April 27, 2017

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दूसरी नज़र: यहां जीत वहां सेंध

त्रिशुंक विधानसभा की सूरत में सरकार के गठन को लेकर एक अलिखित नियम रहा है, जो बिल्कुल साफ है। जिस पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिली हों, सरकार के गठन के लिए उसे ही सबसे पहले आमंत्रित किया जाएगा।

Author March 19, 2017 04:13 am
गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपने दफ़्तर में मौजूद मनोहर पर्रिकर (Source-PTI)

पांच राज्यों के चुनावों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर) में एक सामान्य बात थी: नतीजे सत्तारूढ़ दलों के खिलाफ आए। भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब को गंवा दिया, मगर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उसकी शानदार जीत हुई। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश को खो दिया। गोवा और मणिपुर में अस्पष्ट परिणाम आए।जहां स्पष्ट बहुमत वाले नतीजे आए वहां विजेता दलों की सरकारें बननी ही थीं। लेकिन गोवा और मणिपुर में हारने वाली पार्टी ने सत्ता को चोरी से हड़प लिया। त्रिशुंक विधानसभा की सूरत में सरकार के गठन को लेकर एक अलिखित नियम रहा है, जो बिल्कुल साफ है और पहले के उदाहरण भी इसकी पुष्टि करते हैं। जिस पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिली हों, सरकार के गठन के लिए उसे ही सबसे पहले आमंत्रित किया जाएगा। अगर चुनाव-पूर्व के किसी गठबंधन को सर्वाधिक सीटें मिली हों, तो सरकार बनाने का न्योता सबसे पहले उस गठबंधन को दिया जाएगा। इस नियम या परिपाटी के मुताबिक कांग्रेस को गोवा (17/40) और मणिपुर (28/60) में सरकार बनाने का न्योता दिया जाना चाहिए था।

हारने वाले पर मेहरबानी

भाजपा ने लोक-लाज तज कर घोर ढिठाई का परिचय दिया। दोनों राज्यों के राज्यपाल भाजपा पर मेहरबानी लुटा कर खुश थे जहां पार्टी दूसरे नंबर (गोवा में 13/40 और मणिपुर में 21/60) पर आई। इसीलिए मैं कहता हूं कि इन दो राज्यों में चुनाव को चुरा लिया गया। ऐसे उदाहरण थे, जिनका कांग्रेस और भाजपा के मामले में अनुसरण किया जाना चाहिए था। वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में, कांग्रेस को काफी नुकसान उठाना पड़ा, पर 197 सीटों के साथ वह सबसे बड़ी पार्टी थी। जनता दल 143 सीटें पाकर काफी अंतर के साथ दूसरे नंबर पर था। राष्ट्रपति आर वेंकटरामन ने सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी के नेता राजीव गांधी को न्योता दिया। राजीव गांधी ने विनम्रता से मना कर दिया, यह देखते हुए कि जनादेश कांग्रेस सरकार के विरुद्ध आया था। फिर, सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति ने वीपी सिंह को आमंत्रित किया। बाकी बातें इतिहास हैं। आर वेंकटरामन, राजीव गांधी और वीपी सिंह, तीनों ने वही किया जो नियम-कायदे के अनुसार करना चाहिए था। राष्ट्रपति ने जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया, प्रक्रिया कई दिनों में पूरी हुई, मगर उस बीच देश पर कोई विपत्ति नहीं आ गई।

शेष कथा नौ महीनों बाद पूरी हुई। जनता दल विभाजित हो गया, वीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया, और राष्ट्रपति नई सरकार की संभावना तलाशने लगे। उन्होंने एक बार फिर राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। राजीव गांधी ने पुन: मना कर दिया, और सुझाव दिया कि जनता दल के टूटे हुए धड़े के नेता चंद्रशेखर को सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए; कांग्रेस उनका समर्थन करेगी। हमेशा सावधानी बरतने वाले आर वेंकटरामन ने पहले चंद्रशेखर को समर्थन का पत्र कांग्रेस से लिया और फिर उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।

दूसरा उदाहरण और भी अकाट्य है। वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा सबसे बड़ी पार्टी (161 सीटें) के रूप में उभरी थी, पर यह एकदम साफ था कि वह न तो बहुमत साबित कर सकती है न बहुमत लायक गठबंधन बना पाने की स्थिति में है। कांग्रेस (140 सीटें) ने गैर-भाजपा सरकार के लिए बाहर से समर्थन की पेशकश की थी। फिर भी, अटल बिहारी वाजपेयी को, जो कि उस वक्त लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता थे, सरकार बनाने का न्योता मिला। उनकी सरकार तेरहवें दिन विश्वास मत परीक्षण में हार गई। सरकार बनाने का अगला न्योता देव गौड़ा को मिला था।

परिपाटी, अब कानून

इस नियम- या परिपाटी- कि सरकार के गठन के लिए सबसे बड़ी पार्टी के नेता को पहले बुलाया जाए- का अपवाद सिर्फ चुनाव-पूर्व गठबंधन की सूरत में हो सकता है। चुनाव-पूर्व गठबंधन को एक राजनीतिक समूह माना जा सकता है, और अगर वह सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में उभरता है, तो उसे सरकार बनाने का अधिकार है। चुनाव बाद भी गठबंधन बन सकता है, पर वह सरकार बनाने का अधिकारी तभी हो सकता है जब सबसे बड़ी पार्टी या चुनाव-पूर्व का गठबंधन सरकार के गठन में नाकाम हो जाए। इसके अलावा, ऊपर उल्लेख किए गए सिद्धांत अब महज परिपाटी या नैतिक निर्धारण भर नहीं हैं। संवैधानिक मामलों के मान्य विशेषज्ञ फली नरीमन के मुताबिक ये सिद्धांत अब कानून हैं। पांच, सात और नौ जजों के सर्वोच्च न्यायालय के पीठों ने इन सिद्धांतों पर मुहर लगाई है। इस संबंध में रामेश्वर प्रसाद मामले (2006) और नबम रेबिया मामले (2016) के हवाले दिए जा सकते हैं। फरीमन ने इस पर अफसोस जताया कि क्यों सुप्रीम कोर्ट के फैसले (मंगलवार, 14 मार्च) ने इस पहलू की पूरी तरह अनदेखी कर दी।

खुलेआम हेकड़ी

गोवा इसका भयानक उदाहरण है। सत्तारूढ़ भाजपा को बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा। मुख्यमंत्री समेत उसके आठ में से छह मंत्री अपनी सीट गंवा बैठे। राजनीतिक औचित्य यही था कि भाजपा विपक्ष में बैठती। लेकिन अपने असीमित संसाधन झोंक कर, भाजपा ने छोटी पार्टियों को अपने जाल में फंसा लिया और जिस दिन नतीजे आधिकारिक रूप से घोषित हुए उसी दिन कुछ ही घंटों के भीतर सरकार बनाने का दावा ठोंक दिया। अनुगृहीत राज्यपाल एक मौकापरस्त गठबंधन पर कृपा करके बहुत खुश थे, जिस गठबंधन में वह गोवा फारवर्ड पार्टी (जीएफपी) भी शामिल थी, जिसने चुनाव के दौरान भाजपा पर जमकर हमला बोला था और कांग्रेस के एक अघोषित सहयोगी के तौर पर चुनाव लड़ा था! चुनाव बाद जीएफपी को पाला बदलने का इनाम मिला- उसके सभी तीन विधायक मंत्री बन गए!

मणिपुर का मामला भी ऐसा ही है। सत्तारूढ़ रही कांग्रेस को पराजय का मुंह देखना पड़ा, पर वह सबसे बड़ी पार्टी थी। इसलिए सरकार के गठन के लिए उसे बुलाया जाना चाहिए था। बेशक, इस परिपाटी के कुछ विचलन अतीत में हुए हैं, लेकिन वह एक दुष्कृत्य को दोहराने का तर्क नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की जीत उसे वर्तमान भारत की सबसे प्रभावी पार्टी साबित करने के लिए पर्याप्त थी। गोवा और मणिपुर को भाजपा के पाले में खींचने की कोई जरूरत नहीं थी।
लेकिन चोरी से सत्ता हासिल करके भाजपा ने लोकतंत्र के रूप में भारत की साख पर बट्टा लगाया है।

 

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First Published on March 19, 2017 4:03 am

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