कभी-कभार: राजनीति का अतियथार्थ

यूरोप में जब कला में अतियथार्थ की अवधारणा और व्यवहार की शुरुआत हुई थी तो यह माना या कम से कम दावा किया गया था कि अतियथार्थ यथार्थ से अधिक वास्तविक, आम जिंदगी से अधिक जुड़ा और इसलिए अधिक विस्मयकारी, भौचक करने वाला है। उसने कला में जो परिवर्तन किया उनमें से कम से कम एक यह था कि सर्वथा अप्रत्याशित और अनहोने को भी मान्यता मिलने लगी: जो असंभव है उसकी संभावना का भी एहतराम किया जाने लगा। जो अकल्पनीय है या लगता है वह भी कल्पना के भूगोल में आ सकता है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस सप्ताह के शुरू में जो किया है उसे राजनीति का अतियथार्थ कहना अनुपयुक्त न होगा। चुनाव-प्रचार के उत्तरार्द्ध में यह तो स्पष्ट हो गया था कि आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी है, पर इतना भारी है कि दूसरे पलड़े पर लगभग कुछ नहीं बचेगा यह कल्पना और अनुमान से परे था। हममें से ऐसे बहुत सारे थे, जो शायद भारतीय जनता पार्टी के भदेस, लगभग अश्लील प्रचार, ओछे निजी प्रहारों से त्रस्त हुए थे और लोकतंत्र में भाषा की ऐसी गिरावट को लेकर बहुत खिन्न-क्षुब्ध भी हुए थे और हैं। उस दल को इस अनैतिक आचरण की सजा मिल गई, यह संतोष की बात है। लोकतंत्र में मिली अभिव्यक्ति की आजादी का ऐसा घृणित दुरुपयोग सर्वथा निंदनीय और दंडनीय है। विडंबना यह है कि इस आजादी का इसी तरह दुरुपयोग और कदाचार इसी दल के परिवार की अन्य संस्थाएं लगातार कर रही हैं और अभिव्यक्ति की सर्वथा निर्भीक, पर संयत अभिव्यक्ति पर सबसे अधिक एतराज और हो-हल्ला भी वही मचाती हैं।

कई विश्लेषकों ने बताया है कि आम आदमी पार्टी ने जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग आदि को पोसने वाली राजनीति से अलग एक नए किस्म की राजनीति का सहारा लिया है और उसकी अपील इन सब विभाजनों को अतिक्रमित करके की गई और सफल हुई है। जब हमारे सभी दूसरे राजनीतिक दल, जिनमें तथाकथित राष्ट्रीय दल प्रमुख हैं, इन्हीं विभाजनों को भुनाते रहे हैं तो यह नया राजनीतिक आचार अतियथार्थ ही लगता है। वह एकदम से राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प तो नहीं बन जाएगा, पर वह इसकी संभावना जरूर खोल रहा लगता है।

दूसरा पहलू यह है कि अनेक दशकों से हमारी राजनीति पर बाजार की जो कड़ी पकड़ है वह शायद ढीली की जा सकती है, इसकी संभावना भी उभरती है। सारे समाज को बाजारू बनाने के विश्वव्यापी अभियान में, जिसमें हमारी व्यापक राजनीति मुदित मन शामिल होती रही है, कुछ अवरोध-प्रतिरोध उभर और सशक्त हो सकता है। तीसरे, पिछले लोकसभा चुनावों में यह लगता था कि अधिकांश युवा और व्यावसायिक निजी हितों से इस कदर आक्रांत हैं कि उन्हें किन्हीं अन्य व्यापक मूल्यों की कोई परवाह नहीं है। ‘आप’ ने इस बार यह साबित किया है कि यह वर्ग इतना स्वार्थी और बिका हुआ नहीं है और वह नए परिवर्तन का आकांक्षी हो सकता है जिनके केंद्र में जन और समाज होगा, बाजार नहीं।

प्राय: सभी टिप्पणीकारों ने भाजपा की निर्णायक और भारी, लगभग शर्मनाक पराजय के लिए उसके हिंदुत्ववादी एजेंडे को किसी हद तक जिम्मेदार बताया है। जो किसी की भी सलाह नहीं मानते ऐसे प्रधानमंत्री को यह सलाह भी दी गई है कि वे इस मामले में अपना दुचित्तापन तज कर इन शक्तियों की मुखर सक्रियता और उनके द्वारा किए जा रहे अनेक कुकर्मों पर लगाम लगाएं और अपने विकास के एजेंडे पर सक्रियता और ठोस ढंग से, अपनी आत्ममुग्ध वाक्पटुता से मुक्त होकर, वापस आएं। अगर इस सलाह पर ध्यान दिया जाता है तो यह भी अतियथार्थ जैसा लगेगा। अन्यथा ऐसी सलाह भी दी ही जा रही है कि उन्हें और उनकी पार्टी को अपने मुख्य हिंदुत्ववादी एजेंडे को तेजी से लागू कर अपना लक्ष्य पाना चाहिए। राजनीति में परिवर्तन तो होते हैं, हृदय-परिवर्तन नहीं! आखिर यह गांधी का युग नहीं है!!

 

नेमाड़े-विवाद

इस बार ज्ञानपीठ पुरस्कार मराठी कथाकार और आलोचक भालचंद्र नेमाड़े को दिया गया। वे इस समय भारत के श्रेष्ठ कथाकारों में से एक हैं और उन्हें पुरस्कृत कर ज्ञानपीठ ने अपनी गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रशंसनीय प्रयत्न किया है। यह प्रयत्न पिछली बार भी शुरू हो सकता था अगर ज्ञानपीठ कृष्णा सोबती को देने का निर्णय लिया गया होता। बहरहाल, इस बार विवाद नेमाड़े के चुनाव को लेकर नहीं है: सभी, जहां तक अपनी खबर है, उन्हें निर्विवाद रूप से ज्ञानपीठ का सर्वथा उपयुक्त सुपात्र मानते हैं। विवाद पुरस्कार मिलने के बाद उनके देशीवाद और अंगरेजी-विरोधी वक्तव्य को लेकर खड़ा हुआ है। कम से कम दो अंगरेजी अखबारों ने संपादकीय लिख कर नेमाड़े के विचारों का विरोध किया है। अगर नेमाड़े को सलमान रुश्दी एक औसत दर्जे के अधिमूल्यित लेखक लगे तो इसका विरोध रुश्दी ने नेमाड़े को लगभग गाली देते हुए उन्हें अपने साहित्य को न पढ़ने-जानने वाला करार दिया है।

यों तो यह आम है कि किसी लेखक को अगर पुरस्कार मिल जाए तो उसके दोस्त बढ़ें-न-बढ़ें दुश्मन जरूर बढ़ जाते हैं। इसलिए इसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि नेमाड़े के दुश्मन भी अब तेजी से बढ़ रहे हैं। इसकी निश्चय ही उन्हें चिंता न होगी और थोड़ा-बहुत पूर्वानुभव भी होगा ही। सारे संसार में ऐसा बौद्धिक माहौल बन गया है कि किसी लेखक के ‘रचे’ से कम उसके ‘कहे’ से अधिक विवाद उपजते हैं। नेमाड़े के उपन्यासों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है, जबकि वे रूप-शिल्प और कथ्य-विचार आदि अनेक स्तरों पर मौलिक और निर्भीक नवाचारी हैं। उनकी आधुनिकता में गांव-शहर का द्वैत ध्वस्त होता है और वे परंपरा और आधुनिकता दोनों को तीक्ष्ण आलोचना-दृष्टि से देखते-समझते हैं। जब औसत दर्जे के अंगरेजी लेखक सिर चढ़ाए जाते हैं और भारतीय भाषाओं के मूर्धन्यों की उपेक्षा होती है, तो नेमाड़े का क्षोभ समझ में आता है। उसे उनकी उजली उपलब्धि और कड़े संघर्ष से अलग कर देखना अधूरा देखना है।

इस पर हम अधिक व्यथित नहीं हो रहे हैं कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था और अन्य नागरिक अधिकरणों में हमारी मातृभाषाओं की उपेक्षा बढ़ती जा रही है: इस अवधारणा का जनमानस से लोप ही हो गया लगता है कि पहला और सच्चा ज्ञानोत्पादन मातृभाषा में ही संभव होता है। उलटे शिक्षा-व्यवस्था में मातृभाषा को अपदस्थ कर अंगरेजी थोपने का विराट अभियान सत्ता और बाजार मिल कर चला रहे हैं। ऐसे में नेमाड़े ने मातृभाषाओं के पक्ष में जो कहा है वह किसी भारतीय भाषी भर की चिंता नहीं, सच्ची नागरिक और लोकतांत्रिक चिंता है। उसे अंगरेजी-विरोध कह कर उसकी भर्त्सना बिल्कुल गलत और नासमझ है।

 

सत्ता की संस्कृति

आमतौर पर हमारे महाविद्यालय किसी ऐसे विषय पर बहस-मुबाहिसा संगठित रूप से नहीं करते, जो बौद्धिक रूप से सघन और प्रासंगिक दोनों हो: वे अक्सर जयंतियां मनाते या रस्म अदा करते हैं। इससे बिल्कुल अलग शहीद भगत सिंह महाविद्यालय नई दिल्ली के हिंदी विभाग ने ‘संस्कृति: सत्ता और स्वाधीनता’ विषय पर दो दिनों में फैला परिसंवाद इसी सप्ताह आयोजित किया, जिसमें इस विषय के अंतर्गत विचारोत्तेजक बातचीत हुई। उसमें हिंदी साहित्य और भाषा के लेखकों-आलोचकों के अलावा संगीत, नृत्य, रंगमंच आदि अनुशासनों के विशेषज्ञ और प्रयोक्ता भी शामिल हुए। सभी सत्रों में छात्रों और अध्यापकों की अच्छी उपस्थिति रही।

सत्ता पर विचार करते समय हम उसे अक्सर राजनीतिक सत्ता तक महदूद कर देते यह भूल कर कि उस सत्ता के अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक सत्ताएं भी समांतर सक्रिय होती हैं। हमारे समय में मीडिया, बाजार, आर्थिक जगत, व्यापार-वाणिज्य आदि के अलावा विश्वविद्यालय, अध्यापक, पाठ्यक्रम, राष्ट्रीय और प्रादेशिक अकादेमियां, पत्रिकाएं और संपादक, विचारधाराएं, लेखक-संगठन, कथावीथिकाएं, प्रकाशनगृह यहां तक कि आलोचक और बुद्धिजीवी आदि भी किसी न किसी रूप में सत्ता का अंग होते हैं। राजनीतिक सत्ता में जो अवधारणाएं, प्रक्रियाएं, संरचनाएं आदि विकसित होती हैं, अन्य अनेक सत्ताएं उनका अनुकरण करती हैं और किसी न किसी रूप में उन्हें आत्मसात करती हैं। हमारे माहौल की विडंबना यह है कि सिर्फ राजनीतिक सत्ता में नहीं, अन्य सभी सत्ताओं में मूल्य-क्षरण हुआ है। सत्ता के सभी रूप मानो अब किसी व्यापक लक्ष्य को संबोधित नहीं हैं- वे स्वयंप्रतिष्ठ हैं। वे अपने ही बारे में हैं- अपने से दूसरे की उन्हें बहुत कम खबर होती है। होती भी है तो अक्सर बाधा या अड़ंगे के रूप में।

शायद हम ऐसे मुकाम पर पहुंच गए हैं कि हमारे समय को अब ‘ब्यूरोक्रेटिक’ समय कहे जाने का औचित्य बन गया है। सब कुछ में बाजार से लेकर मंदिर-मस्जिद तक, खेल से लेकर मनोरंजन तक, टहलने-खाने-पीने-सोने-गाने सब में नौकरशाही घुस गई है। लोकतंत्र में तंत्र को आदर्श रूप में लोक-उन्मुख रहना चाहिए। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि लोक द्वारा बार-बार तंत्र को नियंत्रित-नियमित-संयमित करने की कोशिश होती और वह लगातार नाकामयाब होती है। सत्ता की अवधारणा, संरचना और व्यवहार में मौलिक परिवर्तन की जरूरत है। पर वह कैसे हो, इस पर व्यापक बहस होना अभी बाकी है।

अशोक वाजपेयी

 

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