December 07, 2016

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‘बाखबर’: एक जनता मेड इन इंडिया

जब दिन भर बजाया तो सरकारी प्रवक्ता बोले कि पीएम को संसद में बुलाने की जिद ठीक नहीं है। उनकी जगह वित्तमंत्रीजी जवाब दे सकते हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

जब जनता ‘मेड टू आर्डर’ बन जाए तो सारी बहसें बेकार हो जाती हैं!  सत्ता हर चैनल पर जनता की व्याख्या करती रही: देश की सारी जनता नोटबंदी के साथ है। वह स्वागत कर रही है। जो साथ नहीं हैं वे कालेधन के साथ हैं और राष्ट्रविरोधी हैं!  विपक्ष ने विनती की कि आदरणीय पीएमजी संसद में पधारें और हमारे सवालों का जवाब दें, तो मेहरबानी हो!
सत्ता बोली कि यह क्या बात हुई? किसी की मांग पर थोड़े काम करेंगे पीएम!  नाराज विपक्ष संसद के बाहर खड़ा हो गया। दो सौ से ज्यादा सांसद रैली करने लगे। राहुल बोले: पीएमजी म्यूजिक कंसर्ट में बोल सकते हैं, लेकिन संसद में क्यों नहीं बोल सकते? चैनल इसे बजाने लगे।

जब दिन भर बजाया तो सरकारी प्रवक्ता बोले कि पीएम को संसद में बुलाने की जिद ठीक नहीं है। उनकी जगह वित्तमंत्रीजी जवाब दे सकते हैं। लेकिन पीएम की वाणी सुनने को ‘आतुर’ विपक्ष को कौन समझाता कि पीएम न सही, एफएम ही सही! विपक्ष राज्यसभा में नारे लगाता रहा कि पीएम जवाब दो जवाब दो। विदेश से कालाधन वापस लाओ! झूठे वादे बंद करो बंद करो! कुछ देर के लिए संसद ही जंतर मंतर लगने लगी। सत्ता अपनी पर अड़ी रही। विपक्ष अपनी पर अड़ा रहा। ऐसी अड़ाअड़ी में संसद कैसे चलती?  कट टू ‘लाइन’: लोग लाइनों में लगे परेशान दिखते रहे। कैमरा आता तो अचानक चतुर होकर वही कहते, जो ‘पोलिटीकली करेक्ट’ होता। जब कैमरा दूर होता तो कुड़कुड़ करते नजर आते!  रिपोर्टर कैमरे हटा कर जनता को संपादित करते। पहले नोटबंदी की तारीफ करवाते, फिर कुछ ‘किंतु परंतु’ कहलवाते और रिपोर्ट पूरी कर, पीस टू कैमरा करने लगते!

असली चुनौती जनता की व्याख्या थी। लाइन में कितनों को परेशानी थी? कितने आनंदित थे? रिपोर्टर चाहते तो सर्वे कर जनता की परेशानी की कहानी बता सकते थे, लेकिन जब संपादक ही न चाहें तो क्या करते? सो, एक ऐसी जनता प्रसारित होती रही, जो नोटबंदी की ‘तारीफ करती’ बताई जाती रही। राज्यसभा में पीएम की उपस्थिति की मांग बढ़ती रही और इतनी बढ़ी कि वे न आए तो सभा नहीं चली। चली तो तब चली जब पीएम ने कुछ देर के लिए दर्शन दिए। जब लंच हुआ और पीएमजी अनुपस्थित पाए गए, तो फिर शोर हुआ और सभा स्थगित करनी पडी!

इस बीच ‘एनएम-एप’ ने चमत्कार किया। ऐसे सवाल बनाए, जिनके जवाब अनुकूल ही आएं। चौबीस घंटे में पांच लाख ने आनलाइन जवाब दिए और आकंड़े चैनलों में बरसने लगे।
हाथ जोड़ कर स्वागत करने वाली जनता बनने लगी। स्वागत में निहाल होती यह जनता ‘मेक इन इंडिया’ थी। ऐसा लगता कि वह खुशी-खुशी बैंकों और एटीएमों के आगे दिन दिन भर लाइनों में लगी रहती है। नोटबंदी के स्वागत-गान गाती रहती है: ‘दिल चीज क्या है, आप मेरी जान लीजिए!’  गाते-गाते कभी-कभी एकाध जनता मर भी जाती तो लगता मानो मरने वाली जनता खुशी से मरी है! पैंसठ-सत्तर जनता को ‘लाइन मोक्ष’ मिला! दिल्ली के उत्तमनगर की एक बैंक की लाइन में एक जनता घंटों से लगी थी कि इतने में कुछ युवक लाइन तोड़ कर बीच में लग गए। उस ‘एक जनता’ ने विरोध किया तो कहा-सुनी हुई। परेशान जनता को दौरा पड़ा और उसे भी लाइन ने ‘मोक्ष’ प्रदान किया! ‘नोट’ बड़ा कि ‘मोक्ष’?

सदा सुखी चैनलों में से किसी का रिपोर्टर भी उस ‘मुक्तात्मा’ के घरवालों से मिलने की फुरसत नहीं निकाल पाया? उस ‘मुक्तात्मा’ जनता के ‘मोक्ष’ की कहानी भी खुशी-खुशी संपादित कर दी गई! यह बाइटों के संपादन-संशोधन का जमाना है। चैनल सत्य के संपादन में कुशल हो चले हैं। वे दर्द की खबर मजबूरी में देते हंै, न दें तो चैनलों की टीआरपी बैठ जाए। अगर टीआरपी का डर न होता तो वे नोटबंदी का ‘स्वागत करने वाली जनता’ ही बनाते रहते।  चैनलों के एक-दो एंकरों को छोड़ दें तो किसी में दम नहीं दिखता कि कोई इस एक फीसद जनता पर ही एक कटाक्ष कर लेता कि यह जो स्वागत न करने वाली एक फीसद जनता है, वह देशद्रोही है कि राष्टÑद्रोही है? या दोनों है? हमारे एंकर इस कदर सीरियस हैं कि किसी ने एक मजाक तक न किया कि ऐसी प्यारी जनता कहीं ‘मेक इन इंडिया’ तो नहीं!

ऐसे अनुशासित चैनल और ऐसी प्यारी और सुशील जनता की जय हो! बहरहाल, स्वागत करने वाली ‘असली जनता’ राजदीप सरदेसाई ने ‘इंडिया टुडे’ में दिखाई। वे सीधे इलाहाबाद, बनारस के गांवों से रिपोर्ट करने निकल गए और जिस तरह के फुटेज उन्होंने दिखाए। उसके बाद भी अगर कोई कहता है कि ‘सवा सौ करोड़ जनता नोटबंदी के साथ है’ तो उसका मुगालता उसे मुबारक!यही बात रात की बहस में राजदीप ने एक चर्चा के अंत में कही कि मैं पूर्वी यूपी के गांवों का सर्वे करके आया हूं और इतना ही कहूंगा कि अगर किसी को दीवार  पर लिखा नहीं नजर आ रहा तो उसकी वही जाने! ऐसी फील्ड बाइटें तुरंता सर्वे पर भारी थीं, क्योंकि ये ‘मेक इन इंडिया जनता’ की नहीं थीं।  एक दिन बहसें संसद के बाहर गांधीजी की मूर्ति के पास चली गर्इं। दो सौ से ज्यादा सांसदों का प्रदर्शन दिखा। और ममता बोलती दिखीं! और लगा कि टूटी-फूटी बंगीय हिंदी में भी वे पीएम मोदी की वक्तृता को टक्कर दे सकती हैं!  पाकिस्तान ने फिर तीन भारतीय सैनिकों को शहीद बना दिया। फिर उनको ससम्मान श्रद्धांजलि दी गई। फिर उनके घरवाले रोते-बिलखते दिखे। फिर एक पिता ने रोष से कहा किपाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए! एक रिटायर्ड फौजी अफसर ने आश्वस्त किया कि हमारी सेना जल्दी करारा जवाब देगी। अगले दिन चैनल लाइनें देते रहे कि पाकिस्तान के अंदर गोले बरसाए जा रहे हैं। फिर खबर दी गई कि पाकिस्तान के तीन सैनिक मारे गए हैं और अब पाकिस्तान बातचीत करने को तैयार दिख रहा है!

 

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First Published on November 27, 2016 4:52 am

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