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सुधीश पचौरी का कॉलम : चमक तो थी, पर खनक गायब थी

जो काम डीडी स्टूडियो में आसानी से संभव था, उसी को इंडिया गेट पर लाकर कुछ भव्यता और दिव्यता के साथ किया गया। लगता है कि सरकार पच्चीस हजार की आमंत्रित जनता को इंडिया गेट के लॉन पर बिठा कर उनके सामने एक इवेंट करना चाहती थी!
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 08:01 am
भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह। (Photo Source: Indian express)

समां बांधो। सूचना संदेशों का ऐसा विकट जाल फैलाओ कि दर्शक दूसरी बात सुनने तक न पाए! एकदम ‘डंबिंग डाउन’ की तरकीब! केंद्र सरकार ने इसी शैली में अपने किए-धरे का परिचय दिया। मोदीजी ने अंत में ‘विकास बरक्स अवरोध’ की बात की। एक ओर भव्यता, दूसरी ओर दिव्यता का टच और हर चेहरा मंत्रमुग्ध! कैसी तो लीला! यहां चमक तो खूब थी, पर खनक गायब थी!

एक मंत्रमुग्ध एंकर के लिए इंडिया गेट का सूर्यास्त नई सुबह में बदल रहा था। और मंत्रमुग्ध मंत्री जन और प्रवक्ता स्टूडियोज में बैठ कर बताते जाते थे कि पिछले अड़सठ साल में कुछ भी तो नहंीं हुआ! जो हुआ वह पिछले दो सालों में हुआ! इंडिया गेट की ऐसी चर्चाओं को सुन कर ऐसा ही निष्कर्ष निकलता था कि अब तक घोर अंधेरा था, सुबह तो अब आई है!

जो काम डीडी स्टूडियो में आसानी से संभव था, उसी को इंडिया गेट पर लाकर कुछ भव्यता और दिव्यता के साथ किया गया। लगता है कि सरकार पच्चीस हजार की आमंत्रित जनता को इंडिया गेट के लॉन पर बिठा कर उनके सामने एक इवेंट करना चाहती थी! पांच घंटे के लाइव प्रसारण में जो भी मंत्री जन आए, उपलब्धियों की एक-सी फेहरिस्त लेकर आए। जो भी मंत्री आते, पहला वाक्य यही कहते कि आदरणीय प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में यह हुआ, वह हुआ, क्या नहीं हुआ! और जो अड़सठ साल में नहीं हुआ, वह दो साल में हुआ!

चैनलों ने विकास की थीम को पकड़ा। एक चैनल ने इसे ‘सुपर सैटरडे’ से नवाजा तो दूसरे ने ‘दो साल की कामों की लिस्ट बरक्स कांग्रेस की चार्जशीट’ की तरह दिखाया! इतनी सारी उपलब्धियों को बुरी नजर कैसे न लगती? लगी और खूब लगी और कांग्रेस की लगी! कांग्रेस ने विपक्ष के ‘विघ्नसंतोषी’ की अच्छी तरह भूमिका निभाई, जिससे रस में कुछ विरस हुआ। अगर ऐसा न होता तोे इतना भव्य, दिव्य और मुग्ध भाव बरसता देख दर्शक भी बोर हो गए होते। एक से एक तीखी टीप जड़ने में माहिर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारीजी का जवाब नहीं। उनने दो वाक्यों में सब कुछ निपटा दिया। पूछा कि सरकार ने ‘ऐसा क्या किया है कि इस तरह मनाने की बात हो? अब तक लोग ‘अच्छे दिन’ का इंतजार करते थे, अब तो लोग कहने लगे हैं ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन’!

इंडिया गेट के इवेंट के रंग में भंग डालने के इरादे से शायद राहुल भी उसी टाइम में आप पार्टी की सरकार के खिलाफ एक लालटेन रैली लेकर निकल पड़े! इंडिया गेट के लाइव कवरेज को आधा करके राहुल की रैली पर आधा फोकस करना पड़ा! हुई न विघ्नसंतोषी वाली बात!

बहरहाल, इंडिया गेट के मेगा इवेंट का एक भी आइटम ऐसा नहीं दिखा, जो याद करने लायक लगे। वही वक्तव्य और वही भाषण! बहुचर्चित बिग बी का आइटम भी नया रंग नहीं जमा सका! खेर और विद्या बालन तो अपने दिए गए रोल तक ही महदूद रहे!

एक चैनल ने अमित शाह से बातचीत करने का न जाने कैसा टाइम फिक्स किया कि यहां भी अचानक विघ्न पड़ा। अच्छी-भली बातचीत चल रही थी और अमितजी एक बड़े रणनीतिकार की तरह बात कर रहे थे कि चैनल ने अचानक कट किया और ममता दीदी के शपथ समारोह को कोलकाता से लाइव दिखाने की मांग पूरी करने में लग गया। एंकर ने बताया कि वह भी जरूरी है। चैनल ने बीच का रास्ता निकाला! स्क्रीन को दो भागों में बांट दिया। एक ओर अमितजी को वह बोलता हुआ, लेकिन ‘बेआवाज’ दिखाता रहा, दूसरी ओर ममता दीदी का शपथ समारोह लाइव दिखाता रहा!

लेकिन इंडिया गेट का ‘जीरो भ्रष्टाचार वाला’ नारा अचानक संकट में फंस गया। सौजन्य रहा महाराष्ट्र के मंत्री एकनाथ खड़से का, जिनके बारे में सबसे पहले आप पार्टी ने आरोप लगाया कि उन्हें आतंकवादी सरगना दाउद के कई फोन आते रहे हैं। इन आरोपों की जांच की मांग होने लगी। भाजपा के प्रवक्ताओं ने किसी तरह इस मुद्दे को किनारे सरकाया।

किन, इन दिनों जो भी बात निकलती है, दूर तलक जाती ही है। सो, खड़सेजी कहां तक बचते? इसी प्रक्रिया में खड़से कृत जमीन स्कैंडल अवतरित हो गया और चैनल महाराष्ट्र सरकार के पहले बड़े जमीन स्कैम को दिखाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ गए, जिसकी मार दिल्ली सरकार तक होनी ही थी! फिर क्या था, एक के बाद एक डिटेल निकलने लगे।

खड़सेजी की मुसीबत शुरू हो गई। भ्रष्टाचार मुक्त भारत के नारे की खातिर महाराष्ट्र सीएम फडणवीस को तुरंत दिल्ली तलब किया गया। जवाब-तलबी में क्या हुआ हो इसे तो फडणवीस गोल कर गए, लेकिन चैनल अब भी पीछे पड़े हैं कि इस केस में इस्तीफा होगा कि नहीं होगा।

इस बीच दो बड़ी फाइटें होते-होते रह गर्इं। अपनी पिक्चर के रिलीज के दौर में एक चैनल पर नसीरुद्दीन शाह ने अनुपम खेर की कश्मीरी पंडितों की वापसी की चिंता को लेकर एक आलोचनात्मक टिप्पणी कर दी, तो चैनलों को बहस का मुद्दा मिल गया। वह तो गनीमत रही कि नसीर ने कह दिया कि उनकी मंशा वह नहीं थी, जो समझा गया और खेर ने भी मामले को तूल नहीं दिया, नहीं तो दो दिन की फाइट कहीं नहीं गई थी।दूसरी फाइट ममता दीदी के शपथ में ‘जन गण मन’ के वक्त फारुख अब्दुल्ला के मोबाइल पर बात करते रहने पर हो सकती थी, लेकिन चैनलों ने इसे भी बहुत लिफ्ट नहीं दी!

मंत्री वीके सिंहजी अपने ‘विरुद’ को हमेशा निभाते हैं। जब भी बोलते हैं, सरकार को सफाई देनी पड़ती है। अफ्रीकनों पर हमले को उन्होंने ज्यों ही ‘मामूली झगड़ा’ कहा, त्यों ही चैनल ने उनकी टिप्पणी पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। सरकार के प्रवक्ताओं को जवाबदेही करनी पड़ी।

और, यह कृष्ण की जन्मभूमि को क्या हो गया कि वहां तथाकथित ‘आजाद हिंद सेना’ एक पब्लिक पार्क की जमीन पर कब्जा किए रही। अदालत ने खाली कराने का आदेश दिया और यूपी पुलिस ‘रेकी’ करने गई, तो अचानक फायर में आ गई। दो अफसर मारे गए! भाजपा के एक प्रवक्ता ने इसे भी यूपी सरकार का ‘षड्यंत्र’ कहा!

यूपी पुलिस के डीआइजी ने प्रेस कान्फ्रेंस में सारा किस्सा बताया, लेकिन उनकी प्रेस कान्फ्रेंस औपचारिक ही रही। राजनीतिक तो शुरू हो गई थी, उनकी कौन सुनता? सो, उनकी कहानी पर भी भाजपा ने आरोप लगाए और प्रतिप्रश्न भी पूछे।

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