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दूसरी नजर : कश्मीर सिर्फ भूखंड नहीं

‘‘युवा कश्मीरी इस बात को लेकर गुस्से में हैं कि सेना लगातार उनके बीच मौजूद है, और दूसरे, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम सुरक्षा बलों को उन्हें जान से मारने का अधिकार देता है।"
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 10:24 am
पी चिदंबरम

मुझे इस पर तनिक आश्चर्य नहीं कि कश्मीर घाटी में उबाल आया हुआ है। अचरज की बात यह है कि यह उबाल और लोगों का बगावत पर उतर आना मुफ्ती मोहम्मद सईद के इंतकाल के इतने महीनों बाद हुआ। हमें ‘कश्मीर’ को परिभाषित करना चाहिए। अधिकतर लोगों के लिए यह एक और राज्य है जो भारत के भूगोल का हिस्सा है। भारत में इसका विलय 15 अगस्त 1947 को आजादी हासिल होने के भले दो महीने बाद हुआ हो, यह भारत का अभिन्न अंग है। ये शब्द अर्थगर्भित हैं: राज्य, भारतीय भूभाग, और भारत का अभिन्न अंग। इनमें जोर जमीन पर है।

कुछ अन्य लोगों के लिए (विवेकी लोग, जिनकी तादाद कम है) कश्मीर का मतलब है कश्मीर घाटी के लोग, समस्त सत्तर लाख लोग। वे कश्मीर के अनूठे इतिहास को मानते हैं और उन विशिष्ट परिस्थितियों से वाकिफ हैं जिनमें कश्मीर का विलय भारत में हुआ। इस अनूठेपन को भारत के संविधान में अनुच्छेद 370 के जरिए मान्यता दी गई। इसमें जोर जनता पर है।

दूरंदेशी से दूर
बहुत वर्षों से- और अब भी- केंद्र की सरकारों के रुख में दूरदर्शिता की कमी रही है, वे समझती रही हैं कि समस्या (कश्मीर की) भूमि को लेकर है और इस भूमि की रक्षा हर कीमत पर की जानी चाहिए। ऐसा कुछ भी कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, जो इस भूमि पर भारत सरकार की संप्रभुता पर सवाल उठाता हो। भारी तादाद में पुलिस और सेना की तैनाती करके भारत की संप्रभुता का जोरदार इजहार किया जाएगा और उसकी रक्षा की जाएगी। सुरक्षा बलों को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के रूप में कानूनी कवच मुहैया कराया जाएगा।

यह वैध दृष्टिकोण है। इस नजरिए से तमाम राजनीतिक पार्टियां इत्तिफाक रखती हैं (तनिक हेरफेर के साथ)। सेना और अन्य सुरक्षा बलों का भी यही रुख है। फिर भी, कहना होगा कि इस दृष्टिकोण में दूरदर्शिता नहीं है। यह हमें समाधान के करीब नहीं ले जाता। कश्मीर के लोगों और शेष भारत के बीच की दूरी साल-दर-साल बढ़ती ही गई है। यह दोहराते हुए कि जम्मू व कश्मीर (कश्मीर घाटी समेत) भारत का हिस्सा है, हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि कश्मीर समस्या के मूल में भूमि नहीं, बल्कि लोग हैं जो कश्मीर घाटी में रहते हैं।

आजादी के कई अर्थ
कश्मीर घाटी के लोग क्या चाहते हैं? यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर गया था। हमने वहां दो दिन बिताए और कुल सोलह घंटों में सैकड़ों लोगों से मिले। इनमें जीवन के सभी क्षेत्रों के लोग थे- राजनीतिक, शिक्षाविद, विद्यार्थी, युवा नेता, सामाजिक संगठन, और अनेक लोग, जो व्यक्ति के तौर पर मिलने आए थे। उनमें से कइयों की जुबान पर ‘आजादी’ शब्द आया, पर उस इस लफ्ज का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग था। इसका मतलब अलग-अलग चीजें थीं, जैसे आत्म-निर्णय, स्वाधीनता, स्वायत्तता, स्व-शासन या अधिकारों का हस्तांतरण। शायद ही किसी ने खुले तौर पर भारत से अलग होने और पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने की वकालत की हो।
एक कॉलेज की छात्रा ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात में जो कहा वह मेरे स्मृति-पटल पर अंकित है। वह ‘आजादी’ चाहती थी और उसने कहा, ‘सुरक्षा बलों को यहां से हटाइए।’ हमने उससे पूछा, ‘यहां से हटा कर कहां ले जाएं?’ बिना हिचकिचाए उसने कहा, ‘भारत-पाकिस्तान की सरहद पर।’ तो, ‘आजादी’ से उसका क्या आशय है? वह मानती है- और यह उसके जवाब से जाहिर है- कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है और कि सेना द्वारा सीमा की रक्षा जरूर की जानी चाहिए, लेकिन वह महसूस करती है कि सुरक्षा बलों की भारी तैनाती दमनकारी, अपमानजनक और अस्वीकार्य है।

जम्मू-कश्मीर आने वालों में ज्यादातर अपने मन में यही छाप लेकर जाते हैं। जम्मू-कश्मीर, और खासकर कश्मीर घाटी का नजारा दखल किए हुए क्षेत्र की तरह दिखता है। लोगों का ऐसा खयाल है कि दिल्ली की सरकारों ने कभी कश्मीर के लोगों का भरोसा नहीं किया। दो साल की अति-राष्ट्रवादी बयानबाजी, बहुसंख्यकवादी सनक में लगाई गई बंदिशों और धर्म के आधार पर होने वाले ध्रुवीकरण ने अविश्वास को और गहराया ही है।

मुफ्ती मोहम्मद की उपस्थिति आश्वस्तिकारी थी और वे कश्मीर तथा भारत सरकार (शेष भारत) के बीच अविश्वास की खाई पाट सकते थे। भाजपा के साथ गठबंधन करने से उनके दामन पर एक दाग लगा, लेकिन जब तक वे जीवित रहे, एक शख्स था जिसका कद और नैतिक प्रभाव ऐसा था कि वह आक्रोशित युवाओं को शांत कर सके। अफसोस, वे इस दुनिया में नहीं हैं, और पीडीपी-भाजपा गठबंधन कोई दृष्टि या दिशा न होने से लड़खड़ाते हुए चल रहा है। आतंकवादी घटनाओं में तेजी दिख रही है, और कश्मीरी युवा विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं, उस चीज के खिलाफ, जिसे वे दमन और ताकत का बेजा इस्तेमाल मानते हैं। यह नब्बे के दशक की वापसी जैसा है, यह निश्चित रूप से 2010 के बेहद मुश्किल वर्ष जैसा है, जिसे यूपीए ने अपने दूसरे कार्यकाल में और उमर अब्दुल्ला की सरकार ने झेला था।

हासिल गंवाया, आगे का रास्ता?
सुरक्षा बलों की तैनाती घटाने और वार्ताकारों के तीन सदस्यीय समूह द्वारा किए गए शानदार काम का सकारात्मक प्रभाव लगभग पूरी तरह धो दिया गया है। वर्ष 2011 से 2015 के बीच जो कुछ हासिल हुआ उस पर जनवरी 2016 के बाद हुई घटनाओं ने पानी फेर दिया है। यह आकलन पढ़िए, जो एक ऐसे शख्स का है जिनकी लंबे समय से कश्मीर के हालात पर नजर रही है:

‘‘युवा कश्मीरी इस बात को लेकर गुस्से में हैं कि सेना लगातार उनके बीच मौजूद है, और दूसरे, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम सुरक्षा बलों को उन्हें जान से मारने का अधिकार देता है, जिसके लिए कोई सजा नहीं होगी। वे वास्तविक राजनीतिक बदलाव चाहते हैं, न कि उन राजनीतिकों को, जो भरोसे के काबिल नहीं दिखते और जो लंबे समय से सत्ता की गोटियां बिठाते रहे हैं। वे कारोबार केमौके चाहते हैं, न कि हजारों करोड़ रुपए की ऐसी रकम, जो मेहरबानी के तौर पर दी जाती है, मगर जो रोजगार पैदा करने लिए सरकारी निवेश के रूप में नहीं लगाई जाती। वे आग पर तेल नहीं, पानी चाहते हैं।’’

इन पंक्तियों के लेखक चैतन्य कालबाग भाजपा या सरकार के विरोधी नहीं हैं। उनकी चेतावनी दूरंदेशी-भरी है और इस ओर इशारा करती है कि क्या किया जाना चाहिए। दूसरे भी बहुत-से लोग ऐसा ही सोचते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से वे लोग नहीं, जो सत्ता में हैं। राम माधव की यह टिप्पणी देखिए, जो जम्मू-कश्मीर के मामलों में भाजपा के रणनीतिकार और नीति-निर्धारक हैं: ‘सरकार अविचलित रहेगी, चाहे कुछ भी हो।’

राम माधव उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सोचते हैं कि कश्मीर भूमि की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए। चैतन्य कालबाग उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सोचते हैं कि कश्मीर के लोगों का भरोसा जीतने की जरूरत है। इन दृष्टिकोणों के बीच कश्मीर की त्रासदी अवस्थित है।

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  1. A
    APS
    Jul 17, 2016 at 2:49 pm
    गुड आर्टिकल
    Reply
  2. M
    manoj mago
    Jul 17, 2016 at 4:00 am
    इंडिांद र लकी एंड ब्लेस्ड तो हैविंग तो रीड थे आर्टिकल्स ऑफ़ chidu
    Reply
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