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दूसरी नज़र : सांख्यिकीय विकास से पेट नहीं भरता

वृद्धि दर चाहे 6.5 फीसद रहे या सात फीसद, यह देश के लिए संतोष का विषय है- अपनी पीठ थपथपाने और उल्लास का नहीं।
Author नई दिल्ली | March 5, 2017 02:35 am
साल-दर-साल भारत में जीडीपी वृद्धि दर का आंकड़ा। (पीटीआई ग्राफिक्स)

केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) एक प्रतिष्ठित संस्थान है। इसके पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् डॉक्टर प्रणब सेन और मौजूदा मुख्य सांख्यिकीविद् डॉ. टीसीए अनंत आदर के पात्र हैं। अमूमन लोगों को उनमें भरोसा होना चाहएि। मुझे है।

इसके बावजूद अगर ये दोनों एक दूसरे की बात काटते दिखें तो कोई क्या करे? 2016-17 की तीसरी तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर) के आंकड़े जारी करते हुए डॉ. अनंत का निष्कर्ष था कि तीसरी तिमाही में सकल वृद्धि दर सात फीसद और पूरे साल की वृद्धि दर 7.1 फीसद रहेगी। इन्हीं आंकड़ों की समीक्षा के बाद डॉ. सेन इस नतीजे पर पहुंचे कि आंकड़े अपूर्ण हैं और संभावना यही है पूरे साल के लिए वृद्धि दर पुनरीक्षित या संशोधित होंगे और यह नीचे जाकर साढ़े छह फीसद रहेगी।

वृद्धि दर चाहे 6.5 फीसद रहे या सात फीसद, यह देश के लिए संतोष का विषय है- अपनी पीठ थपथपाने और उल्लास का नहीं। हालांकि यह वह सवाल नहीं है जो सुधी विश्लेषकों को परेशान कर रहा है। सवाल है, ‘क्या विमुद्रीकरण ने आर्थिक विकास पर बुरा असर डाला है?’ सीएसओ के आंकड़े इस सवाल का जवाब नहीं देते।

सुस्त होती अर्थव्यवस्था
सरकार ने 2016 की शुरुआत में दावा किया था कि विकास दर 7.6 फीसद रहेगी। चलिए मान लेते हैं, विमुद्रीकरण के बाद विकास दर सात फीसद होगी। यह हानिकारक प्रभाव है, और जीडीपी में 0.6 फीसद की गिरावट की कीमत 90, हजार करोड़ बैठती है। विकास दर अगर 6.5 फीसद तक लुढ़क गई तो इसका मतलब है 1,65,000 करोड़ रुपए का नुकसान। इन दोनों में से कोई भी छोटी रकम नहीं है। यह दलील कि विमुद्रीकरण का अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं हुआ या नहीं होगा, थोथी और बचकानी है।

डॉ. सेन और डॉ. अनंत के बीच, डॉ. सेन के निष्कर्षों के पक्ष में झुकाव के लिए वाजिब कारण हैं। बदलाव के बाद जो नई प्रणाली आई है, उसमें सीएसओ सकल मूल्य अनुवृद्धि (जीवीए) और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुमानित आंकड़े भी प्रकाशित करता है। जीवीए एक अनुमान है, जीडीपी वह है जो करों के रूप में हासिल राजस्व में से सबसिडी घटाने के बाद बचता है। आइए पिछले तीन साल के दौरान जीवीए वृद्धि दरों पर नजर डालें :

विमुद्रीकरण से अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को चोट पहुंची सिवाय इन तीन के : (1) सरकारी व्यय पर कोई असर नहीं हुआ और 8 नवंबर, 2016 के बाद वस्तुत: इसमें इजाफा ही हुआ; (2) इससे मानसून पर कोई असर नहीं पड़ा जो कि भरपूर थी और कृषि उपज बढ़ी; (3) जनोपयोगी सेवाओं के राजस्व पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इन सेवाओं के भुगतान के लिए विमुद्रित नोटों के उपयोग की मंजूरी थी और वस्तुत: इससे पुराने बकायों के भुगतान को प्रोत्साहन मिला। लिहाजा, अब सरकारी खर्च, जनोपयोगी सेवाओं और खेती को छोड़ कर जीवीए की वृद्धि दरों पर नजर डालते हैं :

दोनों ही सारणियों को देखें तो निष्कर्ष सरल और स्पष्ट हैं : अर्थव्यवस्था के गैर सरकारी, गैर कृषि क्षेत्रों में 2015-16 की चौथी तिमाही से ही विकास दर सुस्त होने लगी और 2016-17 में यह गिरावट की ओर थी। तीसरी तिमाही के मध्य में विमुद्रीकरण ने इस गिरावट को रफ्तार दी।

प्रासंगिक संख्याएं:
जीवीए में कर राजस्व को जोड़ देने और इसमें से सबसिडी को छांट कर निकाल देने के बाद हम जिस जीडीपी पर पहुंचते हैं, वह उच्च वृद्धि को प्रतिबिंबित नहीं करती। यदि राजकोषीय वर्ष के बीच आबकारी दरें बढ़ा दी जाएं, जैसा कि इस सरकार ने किया है, तो इससे राजस्व तो बढ़ जाएगा पर विकास दर नहीं। यदि राहतों व रियायतों (सबसिडी) को संपीड़ित कर दें, तो इसका अर्थ यह नहीं कि विकास दर बढ़ गई है।

वृद्धि सबसे बेहतर तरीके से बढ़ते निवेश, बढ़ते उत्पादन और रोजगार सृजन में प्रतिबिंबित होती है। जीवीए/जीडीपी आंकड़ों ने भले ही एक हैरानी पैदा की हो, पर बहुत से ऐसे संकेतक हैं जो इशारा करते हैं कि अर्थव्यवस्था में अब और निवेश नहीं हो रहा, और उत्पादन नहीं हो रहा और नए रोजगार सृजित नहीं हो रहे। 2015-16 की तीसरी तिमाही और 2016-17 की तीसरी तिमाही के जीवीए आंकड़ों की तुलना करें। निर्माण, खनन, विनिर्माण, व्यापार/होटल/परिवहन/संचार और वित्तीय सेवा क्षेत्र में, जीवीए विकास दरों में 2016-17 में तीखी गिरावट आई है।

औद्योगिक उत्पाद सूचकांक (आइआइपी) में 2016-17 की तीसरी तिमाही में 0.2 फीसद की बेहद मामूली वृद्धि दर्ज की गई। उद्योगों को बैंक जमाएं या उधार (-) 4.3 फीसद के साथ ऋणात्मक हो गया। जीडीपी के मुकाबले सावधि निवेश का अनुपात 29.3 फीसद से घट कर 26 फीसद हो गया। सितंबर 2016 तक सभी कंपनियों की शुद्ध अचल आस्तियों में (-) 9.36 फीसद तक की गिरावट आ गई थी। ताप बिजली संयंत्र अपनी क्षमता का औसतन 60 फीसद बिजली उत्पादन ही कर रहे थे। फिर भी, यह दावा है कि विमुद्रीकरण का आर्थिक वृद्धि पर कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ!

जिस तरह 2016-17 की पहली और दूसरी तिमाही की वृद्धि दरों के अनुमान को संशोधित कर नीचे लाया गया, उसी तरह संभावना है कि 2016-17 की तीसरी तिमाही के जीवीए अनुमान को भी पुन: समीक्षा के बाद नीचे लाया जाएगा। जब असंगठित क्षेत्र के आंकड़े मिल जाएंगे तो जीवीए वृद्धि दरों में फिर संशोधन होगा और यह और नीचे जाएगा।

अनुत्तरित प्रश्न:
यदि सरकार इस बात को लेकर इतनी आश्वस्त है कि विमुद्रीकरण का अर्थव्यवस्था पर कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ है, तो फिर सरकार विमुद्रीकरण के नतीजों के आंकड़े क्यों नहीं जारी करती? हमारे पैसे निकालने पर लगी पाबंदियां अभी तक क्यों नहीं हटाई गर्इं? भारतीय रिजर्व बैंक अभी तक पुराने तरीके से ही नोट क्यों गिन रहा है? कितने पुराने नोट प्रणाली में वापस लौटे हैं?

विमुद्रीकरण का कौन-सा उद्देश्य हासिल हुआ है? काला धन अब भी पैदा हो रहा है और रिश्वत ली और दी जा रही है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं। जाली नोट भी सामने आए हैं। जीवीए/जीडीपी आंकड़ों के बारे में ढेरों सवाल हैं। ये संख्याएं विमुद्रीकरण को लेकर हमारे सवालों का जवाब नहीं हैं।

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