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बाखबर: चैनल तुम्हें चैन से मरने नहीं देगा

इधर मोदीजी ने दिल्ली जीती, उधर सेंसेक्स ने रिकार्ड तोड़ा। चंचल चैनल चकित चित्त चर्चाए।
Author April 30, 2017 04:20 am
दिल्ली नगर निगम चुनावों की सभी 270 सीटों का रिजल्ट लगभग घोषित हो गया है। इसमें बीजेपी को 184, आम आदमी पार्टी को 46, कांग्रेस को 30 और अन्य को 10 सीटों पर जीत मिली है। (Photo: PTI)

इधर मोदीजी ने दिल्ली जीती, उधर सेंसेक्स ने रिकार्ड तोड़ा। चंचल चैनल चकित चित्त चर्चाए। बिजनेस चैनल खुशियां बरसाए। मार्केट के देवगण हर्षाए! और हार के बाद ‘आप’ वाले खिसियाए! ‘आप’ वाले कहने लगे कि मोदी ने नहीं, इवीएम ने हराया है। भाजपा ने इवीएम में गड़बड़ करने में एमए, पीएचडी तक कर रखी है। अब हमदर्द पत्रकार सकपकाहट में क्या कहें? सो, मयंक गांधी टाइप कुछ क्लासिकल आपवादी प्रकटे कि केजरीवाल का अहंकार ‘आप’ को ले डूबा! आय हाय! ऐसे सुअवसर पर चैनल योगेंद्र यादव से न बुलवाएं, तो मजा कैसा? सो, यादवजी दो चैनलों पर बड़े कायदे से ‘आप’ के पाखंड कोे धोते दिखे। ‘आप’ की प्रवक्ता अपना मुंह टेढ़ा किए इवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ती रही!  ‘आप’ वालो, हारना तो कायदे से सीखो! वरना वही बात कि ‘खिसियानी बिल्ली इवीएम नोचे’!

दिल्ली नगर निगम कि चुनाव परिणाम आने के बाद चैनलों की समस्त बहसें ‘केजरी की सरकार जा रही है कि नहीं जा रही’ के सवालों के आसपास घुमाई जाती रहीं, जबकि सेंसेक्स मोदी स्पर्श से पागल हुआ जाता था और यह एक बड़ा मुद्दा हो सकता था। चुनाव की खबरों के पीछे से झांकती बाजार की खुशी भी अगर विपक्ष से नहीं पढ़ी जा रही तो कोई क्या करे?
दिल्ली नगर निगम का चुनाव सेंसेक्स का चुनाव कैसे बन गया? इसे तो सोचिए श्रीमान! यानी अब कुछ भी लोकल नहीं है, सब कुछ ‘ग्लोकल’ है। भाजपा बड़ा पत्ता खेलती है। क्या दोनों में कोई मुकाबला है? मोदी का रथ ‘ग्लोकल’ ब्रांड है। भाजपा प्रवक्ता किसी सूरत में मोदीजी पर आंच नहीं आने देते। उनके लिए मोदीजी मोदीजी मात्र नहीं हैं, बल्कि एक ‘आइडिया’ हैं। मनोज तिवारीजी बोले कि मोदीजी पूरी ‘पॉलिसी’ हैं!  अगर ‘तुच्छ’ खबरें न हों, अगर पंजी-दस्सी छाप बाइटें मुख्य खबरें न बनें, तो चैनलों का वक्त कैसे कटे? तो सोनू निगम की मरी हुई बाइट को अदनान सामी ने हांक तो लगाई, लेकिन बात न बनी। इसी तरह कपिल का शो ग्रोवर व्याधि से निकला नहीं था कि दूसरे स्टैंडअप कॉमेडियन अभिजीत गांगुली ने आरोप लगाया, जिसे इंडिया टुडे ने दिखाया कि किस तरह कपिल का क्रिकेटर वाला जोक उसके शो की नकल है।… इसी तरह नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने गुरमेहर कौर बन कर पांच-छह पोस्टरों में खुद को पांच हिस्सों में बांट कर बताया कि वे सोलह दशमलव छियासठ प्रतिशत हिंदू, मुसलमान, सिख, बुद्धिस्ट, ईसाई हैं, लेकिन वे सौ फीसद कलाकार हैं।… आत्मदया का ऐसा कार्टून क्यों बनते हैं नवाज साहब!

सबसे बड़ी खबरें कथित ‘गोरक्षक’ बनाते हैं। इनको अंग्रेजी चैनल ‘काउ विजिलांते’ के नाम से नवाजते हैं। अब तो ‘भैंस विजिलांते’ भी दर्शन देने लगे हैं! वह भी दिल्ली में। और हर विजिलांतिज्म इतना चमत्कारी होता है कि जो फुटेज पहले राउंड में आता है वह बाद में नहीं आता और अब तो एनडीटीवी यह लाइन देकर ऐसे फुटेज दिखाता है कि एनडीटीवी इस वीडियो की प्रामाणिकता की शिनाख्त की जिम्मेदारी नहीं ले सकता।… पता नहीं कौन-सा वीडियो कब कितना बदल जाए।… लेकिन गोमाता का आधारकार्ड बनने के प्रस्ताव की क्रांतिकारी खबर ज्यों ही चैनलों में लगी त्यों ही हृदय गदगद हो गया! गोमाता का आधारकार्ड होगा। गोमाता का रंग, नस्ल, सींग, उम्र आदि का अांकड़ा दर्ज रहेगा, लेकिन यह किसी ने नहीं बताया कि कार्ड गोमाता के गले में लटका करेगा या कि वह गोसेवक के पास रहेगा? और गोमाता का स्थायी पता क्या होगा? कभी-कभी किसी-किसी बदमिजाज खबर का गला टीपना पड़ता है आदरणीय! आगरा में हुई पुलिस अफसर की पिटाई पर किसी चैनल ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया! पुलिसवाला ही तो पिटा था? पीटने वाले बुरा मान जाते तो? इसलिए मंत्र रट लो: ‘चुपाय मारो दुलहिन मारा जाई कउवा’!

एक रोज एक बड़े मंत्रीजी ने कह दिया कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते, फिर भी हम।… लीजिए, हाजिर है हर चैनल पर एक दिवसीय तू तू मैं मैं। पश्चिम बंगाल के भाजपा चीफ का यह बयान भी कई चैनलों में लहराता रहा कि जो ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्रीराम’ नहीं कहेगा वह ‘इतिहास’ बन जाएगा। हैरान रिपोर्टर ने जिज्ञासा की, महाराज इतिहास का मतलब तो बताइए? रिपोर्टर भी कैसे मतिमंद हंै, जो ऐसे संदेशों का ‘व्यंग्यार्थ’ तक नहीं समझते! इनको शब्दकोश पढ़वाइए जी!  एंकरों की एक और बुरी आदत है कि वे दूर की नहीं सोच पाते। वे तो तुरंता माल पर नजर रखते हैं कि किस बात से किसका फायदा, किसका नुकसान है?  इधर अदालत ने फैसला दिया कि बाबरी ध्वंस के संदर्भ में आडवाणी, जोशी और उमा प्रभृति पर केस चले।… एंकर तुरंत हिसाब करने बैठ गए कि आडवाणीजी का राष्ट्रपति का सपना तो अब गया… आदि। उसके बाद विनय कटियार का गुस्सा दिखा कि सीबीआइ की साजिश है। दो दिन रोकर यह कहानी, फिर से जीने के लिए, मर गई! वह तो सुकमा के शहीदों की शहादत ने एंकरों को देशभक्ति की ओर मोड़ दिया और देखते-देखते कहानी विक्टिमहुड की नजर आने लगी। एक अंग्रेजी चैनल ने खुद को ही ‘देश’ बना डाला और टाइटिल दिया ‘दे डाइड फॉर अस’ यानी ‘उन्होंने हमारे लिए जान दी’!  न पूछिए कि चैनल खुद को ‘देश’ कैसे समझने लगा! अरे, एक अंग्रेजी चैनल तो अपने को ‘नेशन’ समझा करता था!  ‘देश’ समझने वाले चैनल की शालीनता तो देखिए कि उसने यह पूछने की गुस्ताखी हरगिज न की कि हुजूर सीआरपीएफ के डाइरेक्टर का पद दो महीने से क्यों खाली था? दूसरे अंग्रेजी चैनल के एक एंकर को देशभक्ति का ऐसा दौरा पड़ा कि पूछने लगा, ‘कहां हैं कन्हैया-खालिद?’ नक्सलों का हमला सुकमा में और स्टूडियो के एंकर का हमला जेएनयू पर! धन्य हो कामरेड कन्हैया-खालिद! तुम उस चैनल को चैन से जीने न दोगे और वह चैनल तुम्हें चैन से मरने न देगा!

 

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