May 27, 2017

ताज़ा खबर

 

दूसरी नजर: वे आशंकाएं-2

भारत एक रक्तरंजित क्षेत्र हो गया है, न केवल उग्रवादियों और माओवादियों के कारण, बल्कि पसंदगियों और नापसंदगियों की वजह से भी हत्या होती है ।

Author May 14, 2017 05:55 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हरेक की पसंद और नापसंद होती है, जो कि भोजन, पहनावे, किताबों, मित्रों, पड़ोसियों, राजनीति और व्यवहार में हर चीज से ताल्लुक रखती है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘एक व्यक्ति का भोजन दूसरे व्यक्ति के लिए जहर है।’ किसी की पसंद और नापसंद पर परिवार, संस्कृति और धर्म गहरा असर डालते हैं। कोई अपनी पसंद (‘शाकाहारी भोजन मजबूत शरीर के लिए पर्याप्त है’) के लिए या अपनी नापसंद (अंग्रेजी आधिकारिक कामों से हटा दी जानी चाहिए) के खिलाफ तर्क-वितर्क कर सकता है, पर किसी को भी किसी की जान लेने या उसे चोट पहुंचाने का अधिकार नहीं है।

हर जगह हिंसा
भारत एक रक्तरंजित क्षेत्र हो गया है, न केवल उग्रवादियों और माओवादियों के कारण, बल्कि पसंदगियों और नापसंदगियों की वजह से भी हत्या होती है और हत्या से कुछ कम हिंसा वाली घटनाएं भी। अखलाक नाम के एक गरीब किसान को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला, क्योंकि भीड़ का मानना था कि उसने अपने घर पर गोमांस (बीफ) रखा था। एक डेरी किसान और उसके बेटों ने दो गायें खरीदीं और गायों को लेकर अपने खेत पर जा रहे थे। उन्हें स्वयंभू गोरक्षकों के एक ग्रुप ने रोका, मारा-पीटा और पहलू खान की हत्या कर दी। दोनों मामलों में भीड़ या ग्रुप को यह गवारा नहीं था कि कोई बीफ खा सकता है।
हत्या से कम हिंसा वाली घटनाएं। एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के नेतृत्व में भीड़ ने कानून की अवहेलना की, ‘धार्मिक’ जुलूस निकाला, उत्पात मचाया, पुलिस अधीक्षक के घर पर तोड़-फोड़ की और उनकी पत्नी व मासूम बच्चों को आतंकित किया। इस मामले में, भीड़ और निर्वाचित जनप्रतिनिधि को यह तथ्य स्वीकार्य नहीं था कि दूसरा धार्मिक समूह लंबे समय से जुलूस निकालता रहा है।
फिर, तथाकथित नैतिकता थोपने की घटनाएं। रिक्शे पर सवार एक युवा युगल (अविवाहित) सिनेमा देखने जा रहा था। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया, उन्हें थाने ले आई, और अंत में कड़ी ‘चेतावनी’ देकर छोड़ दिया। ये पुलिसकर्मी एक ग्रुप से संबंधित थे जिसे सरकारी तौर पर ‘एंटी रोमियो दस्ता’ नाम दिया गया है और जिसे सड़कों या अन्य सार्वजनिक स्थलों पर युवा जोड़ों को रोकने का काम सौंपा गया है। कोच्ची और अन्य कई स्थानों पर यह काम गैर-पुलिस ग्रुपों ने भी किया। उत्तर प्रदेश में हिंदू युवा वाहिनी नामक संगठन ने नैतिक पाठ पढ़ाने का ठेका ले लिया है।

धर्मनिरपेक्षता किधर
सांप्रदायिक टकराव की घटनाएं हो रही हैं। जातिगत टकराव की भी। नेतागण बीच में कूद पड़ते हैं, ऐसी घटनाओं की निंदा करने तथा शांति कायम करने के लिए नहीं, बल्कि ऐसी वजहें ढूंढ़ निकालने के लिए ताकि इन घटनाओं का औचित्य ठहराया जा सके।भय का बोलबाला है। उपासना स्थल अपवित्र किए जा रहे हैं। धार्मिक अल्पसंख्यक खौफ में जी रहे हैं। दलित भी खौफजदा हैं। एक दलित अगर मरे हुए पशु का चमड़ा उतारता है तब तो वह लांछित रहता ही है, जब वह इससे इनकार करता है तब भी उसे कोसा जाता है। रोहित वेमुला ने लिखा था ‘मेरा जन्म मेरे साथ हुई सबसे बड़ी दुर्घटना है।’ लड़कियां उत्पीड़न के भय में जी रही हैं, कि अगर उन्हें लड़कों के साथ या जीन्स पहने या किसी बार में ड्रिंक लेते देख लिया गया तो क्या होगा! आदिवासी इस भय में जी रहे हैं कि वे अपनी जमीन और वनाधिकार से वंचित किए जा सकते हैं।

असहिष्णुता का उभार
असहमति के प्रति असहिष्णुता बढ़ रही है। सीताराम येचुरी नागपुर में अपना निर्धारित व्याख्यान नहीं दे सके। आइआइटी, दिल्ली में मेरे साथ रखी गई बातचीत एक दिन पहले रद््द कर दी गई। प्रिया पिल्लई को लंदन जाने के लिए विमान में सवार नहीं होने दिया गया, जहां उन्हें ब्रिटिश सांसदों के सामने मानवाधिकारों पर बोलना था। गैर-सरकारी संगठन कहीं ज्यादा मुखर न हो जाएं, इसलिए उन्हें जांच या विदेशी चंदा नियमन अधिनियम के तहत पंजीकरण रद््द कर दिए जाने या आय-कर अधिनियम का डर दिखाया जा रहा है।
विचारधारात्मक पृष्ठभूमि देख कर नियुक्तियां हो रही हैं। राज्यपाल के पदों पर संघ के स्वयंसेवक बिठा दिए गए। शैक्षिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं के मुखिया दक्षिणपंथी तथा अनुदारवादी बुद्धिजीवियों के एक छोटे-से समूह से चुने जा रहे हैं। हरियाणा में पाठ्यपुस्तकों की छानबीन एक ऐसी समिति ने की, जिसका मुखिया स्वयं अपने को हिंदुत्व का विचारक कहता था।
अपमानित करने की घटनाएं हो रही हैं। कुछ धर्मों और उनके अनुयायियों का मजाक उड़ाया जा रहा है। पैसा देकर सोशल मीडिया में ऐसे एजेंट तैयार किए गए हैं जो पत्रकारों तथा स्तंभकारों को ट्राल करते हैं। उनके पास प्रतिवाद में कोई तर्क नहीं होता, उन्हें बस भद््दी से भद््दी भाषा में गालियां देने आता है।यह भय भी व्याप्त है कि सब पर नजर रखी जा रही है। राज्य-व्यवस्था के ऐसे व्यवहार का जॉर्ज आरवेल ने बड़ी बारीकी से चित्रण किया है। ‘आधार’ को स्वैच्छिक से अनिवार्य बना दिया गया। इसकी परिकल्पना प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण वाली योजनाओं में सहायक के तौर पर की गई थी, पर अब आधार को यात्रा करने या संपत्ति खरीदने या कर भुगतान करने जैसे कानूनी अधिकारों के अमल में पूर्व-शर्त बना दिया गया है। ढेर सारी एजेंसियों के जरिए नागरिकों के बारे में जानकारियां इकट्ठा की गई हैं, इस तरह के आंकड़ों की सुरक्षा या निजता के तथ्यों की सुरक्षा की बाबत कोई कानून बनाए बगैर। जबकि ऐसे आंकड़ों का लीक होना सामान्य घटना होती जा रही है। सरकार ने बड़ी बेहयाई से सुप्रीम कोर्ट को बताया कि किसी का भी अपने शरीर पर निर्बाध अधिकार नहीं है!
धार्मिक असहिष्णुता के 198 देशों के सूचकांक में भारत को नीचे से चौथे स्थान पर जगह मिली है। प्रेस की आजादी के 180 देशों के वैश्विक सूचकांक में भारत 131वें स्थान से नीचे खिसक कर 140वें स्थान पर आ गया।

यह मूर्खतापूर्ण होगा कि ऊपर बताई गई बुराइयों के लिए सारा दोष हम केवल राजग सरकार पर मढ़ दें, जिसने मई 2014 में सत्ता संभाली। ये बुराइयां असल में पहले भी मौजूद थीं। एक श्रेणीबद्ध समाज अपने आप में वर्चस्ववादी तथा असहिष्णु होता है। जो फर्क आया है वह यह कि पहले जब ये बुराइयां प्रकट होती थीं तो ऊंचे पदों पर बैठे लोग उनकी निंदा करते थे और राष्ट्र का सिर शर्म से झुक जाता था; अब निंदा के बयान नहीं आते और कोई शरमिंदा नहीं होता।धर्मनिरपेक्षता को कोसा जा रहा है। उदारवाद (लिबरलिज्म) का विरोध किया जा रहा है। असहमति को देशद्रोह ठहराया जा रहा है। सरकार से सवाल पूछना (या सेना प्रमुख से या आरबीआइ गवर्नर से) राष्ट्र-द्रोह है। सबका साथ सबका विकास का रास्ता निरंकुशता, एकरूपता और शासकों का हुकुम बजाने का रास्ता हो गया है।
पहले की आशंकाएं गहरा रही हैं, नई आशंकाएं उभर रही हैं।

 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने योगी सरकार से कहा- "आप लोगों को मांसाहार से नहीं रोक सकते, बूचड़खानों के लिए नए लाइसेंस बनाएं, पुराने रिन्यू करें"

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on May 14, 2017 5:54 am

  1. No Comments.

सबरंग