December 03, 2016

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सुधीश पचौरी का कॉलम बाखबर: लाइन हाजिर इंडिया

केजरीवाल-ममता ने संयुक्त मोर्चा जमाया। ममता की अपनी वाली हिंदी के कुछ वाक्य मजेदार लगे: अभी नोट बंद किया। कल को बोलेगा खाना बंद।

नई दिल्ली में बैंक ऑफ़ बड़ौदा के एटीएम के बाहर कतार में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करते लोग। (Photo Source: PTI/File)

देश लाइन हाजिर! इंडिया लाइन हाजिर! जनता लाइन हाजिर! चैनल लाइन हाजिर! रिपोर्टर लाइन हाजिर! एटीएम लाइन हाजिर! बैंक वाले लाइन हाजिर! खतरनाक सीन ‘बेखतर’ किए जा रहे हैं। तीन चैनलों को छोड़ कर बकिया चैनल इस कदर साष्टांग हैं कि जनता की अकुलाहट तक अनुकूलित की जाने लगी है। हर चैनल पर जनता है। सुबह से रात तक जनता ही जनता है, जो लाइनों में खड़ी है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, भोपाल, पटना… सौ खबरों में सौ शहरों में लाइनें ही लाइनें! एक जैसे सीन हैं। जनता बेचैन है। केजरीवाल बार-बार पूछते हैं: अंबानी, आडानी क्यों नहीं खड़े हैं लाइन में? और कोई जवाब नहीं आता! कैमरे लाइनें दिखा रहे हैं। रिपोर्टर सांकेतिक सवाल करता है: आप सरकार की नीति को ‘ठीक’ मानते हैं? इशारा समझ आदमी कहने लगता है कि यह नीति देश के हित में है, कुछ दिन की ही तकलीफ है! बने-बनाए जवाब बरसते हैं। ऐसी अनुकूलित जनता दिन-रात बनाई जा रही है। इसी के बल पर मंत्री और प्रवक्ता दावा करते हैं कि जनता तो स्वागत कर रही है! जनता त्राहि त्राहि कर रही है और वे समझाते हैं कि स्वागत कर रही है!

पीएम की बाइट अचानक धमकाने लगती है: जनता को मेरे खिलाफ भड़काइए नहीं! उसके बाद किस माई के लाल की हिम्मत है, जो जनता से क्रिटीकल सवाल पूछे! सारी बाइटें जनता को ‘बनाने’ की हैं, और बनी हुई जनता को यह ‘बताने’ की हैं कि यह जनता पैसों के लिए नहीं तरस रही, बल्कि पिकनिक मना रही है! पहले तीन-चार दिन तक चैनलों में जनता के सीन कुछ आकुल-व्याकुल से दिखे। उसके बाद सीन सेट कर दिए गए! रिपोर्टर गलती से जैसे ही तकलीफ की पूछता और जनता तकलीफ बताने लगती, तो तुरंत कहानी‘बेतकलीफ’ कर दी जाती। बैलेंस करने वाले वक्ता की ओर रिपोर्टर तुरंत लपक लेता और पूछता, मोदीजी की नीति से देश का भला होगा क्या? वह सोत्साह कहता कि गे्रट मोदीजी की बाइट आ रही है: ईमानदार चैन की नींद सोते हैं और कालेधन वालों को नींद की गोलियां लेने के लिए भटकना पड़ रहा है! सामने बैठे श्रोता किलकारी मार कर जोर से हल्ला करते हैं।

लेकिन लाइनों के सीन पीछा नहीं छोड़ रहे। छठे दिन तक आते-आते लाइनों को मैनेज किया जाने लगता है। भोपाल का एक बैंक। बंैक के आगे कुर्सियां डाल दी गई हैं। लाइन वाली जनता बैठी है। कुछ युवा ‘पानी’ पिला रहे हैं! उसी एमपी में एक बैंक में लोगों ने हंगामा किया है। पुलिस ने डंडे बरसाए हैं। एक-दो बार दिखने के बाद वह सीन गायब है!
लाइन हाजिर आदमी-औरत अपने आप में एक तकलीफ भरी कहानी है, लेकिन किसी रिपोर्टर को फुर्सत नहीं कि किसी से पूरी कहानी सुनवाए। उसे तो वही नपे-तुले सवाल कर नपे-तुले जवाब चाहिए और फिर पीस टू कैमरा मार कर रिपोर्टर समझते हैं कि वे जनता का सच दिखा रहे हैं। जनता अपनी बाइट देख खुद को धन्य समझती है। तकलीफ को इसी तरह साफ किया जाता है! ‘तकलीफ दिखाओ और मिटाओ’ का खेल चल रहा है। जनता दिन-रात बनाई जा रही है। सरकारी प्रवक्ता कहते हैं कि लोग बहुत खुश हैं और चैनल कट करके कहते हैं कि लाइनों में लगी जनता खुश है! दो बार जनता का दुख दिखाया। तीन बार प्रवक्ता से सुखी कहलवाया और सुख की कहानी स्थापित कर दी!
एक दिन में पीएम तीन बार बोले। तीनों बार ड्रेस बदली, लेकिन एंकर किसी से नहीं पूछता कि इतनी बार क्यों बदली! राज्यसभा में आनंद शर्मा पीएम पर कटाक्ष करते हैं: पीएम एक दिन में तीन बार ड्रेस क्यों बदलते हैं?

वृहस्पतिवार की दोपहर है। चांदनी चौक के एक बैंक के आगे लंबी कतार में लगा एक वृद्ध कहता है कि देर से खड़ा हूं। बीमार हूं। इंडिया टुडे की रिपोर्टर बैंक वाले से पूछती है: आपने देखा कि वे बीमार हैं। बैंक वाला बोलता है कि हम उसी को देख सकते हैं, जो हमारे सामने आए! वे सामने नहीं थे। बैंक का अफसर बोलने लगता है कि सर्वर डाउन था! मैं खुद कैंसर पेशेंट हूं! इंडिया टुडे की रिपोर्टर किसी तरह पीस टू कैमरा करती है। ऐसे सीन अनंत हैं, लेकिन उनकी कुव्याख्या कर बताया जाता है कि जनता तो खुश है! मोदीजी के ‘विलाप’ पर संसद में विपक्ष कहता है: मोदीजी ड्रामा बंद करें! सत्ता कहती है: विपक्ष काले धन को बचाना चाहता है! विपक्ष कहता है: माल्या को किसने जाने दिया? सत्ता कहती है: उसे पैसा किसने दिया? अर्थ निकलता है कि तुमने पैसा दिया और हमने निकल जाने दिया! क्या बुरा किया! यानी मुद्दा गायब करो। आरोप पर प्रत्यारोप करो और बहस निपटाओ!

जनता की तकलीफ संसद में गूंजती है। राज्यसभा में बहस हो रही है और सीपीएम के सीताराम येचुरी बोल रहे हैं कि फ्रांसीसी क्रांति से पहले ‘मेरी एंतोनियेत’ ने भूखी जनता से कहा था कि रोटी नहीं तो केक खा! लेकिन ये तो ‘मोदी एंतोनियेत’ हो रहा है। क्या आप जनता को इस तरह लाइन हाजिर कर एक फासिस्ट मैसेज देना चाहते हैं? सुनने लायक भाषण था सीताराम येचुरी का! केजरीवाल-ममता ने संयुक्त मोर्चा जमाया। ममता की अपनी वाली हिंदी के कुछ वाक्य मजेदार लगे: अभी नोट बंद किया। कल को बोलेगा खाना बंद। फिर बोलेगा बाजार बंद! क्या क्या बंद करेगा? हम डरने वाला नहीं। जनता हंसेंगे। मोदीजी जाएंगे! केजरीवाल ने पूछा: भाजपा के दोस्त रेड्डी ने पांच सौ करोड़ की शादी की, ये पैसा कहां से आया? उसको पकड़ते क्यों नहीं मोदीजी! वृहस्पतिवार की शाम एक मंत्रीजी ने फरमाया: यह प्रसव-पीड़ा है, कुछ दर्द होगा, लेकिन प्रसव के बाद मां खुश होती है। तकलीफ को प्रसव-पीड़ा बताने वाली इस भाषा को नमन!

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First Published on November 20, 2016 3:30 am

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