर बेकार गया। चर्चा होने देते अगर नोटबंदी पर तो कई सवाल उठते, जिनका जवाब शायद सरकार न दे पाती। आखरी दिन जब बेकार गया तो राहुल गांधी ने बड़े शान से पत्रकारों को कहा कि अगर उनको लोकसभा में बोलने का मौका मिलता तो वे ऐसी बातें कहने वाले थे, जिनसे भूकम्प आ जाता। काश कि उन्होंने संसद के बाहर तमाशे के बजाय संसद के अंदर चर्चा करने की रणनीति अपनाई होती।

मोदी सरकार की समस्याएं वैसे भी बढ़ गर्इं थीं पिछले हफ्ते कि कर्नाटक से खबर आई जनार्दन रेड््डी के ड्राइवर की आत्महत्या की। अपनी जान लेने से पहले इस गरीब ने एक पत्र लिख कर स्पष्ट किया कि वह डर के मारे आत्महत्या कर रहा है, इसलिए कि उसके पास जानकारी थी कि बेल्लारी के इस धनवान ने किस तरह अपने पुराने नोट नए नोटों में बदलवाए अपनी बेटी की शादी के लिए। बेटी की शादी शान से हुई नोटबंदी के बाद, सो सारे देश में लोग वैसे भी पूछ रहे थे कि भाजपा के इस समर्थक के पास इतने पैसे कहां से आए, जब आम लोगों को राशन करके दिए जा रहे थे। शुरू में नोटबंदी के समर्थक बहुत थे मध्यवर्ग में और गरीबों में भी। शायद अब भी होते अगर इतने ट्रक न पकड़े जाते नए नोटों से भरे हुए और ऐसा दिखने न लगता कि भारत के अमीर नागरिकों को नोटबंदी से कोई खास तकलीफ नहीं पहुंची है। ज्यादातर उन लोगों को कोई परेशानी नहीं हुई है, जिनके पास के्रडिट कार्ड पहले से थे, लेकिन गरीबों के पास न क्रेडिट कार्ड हैं अभी तक और न ही उनको बैंक में जाने की आदत है। ज्यादातर भारतवासी ऐसे हैं, जिन्होंने कभी एटीम से अपना पैसा नहीं निकाला है।प्रधानमंत्री इन लोगों का हाल देखते तो कभी न कहते कि गरीब नोटबंदी के बाद चैन की नींद सो रहे हैं और अमीर नींद की गोलियां ढूंढ़ते फिर रहे हैं। यथार्थ बिलकुल उलटा है।

 

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First Published on December 11, 2016 3:49 am

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