December 04, 2016

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पी. चिदंबरम का कॉलम – दूसरी नज़र: स्थिति की सही समझ

शिखर सम्मेलन से पहले भारत एक विषय से आक्रांत था: पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सामान्य पैमाने से भी यह एक लंबी विज्ञप्ति थी, जिसमें 109 पैराग्राफ थे, जिन्हें नंबर से नहीं बल्कि गोल निशान से चिह्नित किया था। मैं कल्पना कर सकता हूं कि क्या हुआ होगा, जब अफसरान विज्ञप्ति तैयार करने के लिए जमा हुए होंगे। मुझे वह किस्सा याद आ रहा है कि कैसे ऊंट की रचना हुई: ईश्वर ने घोड़े की डिजाइन बनाने के लिए एक समिति गठित की थी, और जब ईश्वर ने उस डिजाइन में प्राण-संचार किया, ऊंट पैदा हो गया! विज्ञप्तियां लंबी होती हैं, पर उनका जीवन छोटा होता है। एक विज्ञप्ति तभी तक के लिए होती है जब तक नई विज्ञप्ति नहीं आ जाती। राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री) विज्ञप्तियों पर बहुत कम ध्यान देते हैं। ऐसा मौका विरल होता है कि कोई देश या नेता विज्ञप्ति में कोई खास बात प्रमुखता से शामिल कराने के इरादे से अन्य नेताओं/देशों को मनाने के लिए अपना काफी वक्त, कूटनीतिक उद्यम और निजी प्रभाव झोंक दे। ब्रिक्स का गोवा शिखर सम्मेलन ऐसा ही विरल अवसर था।

भारत की मुख्य चिंता

शिखर सम्मेलन से पहले भारत एक विषय से आक्रांत था: पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद। जब से नियंत्रण रेखा पार कर कार्रवाई हुई (29 सितंबर, 2016), सरकार और भाजपा इस बात के लिए पूरी तरह कटिबद्ध रहे हैं कि सैन्य कार्रवाई से जितना भी बन सके, राजनीतिक फायदा उठाया जाए, जबकि विदेश सचिव ने उचित ही इसे ‘लक्षित, सीमित और आतंकवाद-निरोधक कार्रवाई’ कहा। इस मुद््दे के सहारे राजनीतिक बढ़त बनाने वालों ने वैसी ही उम्मीद की थी, जब भारत एक ऐसे समूह की बैठक में शिरकत कर रहा था जो दुनिया की तैंतालीस फीसद आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रधानमंत्री ने कुछ बहुत ही सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, पाकिस्तान ‘आतंकवाद को गले लगाता है और इस बुराई को प्रतिबिंबित करता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद पाकिस्तान का ‘प्यारा बच्चा’ है। एक दूसरे भाषण में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ‘आतंकवाद का जनक’ है।
लिहाजा, इस शिखर सम्मेलन से काफी अपेक्षाएं थीं। हमने मान लिया था कि पाकिस्तान अलग-थलग पड़ जाएगा, बुरे काम के लिए निंदित होगा, और निर्वासित होकर, उत्तर कोरिया से हाथ मिलाएगा, एक बहिष्कृत की तरह। हम मान कर चल रहे थे कि उड़ी हमले के संदर्भ में जैश-ए-मोहम्मद का जिक्र होगा, जो कि होना ही चाहिए, और लश्कर-ए-तैयबा का भी, जिसने 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमलों को अंजाम दिया था।

निराशाजनक बयान

ब्रिक्स के गोवा शिखर सम्मेलन का बयान जारी हुआ, तो हमने पाकिस्तान का जिक्र ढूंढ़ने के लिए सारे पैराग्राफ छान डाले। पर उसका जिक्र कहीं न मिला। हमने आंखें मलीं, विज्ञप्ति दुबारा पढ़ी, पर उसका उल्लेख कहीं न था। हमने सोचा, शायद कहीं उड़ी हमले का जिक्र होगा और भारत के प्रति सहानुभूति के कुछ शब्द होंगे। पर वे भी नदारद। जो हाथ आया वह पैराग्राफ 57 में दुबके हुए ये शब्द थे: ‘‘हम हाल में भारत में हुए उस हमले समेत ब्रिक्स देशों में हुए हमलों की कड़ाई से भर्त्सना करते हैं।’’

यहां ‘उस’ शब्द का क्या अर्थ था? क्या यह उड़ी हमले का क्षोभ-भरा जिक्र था? किसी ने भारत की जनता को यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि उन्नीस सैनिकों की जान लेने वाले उड़ी हमले के एक महीने के भीतर भारत में हुए शिखर सम्मेलन के बयान में उस हमले का जिक्र क्यों नहीं हुआ।
इतना ही नहीं। नीचे के दो पैराग्राफ में भारत समेत दुनिया के लिए एक संदेश था: ‘‘सभी आतंकवाद-निवारक उपायों में अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों का खयाल रखा जाना चाहिए।’’ आतंकवाद-रोधी कदम वे देश उठाते हैं जो आतंकी हमलों से पीड़ित होते हैं। क्या बयान इस तरफ इशारा कर रहा था कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया? क्या बयान में इस ओर संकेत था कि भारत ने मानवाधिकारों का लिहाज नहीं किया?

स्वार्थ हावी

हालांकि ब्रिक्स के बयान में न तो उड़ी हमले का कोई जिक्र था न पाकिस्तान का, न जैश-ए-मोहम्मद का और न ही लश्कर-ए-तैयबा का, लेकिन बयान में एक कुख्यात आतंकी समूह आइएसआइएल का नाम आया। इसके अलावा सिर्फ एक और आतंकी समूह का नाम है, जभात अल-नुसरा। ये जिक्र संयोग-भर नहीं हैं। रूस और चीन, दोनों आइएसआइएल (जो कि आइएसआइएस के नाम से भी जाना जाता है) से खतरा महसूस करते हैं। सीरिया में रूस की खास दिलचस्पी है, इसलिए आइएसआइएल व जभात अल-नुसरा का जिक्र हुआ। रूस और चीन को एकदम इन्हीं वजहों से पाकिस्तान की हिमायत की जरूरत है।
पिछले महीने रूस ने पाकिस्तान के साथ एक सैन्य अभ्यास संपन्न किया। संयुक्त राष्ट्र में, मसूद अजहर को आतंकी ठहराने और उसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के भारत के प्रस्ताव पर चीन ने पानी फेर दिया। ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन के बाद, चीन एक कदम और आगे बढ़ा, और भारत के जले पर नमक छिड़कते हुए उसके प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हर कोई जानता है कि भारत और पाकिस्तान आतंकवाद से पीड़ित हैं। पाकिस्तान ने आतंकवाद से लड़ने के भारी प्रयत्न किए हैं और काफी कुर्बानियां दी हैं। मैं समझता हूं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसका सम्मान करना चाहिए।’’

यह है वास्तविक दुनिया। यह दुनिया दो ऐसे देशों के बीच, जो एटमी हथियारों से लैस हैं, टकराव बढ़ने से आशंकित है, और इसलिए, इस आग में और घी नहीं डालना चाहती। इसके अलावा, हर देश के स्वार्थ हैं। रूस के लिए, अफगानिस्तान की स्थितियों और आइएसआइएस से खतरा है जो उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और किर्गिज्तान से होकर धमक सकता है। चीन के लिए पाकिस्तान में लगी उसकी पूंजी और ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच मायने रखती है।
यह सब कहने का यह मतलब नहीं कि दुनिया में भारत मित्र-विहीन है। यहां जोर देकर सिर्फ यह बात कही गई है कि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तान भी दुनिया में मित्र-विहीन नहीं है। उड़ी हमले के बाद, सेना को नियंत्रण रेखा पार कर कार्रवाई की इजाजत देकर सरकार ने सही किया। सेना ने भी सैन्य कार्रवाई महानिदेशक (डीजीएमओ) के जरिए नपा-तुला बयान देकर सही किया। जो संदेश दिया जाना था, चला गया, इसके बाद हद की पहचान की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और समर्थन की ढेर सारी उम्मीदें बांधी गर्इं। यही कारण है कि ब्रिक्स के हमारे साझेदारों के रुख के चलते भारत की जनता को इतनी मायूसी हुई।

कम से कम अब तो सरकार को ‘रणनीतिक संयम’ में निहित समझदारी को स्वीकार करना चाहिए। यह शब्दाडंबर व धूम-धड़ाके से पिंड छुड़ाने तथा निरोधक उपायों, कूटनीति, बातचीत और काम की तरफ लौटने का वक्त है।

 

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First Published on October 23, 2016 2:13 am

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