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बाखबर : घायल की गति घायल जाने

कश्मीर की कहानी के बावजूद जाकिर नाइक का भूत चैनलों में मंडराता ही रहा और वह भी चैनलों से खेलता रहा। दो बार उसने आना टाला और दो ही बार प्रेस कॉन्फ्रेंस का टाइम टाला!
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 10:23 am
सुधीश पचौरी (फाइल फोटो)

कश्मीर की कहानी पांच दिन बाद ‘आउट’ हुई। अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की अपदस्थ की गई सरकार की सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाली की ‘ब्रेकिंग न्यूज’ ने कश्मीर-कथा की जगह ले ली। अब वही बजाई जा रही है, मानो कश्मीर की कथा खत्म हो गई हो। एनडीटीवी के लिए कश्मीर-कथा खत्म नहीं हुई। बुधवार को बरखा दत्त घायल घाटी की कहानी लेकर आर्इं। रबड़ की गोलियों से घायल आंखों वालों से बातचीत करके दिखाई, फिर चर्चा कराई।

जब तक खबर खबर की तरह रहती है तब तक शांति रहती है, जब खबर बाद चर्चाएं कराई जाती हैं, तो वही खबर अखाड़े में बदल जाती है। घायल आउट हो जाता है, पक्ष और प्रतिपक्ष का दंगल शुरू हो जाता है। माना कि ‘घायल की गति घायल जाने’, लेकिन घायल को जानने वाला तो कोई हो!

घायल-घाटी की कहानी के दो ही पक्ष प्रसारित हुए। टाइम्स नाउ से लेकर बाकी सब चैनलों ने बुरहान वानी के मारे जाने को बड़ी बेक्रिंग न्यूज की तरह दिखाया, उसके बाद उसके जनाजे में शामिलों की भीड़ का एक चलता शॉट दिखाया, फिर पुलिस एक्शन के टुकड़े दिखाए। उसके बाद मारे जाने वालों और घायलों की संख्या सामने आने लगी। फिर श्रीनगर बंद के फुटेज दिखाए जाते रहे। वही सुनसान सडकें, पहरा देते पुलिस बलों के लोग!

इसके बाद अखाड़े खुल गए। अंगरेजी और हिंदी चैनलों ने खबर दी कि बुरहान की मौत पर नवाज को दर्द हुआ है, फिर हाफिज सईद और सलाउद्दीन को बुरहान की मौत का बदला लेने के लिए आह्वान करते दिखाया। हाफिज का यह बयान बजाया जाता रहा: ‘बहुत सारे बुरहानी बनेंगे’।

इंडिया टुडे उस सीन को देर तक दिखाता रहा, जिसमें उन ग्यारह आतंकवादियों का गु्रफ फोटो था, जो बुरहान को श्रद्धंजलि देने के दौरान खिंचवाया था। इसी में बैठे आतंकवादी सब्जर अहमद को हिज्बुल का नया कमांडर बनाया गया!

पाक का एंगिल फिक्स होते ही चैनलों को असानी हो गई और चर्चाओं का एंगिल भी फिक्स हो गया। राजनाथ की तुरंता मीटिंग स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा कर सकती थी। लेकिन चैनलों की बनाई कश्मीर गरम कहानी के बीच राजनाथ का शांति बनाए रखने और जांच का संदेश तक प्रभावशाली नहीं बन सका। इस बीच मोदीजी की शांति बनाए रखने की अपील भी सिर्फ एक औपचारिक खबर की तरह आई-गई हो गई। कश्मीर में कथित ‘सुशासन’ की तो ‘वाट’ ही लग गई और इस बाबत किसी ने चर्चा नहीं चलाई।
हमारे चैनलों को सार्थक चर्चा से बेहतर है सनसनी बेचना! सरल-सा फार्मूला है: असली कहानी की जगह उत्तेजक लाइनें मारें और दर्शकों को आकर्षित करते रहें। उदाहरण के लिए, एक हिंदी चैनल ने लाइन लगाई कि यूएन में भारत के दूत ‘अकबरुद्दीन ने पाक का बैंड बजा दिया’। ऐसी लाइन जितनी नजरें खींचती हैं, उतनी वैसी नहीं कि ‘भारत ने पाक को जवाब दिया’!

असली कहानी को रिपीट लाइनें और विजुअल्स बनाया करते है। वे हमारी नजरों को लाइनों और विजुअल्स पर फिक्स करके नतीजा निकालना सिखाते हैं। लाइनें हमारे मन में बैठ जाती हैं। उसके बाद डिटेल्स की परवाह कौन करे?

ऐसी हर घटना के बाद जिस तरह से पाकिस्तान से निपटा जाता है उसी तरह निपटाया जाने लगा। इस काम में दोनों ओर के दो तीन रिटायर्ड फौजी अफसरों को बिठा कर भिड़ाया जाता है। अंगरेजी चैनलों की देखादेखी फाइट कराने का यह शौक हिंदी चैनलों को भी लग गया है। ऐसे हर अवसर पर पाकिस्तानी भारत की जम कर ठुकाई करते हैं, जिसे सुन कर भारत वाले उनकी करते हैं। इस प्रक्रिया में दर्शक की ‘तुरंता छद्म देश भक्ति’ की भावना उफनने लगती है।

ऐसे ही एक चर्चा कार्यक्रम में पाक के पीरजादा ने पहले भारत के पीएम पर हमला बोला, फिर कहा कि कश्मीर के लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं और वे जीत कर रहेंगे!पीएम पर हमला सुना तो एबीपी की एंकर नाराज हुर्इं और कह उठीं कि आपको हमारे पीएम पर हमला करने का कोई हक नहीं, अगर फिर करेंगे तो हम कनेक्शन काट देंगे!यारो! जब ‘दुश्मनों’ को कंट्रोल नहीं कर सकते तो बुलाते क्यों हो?

पीरजादा ऐंड कंपनी ने हमारे चैनलों पर जो जो बोला उसे देख-सुन कर कश्मीर के आतंकवादी अलगाववादियों के हौसले बुलंद ही हुए होंगे! यह कैसा सूचना प्रबंधन है सरजी कि पहले आ बैल मुझे मार कहो, फिर बैल को गाली देकर छद्म वीरता दिखाओ। हमारे चैनलों की ऐसी छद्म वीरता ने कश्मीर के असली दर्द को बाहर निकलने ही नहीं दिया। इंडिया टुडे पर अवश्य एक संजीदा चर्चा रही, जिसमें शबनम लोन ने महबूबा की शांति की अपील की यह कह कर धज्जियां उड़ार्इं कि जब महबूबा सत्ता में नहीं थी तब हर मारे गए व्यक्ति के घर जाकर उनके संग खड़ी होती थी, लेकिन सत्ता में आते ही शांति की अपील कर रही हैं। क्यों?

यहीं राजदीप ने मोदीजी की शांति की अपील के खोखलेपन को दिखाया कि मोदीजी ने अमरनाथ यात्रियों की चिंता की, लेकिन उनकी अपील में ‘इंसानियत’ शब्द तक नहीं था, जिसका अटलजी ने कभी इस्तेमाल किया था। एक चर्चा में, पुलिस की ज्यादतियों के संदर्भ में सवाल उठा कि उपद्रव को कंट्रोल करने के लिए क्या पुलिस ने कोई ‘स्टैंडर्ड आपरेशन प्रोसीजर’ अपनाया था? जवाब में भाजपा प्रवक्ता सुधांशुजी ने तफसील से बताना शुरू किया कि ऐसे में पुलिस पहले चेतावनी देती है फिर नरम प्रतिकिया करती है, फिर ये करती है फिर वो करती हैं और जब स्थिति काबू में नहीं आती तो रबड़ बुलेट मारती है। क्या बेहतर न होता कि उनकी जगह कोई पुलिस अफसर ऐसी बातें बोलता?

कश्मीर की कहानी के बावजूद जाकिर नाइक का भूत चैनलों में मंडराता ही रहा और वह भी चैनलों से खेलता रहा। दो बार उसने आना टाला और दो ही बार प्रेस कॉन्फ्रेंस का टाइम टाला! प्रतिबंध की पुरजोर पुकारों के बाद भी उसे हिमायती मिल गए। अब आप ओवैसी और आजमी और मुसलिम लीग वाले की खबर लेते रहिए। जाकिर के वल्ले वल्ले!
घायल की गति घायल ही जान सकता है, लेकिन घृणा के ऐसे उस्तादों के बीच कौन है, जो घायल घाटी के दर्द को पहचाने?

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