December 06, 2016

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साहित्य की संकीर्णता

हिंदी में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही साहित्य का राजनीति और समाज से रिश्ता एक नए दौर में प्रवेश करता है।

साहित्य

हिंदी में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही साहित्य का राजनीति और समाज से रिश्ता एक नए दौर में प्रवेश करता है। अपने प्रथम अध्यक्ष की सोच के विपरीत साहित्य को एक दल विशेष की राजनीति का अनुगामी बना देने की व्यवस्थित परियोजना प्रगतिशील लेखक संघ के नेतृत्व में शुरू हुई। इसका एक बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि हिंदी साहित्य की चली आ रही स्वत:स्फूर्त प्रगतिशील परंपरा बाधित हो गई। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रवेश के बहुत पहले हिंदी में समाजोन्मुखता की धारा भारतेंदु युग से ही पल्लवित होती आ रही थी। समाज और राजनीति में हो रही हलचलों पर साहित्य अपने ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कलावाद और रीतिवाद का खंडन कर लोकमंगल की स्थापना कर रहे थे तो प्रेमचंद किसानों, दलितों और स्त्रियों को कथा-साहित्य में केंद्रीयता प्रदान कर रहे थे। सब कुछ सहज और स्वाभाविक था। साहित्य पूरी तरह अपनी अस्मिता को भी बरकरार रखे हुए था और समाज, राजनीति और इतिहास से भी असंपृक्त नहीं था।

प्रगतिशील लेखक संघ से यह स्वाभाविक उम्मीद थी कि वह हिंदी साहित्य की इस समाजोन्मुख परंपरा को अपने सचेत और संगठित हस्तक्षेप से और समावेशी बनाएगा। पर हुआ इसका ठीक उल्टा। मार्क्सवादी समीक्षा की कम्युनिस्ट परिणति ने हिंदी साहित्य की व्यापक प्रगतिशीलता की दलानुशासित प्रगतिशीलता में तब्दील कर दिया। कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियां ही साहित्य के सृजन और मूल्यांकन का आधार बनने लगीं। इस दलानुशासित प्रगतिशीलता ने साहित्य के स्वत्व को नष्ट करके उसे पूरी तरह राजनीति के अधीन कर दिया। इस तरह, प्रगतिशील लेखक संघ ने हिंदी साहित्य की स्वत:स्फूर्त व्यापक प्रगतिशील धारा को अपने सचेत और संगठित हस्तक्षेप से अत्यंत संकीर्ण बना दिया।  इस संकीर्णता का चरम रूप तब दिखाई देता है जब पीसी जोशी की जगह कम्युनिस्ट पार्टी की कमान बीटी रणदिवे के हाथ में आती है और उधर 1949 में रामविलास शर्मा प्रलेस के महामंत्री बनते हैं। डॉ. शर्मा ने पार्टी की संकीर्णतावादी ‘लाइन’ को पूरी निष्ठा के साथ साहित्य में लागू किया। परिणाम यह हुआ कि जिन लेखकों की कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों में आस्था नहीं थी या कम्युनिस्ट होते हुए भी जो कम्युनिस्ट साहित्य नहीं लिख पा रहे थे, वे सभी धीरे-धीरे प्रगतिशील आंदोलन से अलग हो गए या कर दिए गए। अंत में नतीजा यह निकला कि एक बड़ा आंदोलन छोटे से गुट में तब्दील होकर रह गया और अंतत: 1953 में वह सांगठनिक तौर पर पूरी तरह निष्क्रिय हो गया।

जिस कम्युनिस्ट पार्टी से निर्देशित होने के कारण प्रलेस की यह दुर्दशा हुई, उस पार्टी का मानना था कि प्रलेस से पार्टी को फायदा कम, नुकसान अधिक हुआ है। इसलिए प्रलेस को भंग कर देना चाहिए। 1953 के अधिवेशन में पार्टी की ओर से अजय घोष का यही संदेश लेकर नंबूदरिपाद आए थे। पचास के दशक में साहित्य की स्वायत्तता की बात जोर-शोर से उठने लगी। कलावाद ने नए तरीके से साहित्य में अपनी जगह बनाई। सत्रह साल के प्रगतिशील आंदोलन का परिणाम हिंदी कविता में कलावाद की घनघोर वापसी के रूप में दिखाई देता है। एक बड़ा प्रश्न है कि कलावाद, रीतिवाद और साहित्य की समाजविमुखता के खिलाफ लड़ाई में जो सफलता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचंद्र शुक्ल को मिली, वह प्रगतिशील आंदोलन को क्यों नहीं मिली? कई बार तो ऐसा लगता है कि कलावाद और रीतिवाद के विरुद्ध जो निर्णायक विजय आचार्य शुक्ल ने हासिल की थी उसे प्रगतिशील आलोचना ने गंवा दिया।

आचार्य शुक्ल ने कलावाद और रीतिवाद के विरुद्ध संघर्ष साहित्य की जमीन से किया था राजनीति की जमीन से नहीं। साहित्य की लड़ाई जब-जब राजनीति की जमीन से लड़ी जाएगी तब-तब कलावाद का उत्थान भी अवश्यंभावी है। इसलिए कलावाद के विरुद्ध लड़ाई के लिए साहित्य में प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध लड़ाई आवश्यक है। राजनीति के अनुरूप स्थूल समाजशास्त्रीयता और विशुद्ध कलावाद दोनों ही साहित्य के लिए नुकसानदेह हैं, पर ये दोनों एक-दूसरे को खाद-पानी भी मुहैया कराते हैं। साहित्य में स्थूल समाजशास्त्रीयता के विरुद्ध संघर्ष कलावाद से नहीं किया जा सकता, वैसे ही कलावाद के विरुद्ध संघर्ष स्थूल समाजशास्त्रीयता से नहीं किया जा सकता। मार्क्सवादी आलोचना के अतिवाद का जवाब वायवीयता और आत्मग्रस्तता नहीं है और न ही आत्मग्रस्तता और वायवीयता का जवाब मार्क्सवादी अतिवाद है। इस बात को हिंदी में सबसे बेहतर मुक्तिबोध ने समझा था। वे दोहरा संघर्ष कर रहे थे। वे एक तरफ जड़ मार्क्सवाद से लड़ रहे थे तो दूसरी तरफ नई कविता की आत्मग्रस्त और पतनशील प्रवृत्तियों से।

यह अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है कि एक ओर 1936 में शुरू हुआ प्रगतिशील आंदोलन संकीर्ण होता गया तो दूसरी ओर 1943 में शुरू हुआ प्रयोगवाद भी आगे चल कर संकुचित होता गया। ये दोनों आंदोलन गलत दिशा में मुड़ गए या मोड़ दिए गए। ये दोनों अतिवाद का शिकार होकर साहित्य की विशाल भाव-भूमि से कट गए। एक के अतिवाद ने दूसरे के अतिवाद को पोषित किया। दोनों खेमों में अतिवाद से अपने को बचा लेने वाले रचनाकार ही आगे बड़े रचनाकार के तौर पर उभरे। साहित्य के क्षेत्र में वामपंथी संकीर्णता का विरोध करते हुए कलावादी या रूपवादी हो जाना कभी भी बेहतर विकल्प नहीं हो सकता। भारत में ऐसे साहित्य के प्रति आकर्षण की संभावना बहुत क्षीण है। भारतीय मन कम से कम साहित्य में अमूर्तन के साथ बहुत दूर तक नहीं जा सकता। स्थूल समाजशास्त्रीयता या एकांगी वैचारिक लेखन को वह कुछ देर के लिए फिर भी स्वीकार कर लेगा, पर अमूर्तन उसे ग्राह्य नहीं है। प्राय: यह देखा गया है कि वामपंथ का विरोध करने वाले साहित्यकार साहित्य की विशुद्ध स्वायत्तता की वकालत करने लगते हैं। वे यह समझ ही नहीं पाते कि संकीर्ण राजनीतिक चेतना का विकल्प व्यापक राजनीतिक और एकांगी सामाजिक दृष्टि का विकल्प संतुलित सामाजिक दृष्टि ही है। राजनीतिक और सामाजिक संकीर्णता का जवाब राजनीति निरपेक्ष और समाज निरपेक्ष होकर नहीं दिया जा सकता है। भारतीय परिस्थितियां इसकी इजाजत नहीं देती। विजयदेव नारायण साही इसके उपयुक्त उदाहरण हैं कि मार्क्सवादी रचना-दृष्टि का विरोध करते हुए भी सामाजिक और ऐतिहासिक चेतना के प्रति कैसे सजग रहा जाता है।

संकीर्णता और कट्टरता के बावजूद मार्क्सवादी जीवन-दृष्टि और उससे उत्पन्न रचना-दृष्टि ही आज भी साहित्य की मुख्य नियामक दृष्टि बनी हुई है, तो इसका एक बड़ा कारण है कि एक व्यापक जीवन-दृष्टि के साथ इसका संतुलित प्रतिकार नहीं हो पाया है। वामपंथी संकीर्णता खतरनाक है, तो कलावादी संकीर्णता उससे अधिक खतरनाक है। साहित्य के रंगमंच पर वामपंथी गिरोहबाजी है, तो कलावादी गिरोहबाजी भी है। अनुदारता दोनों में है। संख्या की दृष्टि से अधिक होने के कारण वामपंथी गुटबंदी पर तो हमारा ध्यान जाता है, पर कलावादी गुटबंदी प्राय: ओझल रह जाती है। साहित्य को इन दोनों से बचाना आवश्यक है। इसके लिए विभिन्न मतवादों से ऊपर उठ कर एक संतुलित साहित्य दृष्टि की आवश्यकता है, जो साहित्य की सापेक्ष स्वायत्तता को स्वीकार करे। वह न सिर्फ साहित्य की कलात्मकता के प्रति सचेत हो, बल्कि मनुष्य की संवेदना को भी परिष्कृत करे।

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First Published on November 27, 2016 5:08 am

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