March 25, 2017

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हिंसा विमर्श को बाधित करती है

राकेश सिन्हा ने कहा कि राष्ट्रवाद में उन सबकी जगह है, जो उस देश में पैदा हुए और उस देश के विचार को मानते हैं। उसमें सिस्टर निवेदिता को भी जगह है, जो बाहर से आर्इं। सवाल मुसलमान और कम्युनिस्ट का नहीं है।

Author नई दिल्ली | March 7, 2017 05:36 am
बिरादरी की बैठक में राकेश सिंहा। (फोटो- आरुष चोपड़ा)

जबसे केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीति में हस्तक्षेप अधिक देखा जाने लगा है, विरोध और विमर्श भी कुछ तेज हुआ है। इस बीच गोरक्षा, धर्मांतरण आदि को लेकर हिंसक घटनाएं भी हुर्इं। रामजस कॉलेज में हिंसा ताजा घटना है। इसे लेकर विश्वविद्यालय परिसर और उसके बाहर भी संघर्ष चल रहा है। संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की विचारधारा को प्रश्नांकित किया जा रहा है। ऐसे में संघ के प्रखर कार्यकर्ता और मुखर वक्ता राकेश सिन्हा से इस बार की बारादरी में राष्ट्रवाद, संघ की विचारधारा, छात्र राजनीति के बदलते स्वरूप, हिंसक घटनाओं आदि को लेकर तीखे सवाल हुए। उन्होंने हर मुद्दे पर संघ और विद्यार्थी परिषद से जुड़े सवालों का बेबाक जवाब दिया। बारादरी का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने। 

मनोज मिश्र: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को राजनीति से अलग रखता रहा है, पर इधर कुछ समय से देखा जा रहा है कि राजनीति में उसकी दखलंदाजी बढ़ी है। क्या आरएसएस बदल रहा है?
राकेश सिन्हा: यह बात आरएसएस के बारे में शुरू से कही जाती रही है। जब हिंदू महासभा थी, तब कहा जाता था कि आरएसएस हिंदू महासभा की बात करता है, फिर जनसंघ बना तो भी यही बात कही गई। जनसंघ बना ही आरएसएस की प्रेरणा से था। मूल बात है कि आरएसएस जिस विचार को लेकर चल रहा है वह एक अलग नैरेटिव है। मगर इसके विरोध में वैचारिक रूप से सशक्त नैरेटिव है। वह संघ का विरोध करता है। फासीवादी, सांप्रदायिक कह कर संघ को किनारे करता है। सामाजिक और आर्थिक स्तर पर तो उसका मुकाबला संघ कर पा रहा है, पर संसद के भीतर उसका मुकाबला नहीं कर पाता था। जब 1948 में प्रतिबंध लगा तो संघ ने देखा कि बाहर तो उसे समर्थन हासिल है, पर संसद और विधानसभाओं में उसे कोई डिफेंड करने वाला नहीं है, तो संघ का पहला हस्तक्षेप वहां हुआ। जनसंघ बनने पर। आज भी वही स्थिति है। बहुत-सी सामाजिक और आर्थिक नीतियां ऐसी हैं, जिन्हें संघ चाहता है कि राष्ट्र के हित में बनें। उन नीतियों को बनाने के लिए संघ सरकार को प्रभावित और प्रेरित करता है। चूंकि संघ के स्वयंसेवक सीधे सरकार में हैं, संघ के साथ उनकी संवाद प्रक्रिया बहुत सहज है। मगर बाहर के लोगों को लगता है कि यह संघ का हस्तक्षेप है। यह हस्तक्षेप नहीं है। पहले भी संवाद होता था, पर अब चूंकि संघ पर मीडिया का ध्यान कुछ अधिक है, इसलिए सूक्ष्म स्तर पर संघ को देखा जा रहा है। संघ सलाह और प्रेरणा पहले भी देता रहा है, इन दोनों की लक्ष्मणरेखा को जिस दिन संघ लांघ देगा, उस दिन कहा जाना चाहिए कि वह हस्तक्षेप कर रहा है।

अनुराग अन्वेषी: इधर अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार हमला हो रहा है, रामजस प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है। पक्ष और विपक्ष दोनों होने चाहिए। विरोध के स्वर को दबाने या फिर उसे राष्ट्रभक्ति से जोड़ कर देखने की कोशिश कहां तक उचित है?
राकेश सिन्हा: घटना आधारित विमर्श और विचार आधारित विमर्श में अंतर है। अभी जो घटना घटी, ऐसी दस घटनाएं घट सकती हैं और हमें भी मालूम है कि घटनाएं दस-पांच दिन में शांत हो जाएंगी। यह घटना आधारित विमर्श है। कोई आया, उसे रोका गया, धरना दिया गया- ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं। मैं अभिव्यक्ति की आजादी को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना चाहता हूं। विश्वविद्यालय परिसरों में एक खास विचारधारा के लोगों ने अपना वर्चस्व रखा था। यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और उसके फेकेल्टी का नाम सुनते ही जो हमारे मन में धारणा बनती है, उसको बताने की जरूरत नहीं। विश्वविद्यालयों के सामाजिक विज्ञान के विभागों में मार्क्सवादी विचारधारा का वर्चस्व रहा है। इसलिए वे इतिहासकार, वे सामाजिक विज्ञान के लोग हाशिये पर चले गए, जो इनसे सहमति नहीं रखते थे। वैकल्पिक विचारधारा को उन्होंने पनपने नहीं दिया। इतिहासकारों ने संघ की आलोचना की, उसके विरोध में जहर भरने की कोशिश की, मगर उन्हें नहीं रोका गया। मोदी के विरोध में कितना कुछ अपमानजनक लिखा गया, मगर तब किसी ने अभिव्यक्ति की आजादी का विरोध नहीं किया। संघ का विरोध करना, भाजपा का विरोध करना तो भारतीय लोकतंत्र में स्वीकृत है। मगर जब उस विरोध की आड़ में आइडिया ऑफ इंडिया का विरोध करते हैं, और आइडिया ऑॅफ इंडिया के नाम पर ही करते हैं, तब? पहले यह सोचा गया था कि बड़ी पार्टियां छोटी पार्टियों को अपने पीछे ले चलेंगी, लेकिन वामपंथ का जो असामाजिक तत्त्व है- सीपीआइएमएल- उसकी वेबसाइट पर आज सेना प्रमुख के नाम खुला पत्र है कि आप कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार को कुचल नहीं सकते। दूसरा, कश्मीर एक राजनीतिक विवाद है। पाकिस्तान भी यही कहता है। तो, जो बात पाकिस्तान कह रहा है, वही भारत के अंदर का कोई राजनीतिक दल कह रहा है, तो उसे क्या कहेंगे। कश्मीर में आत्मनिर्णय का विरोध नहीं हो रहा है, इस विरोध के नाम पर जो सामूहिक हिंसा हो रही है विरोध उसका हो रहा है। तो, अभिव्यक्ति की आजादी को मैं बड़े परिप्रेक्ष्य में देखता हूं। वैकल्पिक विचारधारा को आपने पनपने नहीं दिया। संघ को आपने अछूत घोषित कर दिया। विदेशों में संघ पर काम होता है, भारत में नहीं होता। यह जो खाई पैदा हुई, उससे कई प्रकार की विकृतियां और विकर्षण पैदा हुए। वस्तुत: लोकतंत्र में यूनिटी आॅफ अपोजीशन होना चाहिए, पर यहां तो अपोजिट की जो संभावना है, उसे तोड़ा जाता है। तो, अब विश्वविद्यालय परिसर में वामपंथी विचारधारा को वैकल्पिक विचारधारा से चुनौती मिल रही है।

सूर्यनाथ सिंह: मगर जिस तरह का विरोध रामजस में देखा गया, वह वैचारिक संघर्ष नहीं है!
राकेश सिन्हा: उमर खालिद को रामजस कॉलेज में बुलाने के पीछे मंशा बस्तर पर बहस कराने की नहीं थी। जिस उमर खालिद को, मैं मानता हूं कि उमर खालिद देशद्रोही है, कोर्ट में केस है। जिन कारणों से वह गिरफ्तार हुआ, भूमिगत रहा, समाज में एक वैकल्पिक धारणा को जन्म दिया। ऐसे व्यक्ति को जब आप बस्तर पर बोलने के लिए बुलाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से संघर्ष होगा। लेकिन मैं इसमें एक अच्छी बात देखता हूं। राष्ट्रवाद पर विमर्श पिछले साठ साल से लंबित था कि भारत का राष्ट्रवाद राजनीतिक राष्ट्रवाद है या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। भारत का राष्ट्रवाद संविधान पर आधारित है या सभ्यता और संस्कृति की विरासत पर या दोनों का संयोग है। तो मुझे लगता है इस देश में राष्ट्रवाद पर विमर्श अब चलेगा और पंथनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद पर साथ-साथ विमर्श चलेगा। यह देश के लिए अच्छा है।

दीपक रस्तोगी: विचारधारा के नाम पर आपके संगठन में कुछ ऐसे तत्त्व घुस आए हैं, जो समाज को तोड़ने का काम कर रहे हैं। उन्हें रोकने के लिए संघ की क्या योजना है?
राकेश सिन्हा: देखिए, हिंसा से किसका सबसे ज्यादा नुकसान होता है। जो वैकल्पिक विचारधारा को लेकर जा रहे हैं, जो विचारधारा के स्तर पर हाशिए पर थे आज वे डॉमिनेंट विचारधारा से बहस करना चाह रहे हैं, तो नुकसान उनको होता है। पूरा फोकस आज हिंसा पर चला गया। किसी व्यक्ति विशेष पर चला गया, विषय पीछे छूट गया और हिंसा आगे आ गई। तो मुझे लगता है वैकल्पिक विचारधारा को जो लोग लेकर चलते हैं उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए और संजीदगी से करना चाहिए कि विचारधारा की बहस में वे पीछे हैं और अभी एक डॉमिनेंट विचारधारा से लड़ाई चल रही है, तो इस तरह की घटनाएं घटने से स्थिति आत्मरक्षात्मक हो जाती है। मीडिया में भी विचारधारा के स्तर पर एक तबका ऐसा है, जिसकी ग्रूमिंग उसी प्रकार हुई है, वह भी उसी विश्वविद्यालय परिसर से निकला है। मैं इस विरोधाभास का सबसे बड़ा खमियाजा भुगत चुका हूं। मैं अपने छात्र जीवन में हमेशा टॉपर रहा। एमए में मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। तब मार्क्सवादी वर्चस्व था। मैंने एमए में हेडगेवार पर डिजर्टेशन लिखा था। दो सौ नंबर मिले थे मुझे उसमें। तो, एमफिल में दाखिले के समय सात लोग इंटरव्यू में बैठे हुए थे, मुझसे पहला सवाल पूछा गया था कि आपमें और नाथूराम गोडसे में क्या अंतर है। सवाल कुछ भी पूछा जा सकता है। लेकिन एमए के छात्र से जब यह सवाल पूछते हैं, तो यह कहां तक सही लगता है।…
यह हमारे लिए अफसोस की बात है कि जिस तरह की घटनाएं हम नहीं चाहते, उसका भी दाग हमारे सिर पर लगता है। संघ जगह-जगह आदिवासी और दलित लोगों के बीच काम कर रहा है, पर उसका कोई उल्लेख नहीं होता। एक वर्ग है जो हर चीज के लिए संघ को दोषी मानता है। वामपंथी बुद्धिजीवी और समाजवादी बुद्धिजीवी अगर संघ का विरोध करते हैं, तो उन्हें प्रगतिशील माना जाता है, हिंदू विरोध मतलब धर्मनिरपेक्ष और भारत विरोध मतलब उदार- ये तीन परिप्रेक्ष्य हो गए हैं, इसे बदलना चाहिए।

रामजन्म पाठक: आपके राष्ट्रवाद में मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट को कितनी जगह है?
राकेश सिन्हा: जब हम राष्ट्रवाद कहते हैं, तो उसमें उन सबकी जगह है, जो उस देश में पैदा हुए और उस देश के विचार को मानते हैं। उसमें सिस्टर निवेदिता को भी जगह है, जो बाहर से आर्इं। सवाल मुसलमान और कम्युनिस्ट का नहीं है। सवाल है कि आप राष्ट्र को मानते क्या हैं। दुनिया के सभी राष्ट्रों का जन्म भाषा, धर्म और भूगोल के आधार पर हुआ। भारतीय राष्ट्र एक सभ्यताई राष्ट्र है। एक सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें सीमा का कोई महत्त्व नहीं था। सीमाएं पश्चिम की देन हैं। जहां तक चर्चों पर हमले का सवाल है, हमने दिल्ली में चर्चों पर हुए हमलों का अध्ययन कराया था, मगर कहीं भी तथ्य नहीं मिला कि उनमें संघ का हाथ था। सिर्फ धारणा पर आधारित निष्कर्ष निकाल कर संघ की निंदा की जाती है। चर्चों पर हमला करना होता तो संघ के लोग आदिवासियों के बीच जाकर काम नहीं कर रहे होते।

पारुल शर्मा: गुरमेहर ने जो कहा, उसे आप किस दृष्टि से देखते हैं और फिर जिस तरह उसका विरोध हुआ उसे कितना जायज ठहराते हैं।
राकेश सिन्हा: जिस उत्तेजक माहौल में उन्होंने कहा और पाकिस्तान को क्लीन चिट दी, उससे माहौल बिगड़ा। भारत में युद्ध कोई नहीं चाहता है। सभी सरकारों ने युद्ध को टालने की कोशिश की। युद्ध के माहौल में भी हमने युद्ध का विरोध किया। वे युद्ध का विरोध कर रही हैं, ठीक है, पर पाकिस्तान ने नहीं मारा कहा, तो उससे बहुत से लोग आहत हुए। ऐसे में कुछ शरारती तत्त्वों ने जिस तरह विरोध किया, उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। पाकिस्तान सिर्फ युद्ध नहीं कर रहा है, वह 26/11 भी कर रहा है, जगह-जगह हमले करवा रहा है, इसलिए उसे क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। अब जब कोई पाकिस्तान को हमारे यहां क्लीन चिट देता है, तो उसे एक तरह से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वीकृति देता है। मगर उसका इस तरह विरोध नहीं होना चाहिए। जो हिंसा करते हैं, वे विमर्श की प्रक्रिया में अवरोध पैदा करते हैं।

मुकेश भारद्वाज: जबसे भाजपा की सरकार बनी है, एक नई परिपाटी-सी बनती दिख रही है कि हम खलनायक बनाते-बनाते एक व्यक्ति को नायक बना देते हैं। पहले कन्हैया कुमार को बनाया, अब गुरमेहर कौर को बना दिया। हमारे सामने उन्हें खलनायक की तरह पेश किया गया, जबकि हमारे सामने वे दो यूथ आइकन, दो नायक की तरह उपस्थित हो गए। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
राकेश सिन्हा: नहीं, मेरा मानना है कि यह मीडिया की वजह से हुआ है। मीडिया में कुछ लोग ऐसे हैं, जिनकी विचारधारा संघ-विरोध की है। मीडिया के लोग आरएसएस और बीजेपी की हर गतिविधि का विरोध तो करते हैं, पर उसमें एक गड़बड़ी होती है। वह कैसे होता है, नहीं मालूम, पर हकीकत यही है कि वे दो लोगों को खड़ा कर देते हैं और मुद्दा बदल जाता है। बहस मुद्दे से हट कर दो लोगों पर होने लगती है।

अरविंद शेष: अमेरिका में अभी भारतीयों की हुई हत्या के पीछे कहा गया ट्रंप के तैयार किए माहौल की वजह से ऐसा हुआ। तो, हमारे यहां जब किसी अखलाक की हत्या होती है या चर्चों पर हमले होते हैं या साक्षी महराज जैसे लोग बयान देते हैं तो क्या उसके पीछे भी ऐसे माहौल को वजह नहीं माना जा सकता?
राकेश सिन्हा: इस तरह के जो भी बयान दिए जाते हैं, वे संगठन के आधिकारिक बयान नहीं होते। क्या साक्षी महाराज के बयान की वजह से कश्मीर से हजारों पंडितों को निकाल दिया गया? देखिए, सीमाई आतंकवाद और धार्मिक आतंकवाद में अंतर करना होगा। सीमाई आतंकवाद में सब लोग आतंकवादी बन कर रहते हैं। कोई कश्मीरी पंडित आतंकवादी क्यों नहीं बना, जबकि हजारों लोग बेघर कर दिए गए। एक भी कश्मीरी पंडित ने बंदूक नहीं उठाई। लेकिन जब विमर्श होता है तो कश्मीर से पंडित क्यों निकाले गए, इसकी तह तक जाने से हम रुक जाते हैं। सिर्फ आतंकवाद को दोष देकर आगे बढ़ जाते हैं।

मृणाल वल्लरी: इतिहास लेखन आरएसएस का बड़ा मुद्दा है। आज गांधी भी एक प्रतीक हैं और गोड़से भी। अब जब नया इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें इन दोनों को किस रूप में रखा जाएगा।
राकेश सिन्हा: गोडसे प्रतीक नहीं है। हो भी नहीं सकता। वह हिंदू महासभा का एक्टीविस्ट था, एक स्थानीय अखबार का संपादक था। उसका कोई राजनीतिक-सामाजिक महत्त्व नहीं था। उसका नाम लोग सिर्फ इसलिए जानते हैं कि उसने गांधी को मारा। गांधी प्रतीक हैं। वे प्रतीक रहेंगे। वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने पूरब और पश्चिम की सभ्याताओं के बीच सेतु का काम किया। वे हमारी सभ्यता के इतिहास का प्रतिनिधित्व करते हैं। गोडसे शरारती तत्त्वों का प्रतीक है। गांधी की चिंताधारा वैश्विक थी। गोडसे का बहुत ही स्थानीय और क्षणिक अप्रोच था। विवेकानंद के बाद गांधी पश्चिमी जगत में हमारी सभ्यता के प्रतिनिधि हैं।

अनुराग अन्वेषी: इन दिनों देशभक्ति का एक विकृत रूप नजर आने लगा है। उसे आप किस तरह देखते हैं।
राकेश सिन्हा: जो हत्या की धमकी दे रहे हैं, उसे हम राष्ट्रभक्ति से क्यों जोड़ें! राष्ट्रभक्ति पर बहस करने का अधिकार उन लोगों को नहीं है, जो हिंसा की राजनीति या हिंसा की बात करते हैं। जो लोग राष्ट्रवाद का नारा देते हैं, वे सभी राष्ट्रवादी हों, जरूरी नहीं। राष्ट्रवाद और राष्ट्र-विरोध को हमें हल्का नहीं बना देना चाहिए। यह हल्कापन सोशल मीडिया की वजह से आया है। अगर देशभक्ति को परिभाषित करना हो तो कह सकते हैं कि जो देश को चुनौती देता है, जो देश को मिटा देना चाहता है, चाहे वह किसी भी दल या विचारधारा का हो, वह देशद्रोही है। अगर कोई व्यक्ति बहुत सारी बातों का विरोध करते हुए भी अस्मिता की रक्षा के लिए, सभ्यता की रक्षा के लिए लड़ता है तो वह देशभक्त हो सकता है।

पारुल शर्मा: दिल्ली विश्वविद्यालय में अब राजनीतिक दल कुछ ज्यादा सक्रिय हो गए हैं, जिसकी वजह से संघर्ष बढ़ा है। इसे आप किस रूप में देखते हैं।
राकेश सिन्हा: इसमें मैं एक शुभ संकेत देखता हूं। अभी जो हिंसा की घटनाए घटी, उसका कोई समर्थन नहीं कर सकता, मगर इसमें एक शुभ संकेत देखता हूं। नवउदारवाद आने के बाद छात्रों में आलस्य का भाव आ गया था। लोकतंत्र से वे इतर जा रहे थे। राजनीति के प्रति उनमें अनास्था पैदा हो गई थी। आज वे सड़कों पर उतर रहे हैं। उन्हें पोलिटिकल ट्रेनिंग मिल रही है। यह लोकतंत्र की जीवंतता को मजबूत करता है। आज छात्र किताब के बजाय अपने दिमाग से राष्ट्रवाद की परिभाषा कर रहा है।

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह और मृणाल वल्लरी

 

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First Published on March 5, 2017 3:19 am

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