December 09, 2016

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‘वक्त की नब्ज’ कॉलम: ट्रंप की जीत का मतलब

डोनल्ड ट्रंप जबसे चुनाव मैदान में उतरे तभी से अमेरिकी बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित उनको गंभीरता से न लेकर उनका मजाक उड़ाते रहे।

Author November 13, 2016 05:53 am
डोनाल्ड ट्रंप ।

वही हुआ अमेरिकी चुनावों में, जो होना नहीं चाहिए था हम राजनीतिक पंडितों के मुताबिक। जिस व्यक्ति को हम जाहिल, बदतमीज और बेवकूफ मानते हैं, वह आज उस कुर्सी पर बैठने जा रहा है, जो दुनिया में सबसे शक्तिशाली मानी जाती है। इतनी ऊंची जगह पर है यह कुर्सी कि इसके ऊपर है अगर कोई है तो सिर्फ ईश्वर। यह अनहोनी कैसे हो गई? हम मीडिया पंडितों ने तो स्पष्ट शब्दों में चुनाव अभियान शुरू होते ही कहा था कि अगर आखिरी मुकाबला डोनल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन के बीच होता है, तो हिलेरी आसानी से जीत जाएंगी। ऐसा न हुआ अगर, तो क्यों? क्या इसलिए कि अमेरिका के पंडितों ने इस बार वही गलती की, जो भारत के पंडितों ने 2014 में की थी नरेंद्र मोदी के साथ?

इतना विश्वास था अमेरिकी मीडिया पंडितों को अपनी बातों पर कि जिस दिन चुनाव परिणाम आने वाले थे, उन्होंने बार-बार ट्रंप के दोष गिनाए और हिलेरी की काबिलियत का जिक्र किया। मैं सुबह-सुबह टीवी के सामने बैठ गई थी बुधवार को और जब परिणाम उलटा दिखाने लगे तो उठना मुश्किल हो गया। जब तक हिलेरी ने अपनी हार नहीं स्वीकार की, मेरे लिए हिलना मुश्किल रहा। फिर हैरान बैठी रही काफी देर तक, इस सोच में डूबी कि इतनी गलत भविष्यवाणी कैसे कर बैठे अमेरिका के राजनीतिक पंडित, जब उनके पास आधुनिक साधन हैं आम लोगों की राय जानने के। सोचते-सोचते ध्यान में आया कि बिल्कुल इसी किस्म की गलती हमने 2014 में की थी नरेंद्र मोदी को लेकर। आखिरी समय तक हम यही कहते रहे टीवी पर कि भारतीय जनता पार्टी को किसी हाल में मोदी पूर्ण बहुमत नहीं दिला सकते हैं। हमने गलती इसलिए की कि हम जनता का मन समझ नहीं पाए और यही हुआ है अमेरिका में इस बार।

डोनल्ड ट्रंप जबसे चुनाव मैदान में उतरे तभी से अमेरिकी बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित उनको गंभीरता से न लेकर उनका मजाक उड़ाते रहे। जब उनको रिपब्लिकन पार्टी का टिकट हासिल हुआ तब मीडिया पंडित कहने लगे पूरे विश्वास से कि अब तय हो गया है कि हिलेरी क्लिंटन ही होंगी अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति। इतना विश्वास था अपनी बातों पर कि दुनिया के राजनीतिक पंडित भी इस बात का विश्वास करने लगे। हममें से किसी ने नहीं सोचा कि मतदाताओं की राय कुछ और हो सकती है।

उधर अमेरिका के मतदाता थे, जो मन बना चुके थे कि उनकी आर्थिक समस्याएं इतनी बड़ी हैं कि आम राजनेता को राष्ट्रपति बना कर उनका समाधान नहीं होने वाला है। इन समस्याओं के दो मुख्य कारण हैं। एक यह कि रोजगार के अवसर चीन जैसे देशों में चले गए हैं, जहां कारखानों में काम होता है अमेरिका से कम वेतन पर। दूसरा कारण है कि विदेशों, खासकर मेक्सिको से बिना वीजा के मजदूर इतने बस गए हैं अमेरिका में कि थोड़ी-बहुत दिहाड़ी पर काम करने को राजी हो जाते हैं। सो, अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर और भी कम हो गए हैं। सो, जब ट्रंप ने कहना शुरू किया कि राष्ट्रपति बन जाने के बाद वे दीवार बनाएंगे सीमा पर और नाजायज मजदूरों को वापस भेजने का काम करेंगे। उन्होंने वही बात की, जो अमेरिकी मतदाता सुनने को तरस रहे थे। ऊपर से जब उन्होंने यह भी कह दिया कि मुसलमानों को अमेरिका में दाखिल होने नहीं देना चाहिए जब तक जिहादी आतंकवाद की समस्या रहती है, तो अमेरिकी मतदाताओं को उनकी बातें और अच्छी लगीं। बुद्धिजीवियों ने डट कर आलोचना की, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।

यहां स्पष्ट करना चाहती हंू कि मैं कि अगर अमेरिका में वोट कर सकती तो मेरा वोट किसी हाल में ट्रंप को नहीं होता। मेरी नजरों में वे अब भी लायक नहीं हैं उस ऊंचे ओहदे पर बैठने के लिए, जहां वे बैठने जा रहे हैं, लेकिन चूंकि लोकतांत्रिक तरीके से पहुंचे हैं इसलिए उन्हें पूरा अधिकार है अमेरिका का राष्ट्रपति बनने का। इसलिए बराक ओबामा ने उनका स्वागत किया वाइट हाउस में और आश्वासन दिया कि वे उनकी पूरी तरह मदद करेंगे अगले दो महीनों में शासन की पेचीदयां समझाने में। याद रखिए कि ओबामा के बारे में ट्रंप ने यहां तक कहा है कि उनका बर्थ सर्टिफिकेट झूठा है और वे पैदा हुए थे केन्या में, अमेरिका में नहीं। अमेरिकी संविधान के अनुसार वही नागरिक राष्ट्रपति बन सकता है, जिसकी पैदाइश अमेरिका में हुई हो। ट्रंप का इल्जाम झूठा था, लेकिन इसके बावजूद ओबामा ने उनका स्वागत किया है। काश हमारे राजनेता भी कुछ उनसे सीख सकें। हमारा हाल यह है कि आज तक सोनिया और राहुल गांधी ने स्वीकार नहीं किया है कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं।

मोदी के बारे में कम से कम यह कह सकते थे हम कि उनको राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव है, यानी भारत के प्रधानमंत्री बनने लायक हैं। यह बात ट्रंप के बारे में नहीं कही जा सकती, सो अगर दुनिया के अखबारों ने आश्चर्य जताया है उनकी जीत पर तो यह स्वाभाविक है। अभी तक ट्रंप की किसी बात से नहीं लगता कि वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति बनने के काबिल हैं, सो विश्व के भले के लिए दुआ करनी होगी हम सबको कि चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने जो उलटी-सीधी बातें की थीं, वे सिर्फ चुनावी जुमले थे और कुछ नहीं। यथार्थ यह है कि अगर उन्होंने मुसलमानों को रोका अमेरिका आने से, तो असली मदद होगी उन जिहादी संस्थाओं की, जिनसे सारे विश्व को गंभीर खतरा है। यथार्थ यह भी है कि दीवारें नहीं बन सकती हैं सीमाओं पर।

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First Published on November 13, 2016 3:04 am

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