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रविवारीय स्तम्भ

कला : अनादृत का अभिषेक

प्रभु जोशी यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि भारत के अलावा दुनिया के किसी भी देश में ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण नहीं मिलता, जहां अपनी...

शिक्षा : कौशल विकास के निहितार्थ

राजकुमार केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, अब उनकी निगाह में शिक्षा का उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक विकास करना है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना की...

विवाद : उपयोग या उपभोग

कुमार अंबुज किसी भी समस्या के निदान के लिए समन्वयवादी तरीका एक आसान रास्ता है, पर वह कितना सही है, विचार होना चाहिए। प्राय:...

विवाद : खूब परदा है

विनीत कुमार वीरेंद्र यादव के लेख ‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’ (21 दिसंबर) पर बात करने से पहले उन्हें औपचारिक बधाई देना जरूरी है।...

समांतर संसार : कचरा बटोरता बचपन

सय्यद मुबीन ज़ेहरा नए वर्ष के आगमन पर सबने थोड़ा-बहुत जश्न मनाया होगा। उसके बाद घर का कूड़ेदान कुछ अधिक भरा नजर आया होगा।...

दक्षिणावर्त : तिरुवल्लुवर कहना तो सीखो

तरुण विजय सिर्फ मैं श्रेष्ठ और बाकी सब मेरा अनुसरण करें, यह दंभ बहुत घातक होता है। अगर भारत केवल तुलसी और वाल्मीकि ही...

कभी-कभार : वर्षारंभ पर

अशोक वाजपेयी जाहिर है कि ये बातें हाशिये से कही जा रही हैं: लगभग हमेशा की तरह साहित्य और कलाएं हाशिये पर हैं। केंद्र...

प्रसंग : अविचारित कार्रवाई

गोपेश्वर सिंह रमेशचंद्र शाह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो हिंदी की आभासी दुनिया में हंगामा हो गया। बधाइयां कम मिलीं, लानत-मलामत ज्यादा हुई।...

सरोकार की लय

अजेय कुमार निर्मला गर्ग के संग्रह दिसंबर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगता की कविताएं वामपंथी दर्शन से प्रेरित हैं। पुस्तक का समर्पण पृष्ठ...

पुस्तकायन : वैचारिक शून्यता के विरुद्ध

पूनम सिन्हा भगवानदास मोरवाल के नए उपन्यास नरक मसीहा में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समाज के विकास की आड़ में मजबूती से जड़ जमा चुके...

निनाद : सक्रिय संघ और मोदी का मौन

कुलदीप कुमार वर्ष समाप्ति की ओर बढ़ रहा है और देश अजीब किस्म की अफरातफरी की ओर। जिस सुशासन का वादा किया गया था,...

अप्रासंगिक : स्मृति की नैतिकता

अपूर्वानंद ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’, यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति की आत्मकथात्मक दुविधा नहीं। समाज और राष्ट्र अक्सर इस प्रश्न से जूझते हैं।...

विवाद : संवाद की पगडंडी

अर्चना वर्मा वीरेंद्र यादव ने ‘पार्टनर’ की ‘पालिटिक्स’ पर सवाल उठाते हुए अपनी तरफ से यह तो साफ कर दिया है कि ‘‘इस चर्चा...

विवाद : नकली क्रांति मुद्राओं का अश्लील प्रदर्शन

नरेश सक्सेना रायपुर साहित्य समारोह पर वीरेंद्र यादव की टिप्पणी (जनसत्ता, 21 दिसंबर) सफेद को काला करने और प्रतिष्ठित रचनाकारों सहित अपने प्रगतिशील साथियों...

खुला खिला उर्वर इलाका

दिनेश कुमार हिंदी में उपन्यास ही एक ऐसी विधा है, जिसमें पिछले कुछ सालों से निरंतरता बनी हुई है। कहानी, आलोचना आदि अन्य गद्य...

केंद्र में उपेक्षित अस्मिता

राजेंद्र उपाध्याय यह वर्ष कविता के लिए कई दृष्टियों से शुभ रहा। वर्ष के शुरू में ही साहित्य अकादेमी की ओर से दो विश्व...

संवाद : प्रतिवादी तर्क का औचित्य

सवाईसिंह शेखावत कुलदीप कुमार का आलेख ‘शब्द छल के सहारे’ (14 दिसंबर) भाजपा के कुनबे की कथित राष्ट्रवादी हरकतों का जायजा लेते हुए उसके...

विवाद : पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

वीरेंद्र यादव ‘‘खड़े क्या हो बिजूके से नरेश/ इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद/ एकबारगी/ तय करो अपना गिरना/ अपने गिरने की सही...

सबरंग