December 10, 2016

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‘वक्त की नब्ज’ कॉलम में तवलीन सिंह का लेख: नोटबंदी का जोखिम

आपको भी शायद विश्वास हो गया होगा कि अच्छे दिनों के बदले मोदी अपने ही आखिरी दिनों की उलटी गिनती शुरू कर चुके हैं।

Author November 27, 2016 04:36 am
500 के नोट देकर 2000 के नए नोट लेती महिला। (PTI File Photo)

क्या नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी करके राजनीतिक आत्महत्या कर ली है? या क्या इस कदम के पीछे एक ऐसी रणनीति है, जो मोदी को अगला आम चुनाव जिता सकती है? यह सवाल और इस तरह के कई और सवाल बहुत बार पूछे गए पिछले हफ्ते और आम सहमति कुछ ऐसी बन चुकी है कि मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी गलती की है नोटबंदी करके। यह आम सहमति बनी है राजनीतिक पंडितों और राजनेताओं के बीच, सो अगर आपने टीवी पर चर्चाएं देखी होंगी या अखबारों के संपादकीय पढ़े होंगे, आपको भी शायद विश्वास हो गया होगा कि अच्छे दिनों के बदले मोदी अपने ही आखिरी दिनों की उलटी गिनती शुरू कर चुके हैं।

पुरे हफ्ते संसद को चलने नहीं दिया विपक्ष ने और कल उन्होंने आक्रोश दिवस का एलान किया है। मोदी के खिलाफ इस मुहिम ने अभी तक आम आदमी को प्रभावित नहीं किया है, लेकिन इसकी परवाह उन राजनेताओं को नहीं है, जो संसद के अंदर प्रधानमंत्री की डट कर आलोचना कर रहे हैं और जो जंतर मंतर पहुंचे पिछले हफ्ते सरेआम मोदी को गालियां देने। ममता बनर्जी ने उनकी तुलना हिटलर से की और मनमोहन सिंह जैसे समझदार, सुलझे हुए राजनेता ने भी उन पर आरोप लगाया ‘कानूनी लूट’ करने का।  प्रधानमंत्री ने कहा है कि जो लोग उन पर इल्जाम लगा रहे हैं नोटबंदी को बिना तैयारी के देश पर थोपने का, वे खुद तैयार नहीं थे अपने काले धन को सफेद करने के लिए। उनको बहत्तर घंटे मिलते तो यह काम कर सकते थे, इसलिए वे उनको कोई मोहलत नहीं देना चाहते थे। बठिंडा की एक आमसभा को संबोधित करते समय उन्होंने किसानों को डिजिटल हो जाने का भी सुझाव दिया। कहा कि सेलफोन द्वारा पैसा भी जमा कर सकते हैं और खर्च भी सकते हैं और यही भविष्य है।

मोदी की यह बात सुनने के बाद मुझे लगा कि सत्ता की ऊंचाइयों में इतनी देर रहने के बाद शायद उनका जमीनी हकीकत से रिश्ता टूट गया है, वरना ऐसी बात कभी न कहते। यथार्थ यह है कि भारत की तकरीबन आधी अर्थव्यवस्था नगद पैसों से चलती है और ऐसा ही होता रहेगा निकट भविष्य में, क्योंकि यहां काम करते हैं अशिक्षित मजदूर और किसान, जिनको डिजिटल शब्द तक मालूम नहीं है। सेलफोन बेशक होंगे उनके पास, लेकिन ये सिर्फ फोन हैं, और कुछ नहीं।ऐसे लोगों को बहुत तकलीफ होने वाली है अगर पुराने नोटों की जगह नए नोट अगले कुछ हफ्तों में नहीं उपलब्ध कराए जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नए नोट उपलब्ध कराने में अभी कई महीने लग सकते हैं। सो, ऐसा होता है अगर तो धीरे-धीरे आम लोगों में अराजकता फैलने लगेगी। फिलहाल मोदी को आम आदमी का पूरा समर्थन मिल रहा है, इसलिए कि वे भ्रष्टाचार को जोड़ते हैं काले धन से। वे जानते हैं अच्छी तरह कि थाने में शिकायत दर्ज करने के लिए भी पैसे लगते हैं और सरकारी दफ्तरों में हर सेवा के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, सो उनकी नजर में काले धन का मतलब यही है। चुनाव के समय वे देखते हैं कि किस तरह उनके जनप्रतिनिधि पानी की तरह पैसा बहाते हैं और यह भी देखते हैं कि चुनाव जीतने के बाद उनका जीवन किस तरह संपन्न हो जाता है। इस भ्रष्टाचार की जड़ें वे जानते हैं कि काले धन में हैं, सो प्रधानमंत्री की लड़ाई में वे कंधे से कंधा फिलहाल मिला कर चल रहे हैं, लेकिन कब तक?

कहने का मतलब यह कि प्रधानमंत्री ने चाल ऐसी चली है, जो उनको जिता भी सकती है 2019 का चुनाव और हरा भी सकती है। अर्थव्यवस्था में अगर अब कई महीनों तक मंदी छाई रहती है और बेरोजगारी बढ़ जाती है (दोनों चीजें संभव हैं) तो मोदी किसी हाल में नहीं जीत सकेंगे दुबारा। इसलिए बहुत जरूरी है कि अब वे उन आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों पर पूरा ध्यान दें, जो काला धन हटाने से ज्यादा जरूरी हैं। मोदी डिजिटल की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन शायद उन्होंने देखा नहीं है कि हमारे सरकारी अफसर आज भी उसी तरह काम करते हैं जैसे अंगरेजों के जमाने में किया करते थे। आम जनता की सेवा करने के बदले उनका पूरा ध्यान रहता है शासकों की सेवा में या अपनी और अपने परिवार की सेवा में। शायद इसलिए उन्होंने सोचा भी नहीं था कि नोटबंदी से सबसे ज्यादा परेशान होंगे वे लोग, जिनके पास न काला धन है और न किसी और रंग का।

अफसरशाही की मानसिकता बदलने के लिए अभी तक मोदी ने कुछ नहीं किया है। सरकार की गाड़ी तकरीबन वैसे ही चल रही है जैसे दशकों से चलती आई है। हां, यह जरूर है कि भ्रष्टाचार कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन यही एक परिवर्तन आया है। अब भी लटयंस दिल्ली की आलीशान कोठियों में रहते हैं हमारे आला अधिकारी, मंत्री और सांसद, जैसे वे जनप्रतिनिधि न होकर राजा हों। जब तक ये चीजें नहीं बदलेंगी, तब तक अच्छे दिन कभी नहीं आने वाले हैं। जब तक मोदी समझ नहीं पाएंगे कि कितना जरूरी है सरकारी खर्चों का कम होना और सरकारी सेवाओं का बेहतर होना, तब तक अच्छे दिन सिर्फ सपनों में आएंगे।अब जो इतना बड़ा कदम उठाया है प्रधानमंत्री ने, आगे बढ़ना ही होगा उन सुधारों को लाने के लिए, जिनसे भारत में प्रशासनिक तरीके भी इक्कीसवीं सदी के हो सकें और सरकारी सेवाओं में भी आधुनिकता दिखने लगे, इतनी कि डिजिटल जमाना अपने आप शुरू हो जाएगा। वरना डिजिटल को जनता पर थोपने की जितनी कोशिश होगी नाकाम रहेगी।

 

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First Published on November 27, 2016 4:34 am

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