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दूसरी नज़र : भारत के स्वभाव की विजय

राजनीति विज्ञान का हर विद्यार्थी बिहार चुनाव के नतीजों को समझने की कोशिश करेगा। इन नतीजों में निहित सच्चाई को नजरअंदाज करना आसान है, जैसा कि भाजपा के संसदीय बोर्ड ने गठबंधन के ‘गणित’ पर दोष मढ़ कर किया। यह गणित क्या है..
Author नई दिल्ली | November 14, 2015 19:40 pm
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

राजनीति विज्ञान का हर विद्यार्थी बिहार चुनाव के नतीजों को समझने की कोशिश करेगा। इन नतीजों में निहित सच्चाई को नजरअंदाज करना आसान है, जैसा कि भाजपा के संसदीय बोर्ड ने गठबंधन के ‘गणित’ पर दोष मढ़ कर किया। यह गणित क्या है?

वे 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस को मिले वोट-प्रतिशत जोड़ कर बताते हैं- जब जद (यू) और राजद ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था- फिर निष्कर्ष निकालते हैं कि राजग का वोट-प्रतिशत कम था, और इसीलिए भाजपा/राजग की हार हो गई।

यहां कई सीधे सवाल उठते हैं:

1. क्या मतगणना के रोज से पहले इस गणित का पता नहीं था, और फिर भाजपा के हर नेता ने यह दावा क्यों किया कि पार्टी को पूर्ण (कुछ के मुताबिक दो तिहाई) बहुमत मिलेगा?

2. क्या मतदाता हर चुनाव में उसी पार्टी को वोट देता है?

3. अगर पिछले वोट-प्रतिशत के गणित ने चुनाव का फैसला किया, तो भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार की चालीस में से बाईस सीटें कैसे जीत गई? 2010 के विधानसभा चुनाव में मिले वोट-प्रतिशत के हिसाब से तो भाजपा को 2014 में जनता दल (यू) से कम सीटों पर जीत मिलनी चाहिए थी।

2014 के बरक्स आया बदलाव:

जवाब 2014 के बरक्स भाजपा में आए बदलाव में छिपा है, वह बदलाव जिसे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार और यशवंत सिन्हा ने दल का ‘बधियाकरण’ कह कर चित्रित किया है।

2014 में भाजपा ने खुद को सामूहिक नेतृत्व वाली एक लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में पेश किया था (हालांकि यह आरएसएस के अधीन रही है)। प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का सेहरा बंध जाने के बाद भी मोदी अपने साथी नेताओं का लिहाज करते थे। विकास को लेकर उनमें एक अटूट संकल्प दिखता था। तब न आरक्षण की बात हो रही थी न गाय की, न समान नागरिक संहिता की, न इतिहास को फिर से लिखने की, न ही बीफ, पुस्तकों, जीन्स या प्यार पर प्रतिबंध लगाने की। संक्षेप में, तब मोदी के नेतृत्व में भाजपा के प्रचार-अभियान ने भारत की जनता के राष्ट्रीय मिजाज को चुनौती नहीं दी थी, या उसे उलटी दिशा में ले जाने की कोशिश नहीं की थी। तब भाजपा भारतीय समाज की विविधता, बहुलतावाद और लोगों की अलग-अलग सोच के प्रति सहिष्णुता की भावना का सम्मान करती मालूम पड़ती थी।

यह सही है कि तब चुनाव के दौरान असहिष्णुता की घटनाएं हुई थीं, पर कुछ ही लोगों ने उनके लिए भाजपा पर दोष मढ़ा था। यहां तक कि जिन मामलों में संघ परिवार का धुर दक्षिणपंथी धड़ा उकसाने में लिप्त था, भाजपा के नेतृत्व पर शक नहीं किया गया। 2014 में लोकसभा चुनाव और फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा भारत के जातीय स्वभाव से संगति बिठाती दिखती थी। एक मूलवादी (फंडामेंटलिस्ट) दक्षिणपंथी पार्टी के सत्ता में आने का भय कहीं पीछे छूट गया था। मतदाताओं ने मोदी और उनकी वक्तृता के प्रति खूब जोश दिखाया और उन्हें ऐसा जनादेश दिया, जो तीस साल में किसी पार्टी को नसीब नहीं हुआ था।

इस बीच जो गलतियां हुर्इं:

भाजपा ने पहली गलती दिल्ली विधानसभा चुनाव में की, और इसकी कीमत उसे चुकानी पड़ी। वह रणनीतिक भूल थी। पहले मोदी को पार्टी के चुनावी चेहरे की तरह पेश किया गया, और बहुत बाद में, नवागंतुक किरण बेदी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर लाई गर्इं।

बिहार में इससे बड़ी गलतियां की गर्इं। भारत की संकल्पना को ही चुनौती दी गई और इसके कई ध्वजावाहकों का मखौल उड़ाया गया (‘अब्दुल कलाम एक मुसलिम होते हुए भी राष्ट्रवादी थे’; ‘शाहरुख खान रहते भारत में हैं, पर उनका दिल पाकिस्तान में है’; ‘लेखकों का पुरस्कार लौटाना गढ़ा हुआ विरोध है’)।

मोदी की उस बात को याद करें, जो उन्होंने अक्तूबर 2013 में पटना के गांधी मैदान में रैली के दौरान कुछ धमाके होने के बाद कही थी। उन्होंने बड़े भावनात्मक अंदाज में सवाल किया, हिंदुओं को मुसलमानों से लड़ना चाहिए या गरीबी से? इसी तर्ज पर उन्होंने पूछा, मुसलमान हिंदुओं से लड़ें या गरीबी से? उनके इस सवाल से सदाशयता झलकती थी और लगता था वे लड़ाई-झगड़ों से बहुत ऊपर हैं। अखलाक की हत्या के बाद, और कई रोज तक चुप्पी साधे रहने के बाद, अक्तूबर 2015 में भी मोदी ने वैसा ही वक्तव्य दिया। इस बार वह एकदम खोखला मालूम हुआ और इसने मोदी को एक कटु विवाद के केंद्र में ला दिया।

2014 में जो प्रभावपूर्ण वक्तृत्व मालूम पड़ता था वह 2015 में अर्थहीन शब्दाडंबर लगने लगा। 2014 में जो वादे भरोसेमंद मालूम पड़ते थे वे 2015 में महज चुनावी जुमले नजर आने लगे।

एक प्रधानमंत्री क्या कर सकता है:

लोगों की राय में तेजी से आए बदलाव के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार कौन है?

मुझे भय है कि अमित शाह के उदार सहयोग से यह काम मोदी ने खुद किया है। 2014 में एक उम्मीदवार होते हुए वे ऐसे बोल रहे थे जैसे प्रधानमंत्री ही हों। 2015 में प्रधानमंत्री रहते हुए वे ऐसे बोले जैसे उम्मीदवार हों! जब मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान के बाद झटका लगा, मोदी ने कई दफा खुद को अति-पिछड़ा कह कर अपनी जाति की ओर इशारा किया। जब ‘बिहारी या बाहरी’ का नारा चल निकला, मोदी ने गरीबी, अशिक्षा और अपराध के लिए बिहार का मखौल उड़ाया।

एक प्रधानमंत्री को नगर निकाय चुनावों में जगह-जगह भाषण झाड़ने वाले भाषणबाज की तरह नहीं दिखना चाहिए। एक प्रधानमंत्री को खुद को जाति-विशेष से नहीं जोड़ना चाहिए। किसी राज्य और वहां के सब लोगों से तादात्म्य कायम करने से कोई प्रधानमंत्री इनकार नहीं कर सकता। कोई प्रधानमंत्री एक मुख्यमंत्री पर आतंकवादियों का बचाव करने का आरोप नहीं लगा सकता।

मोदी ने छब्बीस निर्वाचन क्षेत्रों में रैलियां कीं। इनमें तेरह क्षेत्रों में भाजपा हार गई। बिहार के अड़तीस में से तेरह जिलों में भाजपा का खाता तक नहीं खुला। यह पिस जाने वाली पराजय थी। जीत भारत के राष्ट्रीय स्वभाव की हुई। केंद्र सरकार ने सब कुछ खो दिया हो, ऐसा नहीं है। जैसा कि मैंने पिछले स्तंभ में कहा था, मोदी ‘ठिठक कर, हालात का जायजा लेकर, पीछे हट कर, पार्टी को सुशासन और विकास के रास्ते पर ले जा सकते हैं।’ क्या वे ऐसा करेंगे, या कर नहीं सकते? आपकी तरह मैं भी अनुमान ही लगा सकता हूं।

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  1. M
    mukesh kumar
    Nov 17, 2015 at 11:57 pm
    उपर्युक्त लेख में हिंदी के कुछ शब्दों का प्रयोग बहुत ही शानदार हुआ है ..... यह पाठक को बरबस अपने ओर खींचता है
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    Reply
    1. तुरबसु
      Nov 26, 2015 at 1:34 pm
      यह आलेख सत्य से विल्कुल निकट है। कुछ लोग कहते हैं बिहार में जातिवाद के कारण भाजपा हारी जो बिल्कुल ी नहीं है। बिहार की जनता को समझने में ये हाईटेक लोग गलती कर दिए।
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      सबरंग