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दूसरी नजर: बर्र के छत्ते को न छेड़ें

हिंदी और अंग्रेजी ने शांतिपूर्वक साथ-साथ रहना सीख लिया है! हिंदी को अपना स्थान मालूम है और अंग्रेजी को अपना, और कुछ स्थानों पर दोनों बातचीत की एक अनोखी और उभरती हुई भाषा में साझीदार हैं, जिसे हिंग्लिश नाम दिया गया है!
Author April 30, 2017 03:54 am
प्रतीकात्मक चित्र।

पिछले हफ्ते मैंने खुद को एक अजीब स्थिति में पाया, एक संसदीय समिति की रिपोर्ट को न तो स्वीकार कर सकता था न उससे पल्ला झाड़ सकता था! सरकारी पद संभालने की चुनौतियां ऐसी होती हैं। राजभाषा पर संसदीय समिति का गठन पहली बार 1976 में हुआ। परिपाटी के मुताबिक गृहमंत्री इस समिति का पदेन अध्यक्ष होता है। समिति में बीस सदस्य लोकसभा से और दस सदस्य राज्यसभा से होते हैं। यह चुनाव केवल एक औपचारिक कार्यवाही है, क्योंकि समिति में विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व संसद के दोनों सदनों में उनके संख्याबल के अनुपात में होता है और वे उसी के हिसाब से अपने उम्मीदवार मनोनीत करते हैं।

हिंदी के हिमायती

समिति का मकसद हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना है। राजनीतिक दल अमूमन हिंदी के हिमायतियों को समिति के लिए नामांकित करते हैं। स्वाभाविक ही, समिति के सारे नहीं, तो अधिकतर सदस्य जरूर ऐसे होते हैं जो सभी आधिकारिक कामों में हिंदी का इस्तेमाल बढ़ाने के उपाय सुझाना अपना कर्तव्य समझते हैं। दिसंबर, 2008 में मेरे गृहमंत्री बनने के बाद मुझे समिति का अध्यक्ष बनाया गया। सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी समिति के उपाध्यक्ष थे, जो हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के प्रबल पैरोकार थे। तीस सदस्य विभिन्न उप-समितियों में रखे गए थे। सबसे महत्त्वपूर्ण उप-समिति थी, मसविदा एवं साक्ष्य उप-समिति। समिति के उपाध्यक्ष इसके प्रमुख होते थे।

जहां तक मुझे याद आता है, साक्ष्य हिंदी में रिकार्ड किए जाते थे और रिपोर्ट भी हिंदी में तैयार की जाती थी। पूर्ण समिति, कुछ बहस-मुबाहिसे के बाद, रिपोर्ट स्वीकार कर लेती थी। मुझे याद है कि विचार-विमर्श हिंदी में होते थे, और मैं ज्यादातर समय चुप और हैरान श्रोता ही बना रहता था! जाहिर है, सदस्यों के भारी बहुमत का दृष्टिकोण रिपोर्ट में समाहित सिफारिशों में प्रतिबिंबित होता था। समिति के अध्यक्ष को कोई असाधारण अधिकार हासिल नहीं थे, और निश्चय ही वह बहुमत के, और इस मामले में तो भारी बहुमत के दृष्टिकोण को खारिज नहीं कर सकता था। समिति के अध्यक्ष के नाते रिपोर्ट सरकार को सौंपना मेरी ड्यूटी थी, जो कि 2011 में मैंने किया।ऐसा लगता है कि हाल में सरकार ने समिति की कुछ सिफारिशें स्वीकार करते हुए उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया, जिन्होंने मंत्रिमंडल की सलाह पर चलते हुए वे सिफारिशें स्वीकार कर लीं। फिर सिफारिशें विधिवत केंद्र सरकार के मंत्रालयों को और राज्य सरकारों को भेज दी गर्इं। यह जोर देकर कहना जरूरी है कि वे केवल सिफारिशें हैं।

हिंदी और अंग्रेजी का सह-अस्तित्व

रिपोर्ट के प्रकाशन और सिफारिशों ने बर्र के छत्ते में हाथ डाला है। जो चिंता जताई जा रही है, हालांकि वह सही ठहराई जा सकती है, पर भयावह नतीजे होंगे ऐसा डर पालने की कोई जरूरत नहीं है। मैं ऐसा क्यों सोचता हूं आपको बताता हूं:  पहली बात यह, कि हिंदी और अंग्रेजी ने शांतिपूर्वक साथ-साथ रहना सीख लिया है! हिंदी को अपना स्थान मालूम है और अंग्रेजी को अपना, और कुछ स्थानों पर दोनों बातचीत की एक अनोखी और उभरती हुई भाषा में साझीदार हैं, जिसे हिंग्लिश नाम दिया गया है! शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सबसे ज्यादा वहां दिखता है जहां यह मायने रखता है, अर्थात सरकारी या आधिकारिक कामकाज को संपादित करने में: बातचीत हिंदी में, बहस हिंग्लिश में, मंत्री को रिपोर्ट या विवरण देना हो तो अंग्रेजी या हिंदी में, संसद में प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अंग्रेजी और हिंदी, विदेशी मेहमानों से बातचीत के लिए अंग्रेजी, और विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, रक्षा और विदेश मामलों के लिए अंग्रेजी। दूसरी बात यह, कि चाहे हिंदी हो या अंग्रेजी, वह जनता के बहुत बड़े हिस्से (नब्बे फीसद से ज्यादा) के लिए मायने नहीं रखती, जोसिर्फ एक भाषा यानी अपनी मातृभाषा के सहारे अपना गुजारा करती है। राज्य के और स्थानीय निकायों के कामकाज संबंधित राज्य की भाषा में होते हैं- तमिलनाडु में तमिल में, बंगाल में बांग्ला में, पंजाब में पंजाबी में, आदि। किसी वजह से दूसरे राज्य में जाकर बस जाने वाले लोग उस राज्य की भाषा, कम से कम कामचलाऊ दर्जे की तो सीख ही लेते हैं।

वैश्वीकरण और अंग्रेजी

तीसरी बात यह, कि वैश्वीकरण ने अंग्रेजी का स्थान पक्का कर दिया है। फ्रांसीसी, जापानी और चीनी लोग अपनी भाषा से बेइंतहा प्यार करते हैं, पर उन्होंने भी अंग्रेजी को स्वीकार कर लिया है, और वहां के युवा वर्ग में धड़ल्ले से अंग्रेजी बोलने वालों की तादाद निरंतर बढ़ रही है। बाहरी दुनिया के संपर्क में आने वाले अधिकतर भारतीय विदेश-यात्रा या आप्रवासन के लिए अमूमन अंग्रेजी-भाषी देशों का चुनाव करते हैं। वैश्वीकृत दुनिया में अंग्रेजी का इस्तेमाल बढ़ते ही जाना है। जब अभिभावकों ने इस हकीकत को पहचान लिया तो राज्यों को विवश होकर कक्षा एक से ही अंग्रेजी को एक विषय के तौर पर शामिल करना पड़ा। चौथी बात यह, कि अंग्रेजी की पहुंच हवा में, समुद्र में और अंतरिक्ष में भी है, भले जमीन पर कोई और भाषा बोली जा रही हो। इस तथ्य का प्रत्यक्ष अहसास मुझे लक्षद्वीप तक जाने वाले समुद्री जहाज एमवी लैगून के नियंत्रण कक्ष में हुआ। हम एअर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) या वीकल ट्रैकिंग सिस्टम या मिशन कंट्रोल सिस्टम बिना अंग्रेजी के नहीं चला सकते। निश्चय ही हिंदी या तेलुगू या असमिया में ‘पोर्ट’ और ‘स्टारबोर्ड’ के लिए शब्द होगा, मगर जहाज पर कौन उनका इस्तेमाल करता है!

पांचवीं बात यह, कि मीडिया के जबर्दस्त फैलाव और मीडिया तक पहुंच वाले मंचों की संख्या में विस्फोटक वृद्धि ने लोगों को विवश किया है कि वे कामकाजी तौर पर अंग्रेजी में साक्षर हों। सूचना पाने की आकांक्षा और तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत ने लोगों के लिए अंग्रेजी का व्यावहारिक ज्ञान हासिल करना जरूरी बना दिया है। संसदीय समिति की सिफारिशें मंत्रालयों और राज्यों को भेजने के बाद, सरकार कुछ सही कर सकती है तो यही कि वह कुछ न करे। स्वाभाविक क्रम में, भारत में ज्यादा से ज्यादा लोग द्विभाषी या त्रिभाषी, यहां तक कि बहुभाषी भी होंगे। (लक्षद्वीप की युवा पुलिस अधीक्षक को मैंने चार भाषाएं धाराप्रवाह बोलते सुना, हो सकता है वह और भी भाषाएं बोलती हों)। राज्य अपनी-अपनी भाषा की उन्नति के लिए काम करेंगे। अंग्रेजी भी फले-फूलेगी। हिंदी का इस्तेमाल स्वाभाविक गति से बढ़ेगा। कोई विवाद खड़ा करने की जरूरत नहीं है।

 

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First Published on April 30, 2017 3:54 am

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