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वक़्त की नब्ज़ : उम्मीद की सूरत

पर्यटन ने कई देशों को गुरबत से निकाल कर अमीर बना दिया है। सो, अगर हमारे शासकों ने बहुत पहले से विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिश की होती, तो संभव है कि बनारस जैसे शहर बहुत पहले स्वच्छ हो गए होते और शायद गंगा भी मैली न होती।
Author नई दिल्ली | January 8, 2017 01:23 am
World Tourism Day 2016: पूर्व के वेनिस के नाम से मशहूर यह शहर देश के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक है।

पर्यटन ने कई देशों को गुरबत से निकाल कर अमीर बना दिया है। सो, अगर हमारे शासकों ने बहुत पहले से विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिश की होती, तो संभव है कि बनारस जैसे शहर बहुत पहले स्वच्छ हो गए होते और शायद गंगा भी मैली न होती। पिछले हफ्ते मुझे भारत सरकार के एक आला अधिकारी ने नाश्ते पर बुलाया। निमंत्रण देते वक्त इमेल में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय में काम करते हैं और मेरा एक लेख पढ़ने के बाद उन्होंने मेरे साथ बात करने का फैसला किया था। मैंने उस लेख में लिखा था कि स्वच्छ भारत का विचार है बड़ा अच्छा, लेकिन अभी तक वह विचार ही है, यथार्थ नहीं। हुआ यह था कि 2016 के आखिरी दिन मैंने समुद्र किनारे महाराष्ट्र के एक गांव में बिताए थे और रोज जब घूमने निकलती थी बीच पर, मुझे दिखते थे गांव के लोग खुले में शौच करते हुए। बेझिझक बैठे रहते थे ये लोग, बिना इस बात की परवाह किए कि बीच पर गांव के बच्चे खेला करते थे और बाहर से पर्यटक भी आए हुए थे। यानी कि मछुआरों के इन गांवों में खुले में शौच करने की परंपरा इतनी पुरानी है कि प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान का कोई असर नहीं पड़ा इस पर और न ही अमिताभ बच्चन के टीवी इश्तिहारों से ये लोग प्रभावित दिखे। इन चीजों को देख कर मैंने अपना लेख लिखा था।

सो, जब मुलाकात हुई भारत सरकार के इस अधिकारी से तो मैंने उनको बताया कि किस आधार पर मैंने अपना लेख लिखा था। उन्होंने गांव का नाम पूछा और अपने फोन पर एक ऐप खोला, जिसे देखने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि इस गांव से उनको खबर मिली है कि छियासी फीसद लोग अब खुले में शौच नहीं करते हैं। बातचीत का सिलसिला यहां से शुरू हुआ तो उन्होंने मुझे जानकारी दी कि इस अभियान की देखरेख प्रधानमंत्री खुद करते हैं, सो उनका मंत्रालय युद्ध स्तर पर काम कर रहा है और पिछले एक साल में इतना काम किया है कि जहां भारत के सिर्फ बीस हजार गांव ऐसे थे, जिनमें खुले में शौच करने वालों से मुक्ति मिली थी, अब एक लाख चालीस हजार तक पहुंच चुकी है ऐसे गांवों की संख्या।

इस आला अधिकारी ने फिर मुझे एक डिजिटल नक्शा दिखाया, जिस पर दो ही राज्य ऐसे दिखे, जहां अभी तक स्वच्छ भारत का असर इतना थोड़ा पड़ा है कि आज भी सत्तर फीसद से ज्यादा लोग खुले में शौच करते हैं- बिहार और ओड़िशा। डिजिटल नक्शे में इन दोनों को लाल रंग से दिखाया गया था और बाकी देश को हल्के हरे रंग में और गाढ़े हरे रंग में। गाढ़े हरे रंग वाले वे थे, जहां सड़सठ से निन्यानबे फीसद तक लोगों ने खुले में शौच करना बंद कर दिया है, लेकिन ज्यादातर देश ऐसा है, जहां आज भी स्वच्छ भारत अभियान का इतना कम असर पड़ा है कि अनुमान लगाया जाता है कि चालीस करोड़ से ज्यादा भारतवासी आज भी खुले में शौच करते हैं।

स्वच्छ भारत अभियान की अहमियत यह है कि अगर यह कामयाब होता है तो मुमकिन है कि भारत के वे बच्चे, जो पांच साल की उम्र से पहले ही मर जाते हैं, वे शायद जिंदा रहेंगे। हाल यह है इस देश के बच्चों का कि ज्यादातर ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जो गंदगी से पैदा होती हैं। गंदी आदतें हैं तो हमारी ढेर सारी, लेकिन इनमें सबसे गंदी आदत है खुले में शौच की। ऐसा कोई भी सभ्य देश नहीं है दुनिया में, जहां ऐसा होता है। सो, हमारे देश में जहां प्रधानमंत्री इन दिनों डिजिटल सपने दिखाते नहीं थकते हैं, हम किस मुंह से डिजिटल होने की बातें कर सकते हैं, जब हमारे आधे से ज्यादा लोग अभी तक सीखे ही नहीं हैं कि शौचालय नाम की चीज क्या है।

यथार्थ लेकिन यह भी है कि हम इतनी पुरानी परंपरा को तोड़ेंगे कैसे। मैंने जब इसका जिक्र आला अधिकारी से किया, उन्होंने स्वीकार किया कि समस्या गंभीर है, लेकिन आगे यह भी बताया कि उनकी रणनीति भी तगड़ी है। सो, खास ध्यान दिया जा रहा है उन शहरों-गांवों पर, जो गंगा की किनारे हैं। यहां अगर स्वच्छ भारत सफल होता है तो गंगा में मल कम हो जाएगा। यहां मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब बनारस को ही हम गंदगी-मुक्त नहीं कर सके हैं अभी तक, तो क्या फायदा है स्वच्छता के सपने देखने का। इस पर उन्होंने मुझे बताया कि उनके मंत्रालय में एक-दूसरी योजना पर भी काम हो रहा है, जिसके तहत सौ ऐसे शहरों पर सफाई का खास अभियान चलाया जाएगा, जहां तीर्थयात्री आते हैं बड़ी संख्या में। इनमें बनारस की भी गिनती है, तिरुपति की भी और जगन्नाथ पुरी की भी।

इस आला अधिकारी की बातें सुन कर मुझे निजी तौर पर बहुत अच्छा लगा, इसलिए कि मैं अपने लेखों में कई बार लिख चुकी हूं कि प्राचीन विरासत का जो भंडार भारत में है, वह शायद ही किसी दूसरे देश में मिलेगा। हमारे मंदिर और बनारस जैसे शहरों को देखने अब भी विदेशों से पर्यटक जब आते हैं भारी संख्या में, तो अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि इनकी संख्या कितनी बढ़ जाएगी, जब हम इन शहरों और मंदिरों में स्वच्छ भारत का असर दिखा सकेंगे। पर्यटन ने कई देशों को गुरबत से निकाल कर अमीर बना दिया है। सो, अगर हमारे शासकों ने बहुत पहले से विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिश की होती, तो संभव है कि बनारस जैसे शहर बहुत पहले स्वच्छ हो गए होते और शायद गंगा भी मैली न होती। पर्यटन पर हमारे समाजवादी शासकों ने ध्यान सिर्फ इसलिए नहीं दिया, क्योंकि उनकी वामपंथी नजर में ऐसी चीजें अमीर देशों के लिए ही होती हैं। इन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि पर्यटन से अर्थव्यवस्था में कितना परिवर्तन आ सकता है। सो, स्वच्छ भारत की सफलता की दुआ हम सबको मांगनी चाहिए और इसमें हिस्सा भी सबको लेना होगा।

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  1. जय
    Jan 9, 2017 at 12:56 pm
    अब तो अच्छे दिन आ गये यूपी बिहार तो २७ साल से कांग्रेस मुक्त हैं
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग