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संवेदना को सोखती सूचना क्रांति

आज के मीडियाग्रस्त समाज में जिस तरह भोगवादी सरोकारों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह लोगों के ‘सहृदय सामाजिक’ या संवेदनशील मनुष्य बनने की राह में बड़ी बाधा बन गया है।
Author December 12, 2015 23:40 pm

समाचार चैनलों, सोशल मीडिया, सिनेमा, टीवी धरावाहिक, अखबार आदि ने निश्चय ही लोगों के अनुभव क्षेत्र का विस्तार किया है। पहले यह भूमिका साहित्य, रंगमंच और संगीत निभाते थे। लेकिन अब लोगों के जीवन में इन पारंपरिक माध्यमों की भूमिका सीमित हो गई है और मीडिया ने निर्णायक बढ़त बना ली है। साथ ही इन पारंपरिक माध्यमों को भी मीडिया ने बदले हुए रूपों में अपना अंग बना लिया है। गीत-संगीत हो या नाटक, सिनेमा और टेलीविजन धारावाहिकों में उन्हें देखा जा सकता है।
आज से पहले समाज में सूचना क्रांति की पहुंच इतनी अधिक कभी नहीं थी। पर इतनी विराट उपस्थिति के साथ क्या मीडिया अपने पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं को सहृदय सामाजिक बना रहा है! क्या संवेदित होने की उनकी क्षमता में वह इजाफा कर रहा है!
साहित्य और नाटक के साथ यह था कि उनका आस्वाद वही ले सकता है, जो सहृदय सामाजिक हो। साथ ही नाटक और साहित्य की भी यह भूमिका मानी गई थी कि वह लोगों को सहृदय बनाए। एक मान्यता थी कि साहित्य और नाटक देखते-सुनते समय मनुष्य की अपनी ही भावनाएं अभिव्यक्त हो जाती हैं। जैसे मिट्टी में व्याप्त गंध पानी के छींटे पड़ने से व्यक्त हो जाती है। यानी मनुष्य की मूल भावनाओं को नाटक और साहित्य अभिव्यक्त होने का मौका देते हैं। साथ-साथ इनसे उनकी मूल भावनाओं का परिष्कार भी होता चलता है। वह आत्मकेंद्रित होने के बजाय समाज के दूसरे लोगों की भावनाओं से सहज संबंध जोड़ लेता है।
पिछले एक-डेढ़ दशक में मीडिया ने मनुष्य के मन पर जो कब्जा किया है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि समाज की हर घटना से बाखबर रखते हुए वह लोगों की संवेदना का विस्तार कर रहा है। लोग वैचारिक रूप से ज्यादा सजग और सशक्त हो रहे हैं। लोगों के दुख-दर्द देख कर वे चौंकते हैं, उनकी आह निकलती है, किसी बड़े हादसे का वर्णन-चित्रण देख-पढ़ कर वे द्रवित हो उठते हैं। लेकिन समग्रता में देखें तो पूरा मीडिया अतिरेक का शिकार लगता है। इसका दर्शक-श्रोता-पाठक पर जो असर पड़ता है वह उसकी संवेदना के बौद्धिक और हार्दिक दोनों पहलुओं में संतुलन नहीं रहने देता।
लगातार चौंकाने और बात का बतंगड़ बनाने की समाचार चैनलों की आदत ने उन्हें लगातार अविश्वसनीय बनाया है, लेकिन उन्हें देखने के आदी हो चुके दर्शकों को लगातार उनकी नियमित खुराक चाहिए। अपने व्यावसायिक हितों को सच दिखाने की अपनी शपथ के रूप में प्रस्तुत कर दर्शकों के मन-मस्तिष्क का अनैतिक दोहन कर लिया जाता है और जब पता चलता है कि सच कुछ और था, तो बिना अपनी भूल का अहसास दिलाए एक नया सच उसी अतिरेक के साथ परोस दिया जाता है। अपरिपक्व उम्र और समझ का दर्शक किसे सच समझेगा, वह किस सच से प्रभावित होगा, यह उनकी चिंता का विषय नहीं है। यह दर्शकों के मन-मस्तिष्क को मंझधार में छोड़ देने जैसा है।
एक बड़ी समस्या चीजों और घटनाओं को उनके सामाजिक मूल्यों से काट कर दिखाने की है। विकास के दावों की पोल तो खोली जाती है, विकास की बढ़-चढ़ कर मांग तो की जाती है, लेकिन इस विकास की सामाजिक कीमत क्या है, इस सच से आंखें फेर ली जाती हैं। जब किसी परियोजना के लिए एक बड़ी आबादी एक जगह से उजाड़ कर बेदखल की जा रही होती है, तब न्यूज चैनलों पर शेयर बाजार के चढ़ने की खबर परोसी जा रही होती है। दर्शकों के मन-मस्तिष्क में विकास की छवियां कैद हो रही होती हैं और उसी अनुपात में सामाजिक कीमत की छवियां गायब हो रही होती हैं। चीजों, घटनाओं, यहां तक कि इंसानों, उनसे जुड़े सामाजिक मूल्यों को दरकिनार कर दिखाए जाने का चलन बेहद आम हो गया है। नहीं तो क्या वजह है कि दलितों और आदिवासियों के वास्तविक मुद्दों को टीवी चैनलों में कभी नहीं दिखाया जाता, वे केवल हिंसा और अपराध की खबर के रूप में आते हैं या फिर चुनाव के वक्त वोट बैंक बन कर। क्या आरक्षण के औचित्य पर धुंआधार बहस कराने वाला मीडिया कभी दूर-दराज जाकर सामाजिक विषमता के संदर्भ में आरक्षण का पूरा सच दर्शकों को दिखा पाता है! क्या समाज में तरक्की कर रही स्त्रियों की छवियां दिखाने वाला मीडिया खुद स्त्रियों की छवि उपभोग्य वस्तु के रूप में गढ़ने में मुब्तला नहीं है!
प्राकृतिक हादसों की खबर ‘कुदरत के कहर’ के रूप में दिखा कर मीडिया दर्शकों को कुछ देर के लिए गमगीन तो करता है, देश के दूसरे हिस्सों के लोगों के दर्द से जोड़ता भी है, लेकिन उसके लिए जिम्मेवार मानवीय गतिविधयों में खुद मीडिया की जो भूमिका है उस पर बात नहीं करता, न ही पैनल परिचर्चा कर रहे वार्ताकारों को इस पर बोलने की इजाजत देता है। इस तरह दर्शक के मन पर सच का आधा हिस्सा ही पूरे सच के रूप में अंकित हो जाता है। प्राकृतिक हादसों को आमंत्रित करने में और कम से कम उनसे होने वाली क्षति को व्यापक बनाने में समुद्री किनारों और पर्वतीय क्षेत्रों में चलने वाले निर्माण कार्य और सुरक्षा पहलुओं की अनदेखी कर धड़ाधड़ बन रही इमारतों की जो भूमिका है, वहां पर जो अवांछित बसावट है, उसके लिए प्रेरित करने में मीडिया की क्या भूमिका है, यह सच गायब कर दिया जाता है। इस पर कोई चर्चा केंद्रित नहीं होती।
सोशल मीडिया चरित्रहनन का एक सुगम मंच बनता जा रहा है। नकारात्मक चीजों को हाथों-हाथ लिया जाता है और कौन सही है कौन गलत, इसकी बिल्कुल परवाह नहीं की जाती। सिनेमा की मिसाल लें तो समझना मुश्किल है कि ऐसी फिल्में भी क्यों करोड़ों का व्यवसाय कर जाती हैं, जिनमें अपराध और अपराधियों के महिमामंडन के अलावा कुछ नहीं होता। क्या मनोेरंजन का कोई सामाजिक मूल्य नहीं होता! हम कह सकते हैं कि मीडिया को सिर्फ अपने बाजार की चिंता है। लेकिन क्या बाजार सामाजिक सरोकारों से ऊपर है? क्या कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनका कोई सामाजिक मूल्य नहीं है!
आज के मीडियाग्रस्त समाज में जिस तरह भोगवादी सरोकारों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह लोगों के ‘सहृदय सामाजिक’ या संवेदनशील मनुष्य बनने की राह में बड़ी बाधा बन गया है। सच पेश करने का दावा करने वाला मीडिया सही और गलत के बीच की लकीर धुंधली करने में अहम भूमिका निभा रहा है। कई मायनों में मीडिया लोगों की संवेदना को खत्म और उनकी स्मरण शक्ति को कमजोर कर रहा है, ताकि उसकी अपनी बनाई छवियां उनके मन-मस्तिष्क पर काबिज हो सकें। मीडिया में दिखाया जा रहा सच उनका अपना सच भी है। वह हमेशा पूरा सच नहीं होता। दर्शक-पाठक-श्रोता का यह विवेक ही उसे मानवीय संवेदना से जोड़े रख सकता है।

 

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