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दूसरी नज़र: सत्तरवें साल में अर्थव्यवस्था की हालत

कल्पना करें कि 1947 में देश के शासन की बागडोर थामना कितना बड़ा उत्तरदायित्व रहा होगा, जब 83 फीसद लोग निरक्षर थे, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष थी, तब की कीमतों के हिसाब से प्रतिव्यक्ति आय 247 रुपए और बिजली की प्रतिव्यक्ति सालाना खपत 16.3 किलोवाट थी।
Author August 13, 2017 04:43 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

स्वाधीनता, एक लिखित संविधान, संसद के प्रति जवाबदेह सरकार और कानून का शासन, इन सब के कई प्रयोजन और उद््देश्य होते हैं: उनमें से एक यह है कि ये देश के लोगों को आर्थिक व सामाजिक प्रगति की तरफ ले जाएं। कल्पना करें कि 1947 में देश के शासन की बागडोर थामना कितना बड़ा उत्तरदायित्व रहा होगा, जब 83 फीसद लोग निरक्षर थे, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष थी, तब की कीमतों के हिसाब से प्रतिव्यक्ति आय 247 रुपए और बिजली की प्रतिव्यक्ति सालाना खपत 16.3 किलोवाट थी। कमजोर मनोबल वाले यही सोचते कि भारत शासन-योग्य नहीं है। कोई अन्य देश होता, तो उसके राष्ट्रपिता ने संपूर्ण सत्ता हथिया ली होती और निरंकुश होकर अपनी सनकों के हिसाब से सरकार को चलाया होता, अच्छा या बुरा।पर महात्मा गांधी ने ऐसा नहीं किया। वे सरकार में जाने को कतई इच्छुक नहीं थे और वे अपने ढंग से लोक-सेवा के मार्ग पर चलते रहे। जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल और उनके अन्य साथियों ने भी निरंकुशता का रास्ता नहीं चुना, जिन्होंने इस विशाल और परिवर्तनशील देश का शासन चलाने की चुनौती का बहादुरी से और कंधा से कंधा मिलाकर सामना किया।

सफलता के वाहक
भारत ने 15 अगस्त 1947 से एक लंबा सफर तय किया है। सिर्फ अंधे- और ‘भक्त लोग’ (यहां किसी को अपमानित करने का इरादा नहीं है)- कहेंगे कि पिछले सत्तर सालों में कुछ भी नहीं हुआ। वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि-
* जन्म के समय जीवन जीवन प्रत्याशा बढ़ कर 68.34 वर्ष पर पहुंच गई;
* अब प्रतिव्यक्ति आय (मौजूदा कीमतों पर) 1,03,219 रु. सालाना है;
* साक्षरता बढ़ कर 73 फीसद पर पहुंच गई है;
* देश की आबादी में गरीबों का अनुपात घट कर 22 फीसद से भी कम हो गया है;
* अकाल की नौबत न आने देने और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करने में देश सफल हुआ;
* प्लेग, कालाजार, छोटी चेचक और पोलियो को जड़ से मिटाने में देश कामयाब हुआ;
* सीमित संसाधनों में ही देश ने विज्ञान व तकनीक में खासकर अंतरिक्ष अनुसंधान और एटमी ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की।
विकास की इस कहानी में देश के हरेक प्रमुख राजनीतिक दल का योगदान रहा। कांग्रेस के हाथ में 55 साल केंद्र सरकार की कमान रही। गैर-कांग्रेस दलों ने 15 साल शासन किया, और इसमें से 9 साल केंद्र में भाजपा का राज रहा (वाजपेयी और मोदी की अगुआई में)।
भारत का शासन केवल केंद्र सरकार के जिम्मे नहीं होता, इसमें राज्य सरकारों की भी समान भूमिका होती है। लोगों की जिंदगी को सीधे प्रभावित करने वाले विषय राज्य सरकार के तहत आते हैं (देखिए संविधान, सातवीं अनुसूची, सूची-2)। चूंकि राज्यों के स्तर पर राज-काज की गुणवत्ता में काफी असमानता रही है, विभिन्न राज्यों के बीच विकास में भी भारी असमानता दिखती है। 31 मार्च 2017 तक के आंकड़े लें, तो दिल्ली और गोवा में प्रतिव्यक्ति आय क्रमश: 2,49,004 रु. और 2,42,745 रु. थी, जबकि बिहार में प्रतिव्यक्ति आय थी 31,380 रु. (आधार वर्ष 2014-15)।
भारत के निर्धनतम राज्यों में किनकी सरकारें रही हैं? कांग्रेस सन 1989 से उत्तर प्रदेश, सन 2000 से ओड़िशा, सन 1977 से पश्चिम बंगाल और सन 1990 से बिहार (यहां बीस महीने, जुलाई 2017 तक, सरकार में उसकी मामूली भागीदारी थी) की सत्ता में नहीं है। इसलिए इधर के दशकों में इन राज्यों में शासन की दुर्दशा के लिए कांग्रेस को दोष नहीं दिया जा सकता। दूसरी तरफ, भाजपा उत्तर प्रदेश में 1997 से 2002 तक सत्तासीन रही और इस साल से वह फिर यहां की सत्ता की में है; भाजपा 2000 से 2009 के दरम्यान ओड़िशा में और 2005 से 2014 के दरम्यान बिहार में सरकार में शामिल थी, और अब वह एक बार फिर बिहार की सत्ता में साझीदार है।

पांच पैमाने
जब भारत अपनी आजादी के सत्तर साल पूरे कर रहा है, तो इसकी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य की जांच करने का यह उपयुक्त समय है:
* रोजगार: इस बात के अब और भी प्रमाण मौजूद हैं कि हम रोजगार-विहीन विकास के दौर में हैं। भारत की अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली संस्था (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग आॅफ इंडियन इकोनॉमी- सीएमआइई) के मुताबिक इस साल जनवरी से अप्रैल के बीच देश में संगठित क्षेत्र में पंद्रह लाख लोगों की नौकरियां चली गर्इं।
* जीडीपी वृद्धि: सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) की वृद्धि दर में 2015-16 की चौथी तिमाही से लगातार गिरावट का क्रम रहा है, और इसी तरह जीडीपी की वृद्धि दर में भी।
* निवेश: 2015-16 की चौथी तिमाही से 2016-17 की चौथी तिमाही के बीच, बारह महीनों में, स्थिर कीमतों पर, कुल निश्चित पूंजी निर्माण 30.8 फीसद से गिर कर 28.5 फीसद पर आ गया। यह 2013-14 में 32.6 फीसद पर और 2011-12 में 34.31 फीसद की ऊंचाई पर था (आधार वर्ष 2011-12)।
* ऋण वृद्धि: 2016-17 समाप्त हुआ 8.16 फीसद की ऋणवृद्धि के साथ, जो कि पिछले दस साल की औसत सालाना वृद्धि से एक-आधा फीसद कम था।
* औद्योगिक उत्पादन: पिछले तीन सालों में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की गति बेहद सुस्त रही है, मई 2014 में 111 से जून 2017 में 119.6 पर।

बिना खुशी का जश्न
ये पांच पैमाने प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के डैशबोर्ड पर होने चाहिए, पर लगता है ऐसा नहीं है। दोनों दुनिया की हर चीज पर बोलते हैं, अर्थव्यवस्था को छोड़ कर। लोगों का ध्यान आर्थिक विपदा से हटा कर राजनीतिक मुद््दों पर ले जाने में प्रधानमंत्री को महारत हासिल है। वित्तमंत्री कुछ असंगत आंकड़े उछाल कर खुश हो लेते हैं, भले उन आंकड़ों को प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री विश्वसनीय न मानें। सरकार के पास शायद ही कोई व्यक्ति हो, जो कभी-कभार ही सही, सत्ता के सामने सच बोलने की हिम्मत दिखाए।
इस सब के बावजूद, सरकार भारत की आजादी की सत्तरवीं सालगिरह का ‘जश्न’ मनाएगी। इसमें कौन लोग शामिल होंगे? वे 22 फीसद नहीं, जो भारतीय समाज के पिरामिड का एकदम निचला हिस्सा हैं, न तो किसान, न उद्यमी और न उनके कामगार, न रोजगार की तलाश में भटकते युवा, न वे जिन्हें शिक्षा ऋण और उच्च शिक्षा पाने से रोक दिया गया है, न औरतें, न दलित, और न तो अल्पसंख्यक। यह बिना खुशी का जश्न होगा।

 

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  1. A
    Ajay
    Aug 14, 2017 at 12:22 pm
    आजादी के समय, हम चीन से आगे थे। विश्व की पांच बडी अर्थव्यवस्था मे शामिल थे। ये बात भी तो बता दो,
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    Reply
    1. D
      deshbandhutyagi
      Aug 13, 2017 at 7:18 am
      ●●●●तीसरी नज़र●●●● दूसरी न ज र के लगभग सभी तथ्य ी हैं । लेकिन तुम सभी नेता लोग क्या ये बता सकेंगे की जब हरित क्रांति और अन्न आ त् म नि र भ र ता दाता , जो देश में 60 से भी आधिक हैं और उन पर 12.8 लाख करोड़ का कर्ज है । लग भ ग 19000 किसान ना आ त् म ह्त्या कर रहे हैं तब देश में गरीबी का आन्खडा 22 कैसे है ? चि द म् ब र म साब जेटली को बी साथ ले लीजे और इस का ह्ल खोज के बताएं । अन्यथा किसी बेसिक स्कूल के सख़्त टीचर से अपनी पेन्ट स्वम उतार उ स से कहो की तुम्हारे ड़ पर कम से कम 5 कम्मच शेहतूत की लगाये । जिससे तुम्हारी खाल उधड जाए । तुम्हारे बेटे की केपिटल और जेटली के 80 लाख घ र रक्खें कैश का हिसाब तो पता तो चले ।
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