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रविवारीय स्तम्भ

मिथक और मानस रचना

हाल के बीते इतिहास में भी कई देवी-देवताओं के मिथक जो सुप्त थे, जागृत हो कर हमारी जीवन शैली का ऐसा हिस्सा बन गए...

वक्त की नब्ज- तनाव के माहौल में विकास की बातें

मेरठ, मलियाना, हाशीमपुरा, भागलपुर, मुंबई, मुरादाबाद जैसे नाम आज भी अटके हैं मेरे दिमाग में।

बारादरी: केदारनाथ सिंह- कविता से क्रांति नहीं आती

नरेंद्र मोदी पर जो लिखा जाएगा, उसे साहित्य नहीं मानूंगा मैं।

भाषाई भेदभाव की शिक्षा

भारत का एक बड़ा वर्ग भेदभाव का शिकार है। सरकारी नीतियों और प्रावधानों के कारण बड़ी आबादी शिक्षा, रोजगार और न्याय के क्षेत्र में...

चर्चाः भाषा संरक्षण और लिपि

हालांकि भाषाई संकट-ग्रस्तता एक वैश्विक समस्या है, लेकिन भारत इससे सबसे अधिक शिकार देशों में शामिल है।

हकीकत और फसाना

हिंदी के लेखक धीरे-धीरे अपनी जमीन बनाते हैं। उसके लिए उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। हिंदी की दुनिया में बाजार,...

बिक्री तंत्र के नुस्खे

कौतूहलवश नोएडा के एक बड़े मॉल की सबसे बड़ी बुक शॉप शृंखला में यह देखने गया कि घोषित ‘बेस्ट सेलर’ सूची की कौन-सी पुस्तकें...

बाखबर- शोक-स्नान

भारत का गजब कूटनीतिक तख्तापलट! कि तभी उस चैनल पर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की खबर ब्रेक हुई और सभी चंपी चैनलों को...

दूसरी नजर- निजता है व्यक्तिगत आजादी का मूलाधार

राजग के राज में आधार अपने मूल उद््देश्य से बहुत दूर चला गया और इसे वैसी बहुत सारी गतिविधियों के लिए अनिवार्य कर दिया...

वक्त की नब्ज- समस्या कुछ और है

सच यह है कि समस्या ही कुछ और है। असली समस्या यह है कि वामपंथियों का बोलबाला काफी हद तक कम हो गया है...

तीरंदाज- बहुसंख्यकवाद का रास्ता

वास्तव में बहुसंख्यकवाद के जनक राजीव गांधी और कांग्रेस पार्टी है। 1984 से पहले हिंदू वोट को एकजुट करने की कोशिश बड़े पैमाने पर...

बाखबर: अचानक नोटबंदी के फूले हुए गुब्बारे की हवा निकलने लगी!

चार दिन से हर खबर चैनल बाबा लीला को लाइव कवर करने में लगा था, मानो मालूम हो कि कुछ बड़ा घटित होने वाला...

दूसरी नजर- विमुद्रीकरण: एक कड़वी खीर

इसका मतलब है कि काले धन के खात्मे के नाम पर लोगों को जो परेशान किया गया, वह उद्देश्य चिंताजनक रूप से विफल सिद्ध...

वक्त की नब्ज: नए भारत का सपना

हाइवे के दोनों तरफ दिख रही थीं बदसूरत नई इमारतें और पुरानी, बेहाल बस्तियां, जिनकी तंग गलियों में दिख रही थीं गंदी नालियां और...

प्रसंगवश- सूचना से सोचना बंद

सूचनाओं को ज्ञान बना कर बांटने वाले कहते हैं, सोचना बंद करो, सूचनाओं की सेल लगी है, सूचना खरीदो और शिक्षा की फैशन-परेड में...

जनसत्ता बारादरी: विपक्ष को अपनी मर्यादा खुद सीखनी होगी

पार्टी को जनादेश मिलने का गलत अर्थ लगाया जाने लगा है और उसमें एक तरह की तानाशाही आ गई है। वह कांग्रेस मुक्त भारत...

बाखबर- दो दिन जब इंडिया हिल उठी

जो कल तक तीन तलाक के पक्ष में बोलते थे, हकला कर कहने लगे कि ठीक है। अब हम अपना प्रस्ताव लाएंगे, लेकिन मुसलिम...

निजता का आधार

इधर नौकरी-पेशा होने के नाते पिछले वर्षों में कई पहचान पत्र अलग-अलग संस्थाओं ने बनवा कर दिए हैं, जिनको मशीन पर चिपकाने से कई...

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