May 23, 2017

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शिक्षा : परिसर का परिवेश

हाल के वर्षों में अगर दुनिया में एक मजबूत, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारी छवि पुख्ता हुई है, तो इसमें कहीं न कहीं हमारे मजबूत शैक्षिक आधार का भी हाथ है।

Author नई दिल्ली | March 5, 2017 02:43 am
दिल्ली विश्वविद्यालय का कला संकाय (आर्ट्स फैकल्टी)

एमजे वारसी

किसी भी देश का विकास उसकी शिक्षा नीति और आर्थिक प्रगति पर निर्भर करता है। हम बात करना चाहते हैं उस भारत की, जिसे कभी हमारे पूर्वजों ने अपने खून-पसीने से सींचा था, वह भारत जो कभी विश्व मानचित्र पर अपना एक अलग अस्तित्व रखता था, वह भारत जिसने कभी संसार को शिक्षा और संस्कृति का पाठ पढ़ाया था, वह भारत जिसने दुनिया को एक अच्छी जीवन-शैली अपनाने का सबक दिया था, वह भारत जिसने कभी विश्व को एक अच्छे और सशक्त समाज की स्थापना में योगदान दिया था। क्या हम आज भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर हम सबको मिल कर सोचना होगा।

शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के स्तर की गिरावट राजनीतिक व्यवस्था के कारण है, जिसके कारण आज सड़कों पर क्षण भर में विद्रोह होने लगता है। सरकार चाहे किसी की हो, छात्रों का काम सवाल पूछना है, तर्क के साथ बहस करना है, अपनी बातों को सहजतापूर्वक दूसरों तक पहुंचाना है, संयम के साथ दूसरों की बातों को सुन कर अपनी राय देना है। दरअसल, यूनिवर्सिटी नई बहस, वाद-विवाद और संवाद का बहुत बड़ा मंच होती है। वाद-विवाद और संवाद ही छात्रों को जानकार बनाते हैं। फिर वहीं से एक नई बहस की शुरुआत होती है। हर परिसर में साफ-स्वस्थ राजनीति के लिए खुला शैक्षणिक और राजनीतिक माहौल होना ही चाहिए, ताकि गांव, गरीब, किसान, दलित, आदिवासी, मुसलमान परिवारों के छात्रों को भी मुख्यधारा में सक्रिय रूप से अपना योगदान देने का मौका मिल सके।

किसी भी देश और समाज के विकास के लिए शिक्षा आवश्यक है। इसके बिना कोई भी तरक्की नहीं कर सकता। आज दुनिया के कई देशों में भारत वासियों ने शिक्षा की वजह से ही अपना स्थान बनाया है। अमेरिका सहित विभिन्न विकसित देशों में भारत वासियों ने अपनी मेहनत, क्षमता और ज्ञान के आधार पर अपने देश का परचम फहराया हैं। हाल के वर्षों में अगर दुनिया में एक मजबूत, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारी छवि पुख्ता हुई है, तो इसमें कहीं न कहीं हमारे मजबूत शैक्षिक आधार का भी हाथ है। शिक्षा प्रगति, उत्पादन, विकास और स्वास्थ्य रक्षा का मुख्य आधार है।

आज विकास के जिस मॉडल पर काम हो रहा है, उसमें बदलाव लाने की जरूरत है। शिक्षा में ही भारत को विकसित देश बनाने की शक्ति निहित है। अतीत को भूल कर हमें आगे बढ़ने की जरूरत है। इसके लिए नई पीढ़ी को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। शिक्षा से व्यक्तित्व का विकास होता है और छात्र जीवन विकास का सर्वश्रेष्ठ समय है। समय का सदुपयोग ही आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए शिक्षा के साथ हमारा भावात्मक विकास होना जरूरी है। भारत ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण देश है। यहां विकास की काफी संभावनाएं हैं। यह भी एक हकीकत है कि किसी भी जीवित समाज में बदलाव आना स्वाभाविक है और शायद यही सोच हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।

सूचना प्रौद्योगिकी के युग में तीव्रता से संपूर्ण विश्व एक वैश्वीकृत ग्राम का रूप धारण कर चुका है। इन बदलती परिस्थितियों ने मानव समाज के सम्मुख अनेक चुनौतियां उत्पन्न की है। हमारा समाज भी इन चुनौतियों से अछूता नहीं है। भूमंडलीकरण के वर्तमान परिदृश्य में हमारे सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मूल्यों और मान्यताओं में अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहा है। परंपरागत मूल्यों और मान्यताओं में परिवर्तन का प्रभाव शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा पर पड़ा है। शिक्षा मानव व्यक्तित्व के निर्माण में विनियोजन और व्यक्ति के माध्यम से समाज और राष्ट्र के निर्माण तथा विकास की आधारशिला है। सर्वमान्य सत्य है कि ज्ञान-विज्ञान और वैश्वीकरण के इस दौर में एक शक्तिशाली और विकसित भारत के निर्माण में सर्वाधिक निर्णायक भूमिका शिक्षा जगत की होगी।

आज हमारे सामने नारायण मूर्ति का उदाहरण मौजूद है। एक सौ बीस रुपए के वेतन से नौकरी की शुरुआत करने वाले नारायण मूर्ति आज दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी इन्फोसिस का मालिक बन कर ढाई लाख लोगों को रोजगार दे रहे हैं। शिक्षा से ही इंसान असत्य से सत्य की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ पाता है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सहायता से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असंतुलन को कम करने के प्रयास करने होंगे। शासन का प्रयास होना चहिए कि बदलते परिवेश में समाज का संतुलित विकास और उसके विभिन्न अंगों के मध्य पारस्परिक सामंजस्य की स्थिति सुनिश्चित करने के लिए शैक्षिक संस्थाओं के गुणात्मक विकास पर बल दिया जाय, ताकि विकसित राज्य के निर्माण के बेहतर लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।

भारत में युवाओं को तकनीकी शिक्षा में विशेष रुचि लेनी होगी। विज्ञान की प्रगति का प्रभाव अब गांव में भी ले जाने की आवश्यकता है, ताकि किसान खेत में बैठा महानगर में हो रहे कृषि अनुसंधान की जानकारी मोबाइल से ले सके और पंचायत में लगे इंटरनेट से अपनी खाते की नकल प्राप्त कर सके, ताकि एक सच्चे और वास्तविक भारत की कल्पना जो हमारे दिलो-दिमाग में है उसकी सही तस्वीर सामने आ सके। समय के साथ तकनीक और संसाधन जरूर बदले हैं, पर सभी का मुख्य उद्देश्य अपने देश और समाज का विकास करना होता है। भारत अध्ययनशील समाज के रूप में मानव संसाधन के क्षेत्र में एक शक्तिशाली देश बन चुका है।

देश के चहुमुखी और नियोजित विकास में शिक्षा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान है। शिक्षा का विकास वर्तमान में विद्यमान आवश्यकताओं और भविष्य की संभावनाओं, सामाजिक अपेक्षाओं के आलोक में किया जाता है। आज शिक्षा मात्र सीखने और जानने का उपक्रम या मनुष्य के मानसिक और बौद्धिक धरातल पर होने वाली जानकारियों-सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि सुयोग्य, सुसंस्कृत और उत्कृष्ट चरित्रवान प्रबुद्ध पीढ़ियों का निर्माण भी शिक्षा का प्रमुख दायित्व है। एक उज्ज्वल और विकसित भारत के लिए शहरों और देहातों के बीच शिक्षा संसाधन असंतुलित और शिक्षा प्राप्ति की स्थिति की असमानता को दूर कर शिक्षा गुणवत्ता के सुधार और प्रतिभाओं की मूल्यांकन प्राणाली बनाने और शहरों तथा देहातों में सार्वजनिक शिक्षा सेवा व्यवस्था कायम करने के उपाय प्रस्तुत करने होंगे।

शिक्षा व्यक्तित्व के विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। स्कूल, विद्यालय या महाविद्यालय का मतलब सिर्फ क्लासरूम नहीं होता। यह वही मंच होता है, जहां एक हिंदू मुसलमान लड़के के साथ मिल कर ठहाका लगा सकता है या एक सवर्ण दलित के साथ कैंटीन में बैठ कर चाय पी सकता है। इससे उनके पूर्वाग्रह टूटते हैं। लड़कियों को तो इन विद्यालयों ने ही बाहरी दुनिया का दरवाजा दिखाया है। हम ऐसा ही संपन्न और सुसज्जित भारत देखना चाहते हैं। आज के संदर्भ में शिक्षा के महत्त्व को समझने की आवश्यकता है।

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First Published on March 5, 2017 2:43 am

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