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‘वक्त की नब्ज’ कॉलम में तवलीन सिंह का लेख : एक सार्थक कदम

इस उपमहाद्वीप में अमन-शांति तभी बहाल होगी, जब हम पाकिस्तान की नजरों में साबित कर सकेंगे कि भारत जब चाहे आक्रमण का जवाब आक्रमण से दे सकता है।
Author October 2, 2016 03:56 am
पांच प्वाइन्ट में समझिए, भारत के लिए क्या है सर्जिकल स्ट्राइक के मायने (फोटो-PTI)

मेरा मानना है कि इस उपमहाद्वीप में अमन-शांति तभी बहाल होगी, जब हम पाकिस्तान की नजरों में साबित कर सकेंगे कि भारत जब चाहे आक्रमण का जवाब आक्रमण से दे सकता है। अभी तक हमने हर आक्रमण का जवाब सिर्फ संयम से दिया है और अमन-शांति के आसार तक दिखने नहीं लगे हैं। इसलिए निजी तौर पर बहुत अच्छा लगा मुझे पिछले हफ्ते जब प्रधानमंत्री ने राजनीतिक दिलेरी और दृढ़ता दिखा कर सीमा पार भेजे हमारे जांबाज जवान जिहादी अड्डों पर हमला करने। दुआ कीजिए कि हम आइंदा हर हमले का जवाब इसी तरह देते रहेंगे। इसलिए कि पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति ऐसे जरनैलों के हाथों में है, जिनको विश्वास है कि भारत ने कभी पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया है। ऐसी बातें मैंने बहुत बार सुनी हैं पाकिस्तान में और साथ-साथ यह भी सुना है कि हम बुतपरस्त हिंदुओं की रगों में कायरता दौड़ती है, दिलेरी नहीं।

कुछ साल पहले मेरी मुलाकात जरनैल हमीद गुल से हुई थी, जो आइएसआइ के अध्यक्ष थे, जब 1993 में मुंबई शहर में आइएसआइ ने शृंखलाबद्ध विस्फोट करवाए थे। जरनैल साहब रिटायर हो चुके थे, जब मैं उनसे मिली रावलपिंडी में, लेकिन उनको अब भी अपने आइएसआइ वाले दौर की बातें करने की इच्छा थी। सो, इनसे जब मैंने मुंबई के विस्फोटों का जिक्र किया तो उनके चेहरे पर एक अजीब मुस्कुराहट फैल गई, जैसे उनको गर्व था कि उन्होंने इतना बड़ा नुकसान किया था कभी भारत को। इन विस्फोटों के कारण 257 बेगुनाह लोग मारे गए थे, मार्च 12, 1993 के दिन। बातों-बातों में जरनैल साहब ने मेरे सिख होने की बात छेड़ी और कहा कि अच्छा होता अगर 1947 में सिख पाकिस्तान में ही रह जाते। स्पष्ट किया उन्होंने कि उनकी नजरों में भारतीय सेना में सिर्फ सिख सिपाही हैं, जो उनके मुसलमान सिपाहियों का मुकाबला कर सकते हैं।

हिंदुओं की तथाकथित कायरता की बातें मैंने बहुत बार सुनी है पाकिस्तान में और जब भी हमने जिहादी हमलों का जवाब अमन-शांति की बातों से दिया है, हमने संदेश यही भेजा है कि हम वास्तव में कायर हैं। सो, उड़ी वाले हमले के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कई बार धमकी दी है कि भारत अगर पाकिस्तान पर हमला करता है, तो उसका जवाब परमाणु हथियारों से दिया जाएगा। हमारे रक्षामंत्री ने कहा तो था कि हम ऐसी परमाणु धमकियों से डरते नहीं हैं, लेकिन जब तक पिछले सप्ताह मालूम नहीं हुआ कि हमारी सेना ने सीमा पार जिहादी अड्डों पर हमला किया और बिना जान के नुकसान के वापस आए हैं तब तक यकीन नहीं हुआ मुझे कि हममें ऐसा करने की शक्ति है।
अभी तक हमारे पूर्व प्रधानमंत्री हर जिहादी हमले के बाद बातें बड़ी-बड़ी करते आए हैं, लेकिन जवाबी हमला करके कभी नहीं दिखाया है। 1999 के आखिरी दिनों में जब आइसी 814 को अगवा किया गया काठमांडो से तो अटल बिहारी वाजपेयी ने मौलाना मसूद अजहर और उमर शेख जैसे खूंखार जिहादियों को रिहा किया आइसी 814 के यात्रियों के बदले। हिम्मत होती तो हम इनको रिहा करने के बाद ढूंढ़ निकाल कर मार सकते थे, लेकिन ऐसा हमने नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि मौलाना मसूद अजहर की जैश-ए-मोहम्मद तंजीम ने भारतीय संसद पर हमला किया दो साल बाद और तब भी हमने कुछ नहीं किया।

फिर 26/11 वाले हमले के बाद हमारे पास एक और मौका आया पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने का, लेकिन हमने इस बार भी कुछ नहीं किया। हमारे गृहमंत्री ने कई बार सबूत पेश किए पाकिस्तान के शासकों को और दुनिया के बड़े राजनेताओं को भी, लेकिन इसके आगे नहीं बढ़े। सो, लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद आराम से आज भी है लाहौर स्थित अपने मुरीद के मुख्यालय में और खुल कर भारत के खिलाफ नफरत उगलता फिरता है बड़ी-बड़ी सभाओं में। बुरहान वानी की हत्या के बाद हाफिज सईद ने एक आमसभा बुलाई वानी की याद में, जिसमें उसने स्वीकार किया कि बुरहान वानी उनका साथी था। भारत सरकार ने कुछ नहीं किया।

सो, उड़ी वाले हमले के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी ने केरल में ऐसा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और भारत को युद्ध करना चाहिए गरीबी और अशिक्षा के खिलाफ, मुझे यकीन हो गया था कि इस बार भी हमारे राजनेता अमन-शांति की बातें ही करेंगे। मेरे कई पत्रकार बंधुओं को भी ऐसा लगा, सो उन्होंने लंबे-चौड़े संपादकीय लिखे संयम बरतने पर। नसीहतें दी प्रधानमंत्री को कि हमले का जवाब अगर हमले से दिया जाता है, तो परमाणु युद्ध का खतरा है। इन नसीहतों के बावजूद अगर प्रधानमंत्री ने राजनीतिक दृढ़ता दिखाई है, तो बहुत अच्छी बात है। इसलिए कि पाकिस्तान ने हमारे सब्र को कायरता समझा है हर बार, सो जिहादी हमले होते ही गए हैं, जिनमें साफ दिखा है पाकिस्तानी आइएस का हाथ, लेकिन इसके बावजूद हमने सिर्फ संयम बरता है।

अब उम्मीद है कि प्रधानमंत्री हमारी रणनीति को बदल कर दिखाएंगे। इसको बदले बिना न अमन-शांति आने वाली है और न भारत परिवर्तन और विकास की तरफ चल सकेगा। पाकिस्तान के शासक चाहते भी हैं कि भारत आगे न बढ़े, क्योंकि उनमें जिहादी हमले करवाने की ताकत तो है, लेकिन इसमें उन्होंने इतना निवेश किया है कि पाकिस्तान में समृद्धि लाने के लिए उनके पास कुछ बचा ही नहीं है। सो, पाकिस्तान पूरी कोशिश करता रहेगा भारत को जिहादी हमलों में उलझाए रखने की, ताकि आर्थिक मामलों के लिए हमारे शासकों के पास समय ही न रहे। ऐसे हाल में अगर हम संयम बरतते गए, तो पाकिस्तान की रणनीति सफल हो जाएगी। संयम दिखाने का समय बहुत पहले खत्म हो गया था।

 

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First Published on October 2, 2016 3:56 am

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