December 04, 2016

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दूसरी नज़र: नोटों का विमुद्रीकरण या नगदी का?

मैं नोटों की अदलाबदली के विषय पर लौटने को विवश हूं, क्योंकि लोगों की मुश्किलें और तकलीफें जारी हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मैं नोटों की अदलाबदली के विषय पर लौटने को विवश हूं, क्योंकि लोगों की मुश्किलें और तकलीफें जारी हैं। अब यह साफ हो चुका है कि पांच सौ और हजार के नोटों के विमुद्रीकरण का फैसला सुचिंतित नहीं था, तैयारी एकदम लचर थी और अमल भयावह। अटकलों के बीच यह भी सुनने में आ रहा है कि प्रधानमंत्री के अलावा सिर्फ चार अधिकारी इस निर्णय में शामिल थे, और मुख्य आर्थिक सलाहकार उन चार में नहीं थे!
भयावह नतीजे

अव्यवस्था पर नजर डालें:

1. चलन में रही करीब छियासी फीसद मुद्रा को एक झटके में अवैध घोषित कर दिया गया। इससे करोड़ों लोग बिना पैसे के हो गए। दूध या दवाई खरीदने के लिए, अनाज या सब्जी खरीदने के लिए, आॅटो या टैक्सी करने के लिए लोगों के पास पैसे नहीं थे। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो दिन भर भूखे रहे, क्योंकि कोई ढाबा पांच सौ का नोट नहीं ले रहा था।
2. देश में बैंकों की कुल 1 लाख 34 हजार शाखाएं हैं। इनमें 2 लाख 15 हजार एटीएम को जोड़ लें, जिनमें से चालीस फीसद काम नहीं कर रहे थे। मान लें कि औसतन पांच सौ लोगों को बैंक शाखा या एटीएम के बाहर कतार में खड़ा होना पड़ा, तो इसका मतलब है कि रोजाना 11 करोड़ लोग नोट बदलने के लिए घंटों कतार में खड़े रहे। उनमें से अधिकतर कामकाजी लोग थे। इससे उत्पादन और उत्पादकता पर पड़े असर का अंदाजा लगाएं।
3. न जाने किन वजहों से कोआॅपरेटिव बैंकों को नोट बदलने की इजाजत नहीं दी गई। करोड़ों किसान न तो जमा कर सकते थे न निकासी, और बुआई के सीजन में उनके पास बीज या खाद खरीदने या मजदूर लगाने के लिए पैसा नहीं था।
4. थोक बाजार बंद हो गए। साप्ताहिक हाट थम गए। खुदरा दुकानों की बिक्री में त्रासद गिरावट दर्ज की गई।
5. तिरुप्पुर, सूरत, इचलकरंजी जैसे औद्योगिक केंद्रों में काम एकदम ठप पड़ गया, क्योंकि न तो मजदूरों को देने के लिए पैसा था न माल ढुलाई जैसी सेवाएं मुहैया कराने वालों को।
6. सभी रोजगारशुदा लोगों में से करीब तैंतीस फीसद लोग ठेके पर काम करने वाले मजदूर हैं (अनुमान है कि पंद्रह करोड़)। अचानक उन्होंने पाया कि वे बेरोजगार हो गए हैं, क्योंकि जिन्होंने उन्हें काम पर रखा था उनके पास मजदूरी का भुगतान करने को पैसे नहीं थे।
7. कीमत लेकर, विमुद्रीकृत नोटों की अदलाबदली कराने वाले दलाल निकल आए। जिनके पास नियमित काम नहीं होता, ऐसे पुरुषों और महिलाओं को कुछ पैसे देकर नोट बदलवाने के लिए लाइन में लगाया गया। थोड़े-से पैसों की खातिर ईमानदार लोग बेईमान बन गए या बना दिए गए। इसकी काट सरकार ने यह निकाली कि उंगली पर अमिट स्याही का निशान लगा दिया जाए। साथ में वोटिंग मशीन भी रखी जा सकती थी और हरेक बैंक शाखा या एटीएम को पोलिंग बूथ में बदला जा सकता था!

अनजान शेखियां
मुश्किलें और तकलीफें अभी बनी रहेंगी, इसलिए कि पुरानों नोटों की जगह लेने वाले 2200 करोड़ नए नोट छापने में महीनों लगेंगे। फिर बैंककर्मियों की तादाद की भी एक सीमा है और अभी सारे एटीएम को नए नोटों के अनुरूप बनाया जाना है।
क्या विमुद्रीकरण से रिश्वतखोरी समाप्त हो जाएगी? बेशक, नहीं। घूस लेने वाले नए नोटों में घूस लेंगे। रिश्वतखोरी की पहली घटना गुजरात से दर्ज हुई है, जहां कांडला पोर्ट ट्रस्ट के दो अफसर दो हजार के एक सौ चौबीस नोट लेते पकड़े गए!
क्या जाली मुद्रा रुकेगी? बेशक, नहीं। अगर एक आदमी नई सुरक्षात्मक खूबियों के साथ नए नोट छाप सकता है, तो दूसरा आदमी इन खूबियों की नकल करने की तरकीब निकाल सकता है। दुनिया में जाली मुद्रा की सबसे ज्यादा शिकायत अमेरिकी डॉलर को लेकर है। जाली मुद्रा से निपटने का एक तरीका यह है कि हम समय-समय पर, पुरानी सिरीज के नोटों को चरणबद्ध तरीके से हटाएं तथा नई सिरीज के नोट जारी करें, और एक कदम जमीन पर रखने के बाद दूसरा कदम आगे बढ़ाएं। पिछली बार हमने इसे जनवरी 2014 में किया था।
क्या इससे काला धन पैदा होना बंद हो जाएगा? बेशक नहीं। अर्थव्यवस्था के ऐसे क्षेत्र, जहां बेहिसाबी धन का लेन-देन आम है (थोक व्यापार, निर्माण उद्योग, सराफा, उच्च शिक्षा, चुनावी चंदा आदि), बेहिसाबी धन की ‘मांग’ बनी रहेगी, और इसलिए, बेहिसाबी धन की ‘आपूर्ति’ के तरीके निकाल लिये जाएंगे।
कोई भी प्रमुख अर्थव्यवस्था काले धन या समानांतर अर्थव्यवस्था की बीमारी से बची नहीं है। विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक, समानांतर या ‘छाया अर्थव्यवस्था’ अमेरिका में जीडीपी का 8.6 फीसद है (या लगभग 1600 अरब डॉलर); चीन में 12.7 फीसद (लगभग 1400 अरब डॉलर); और जापान में 11 फीसद (लगभग 480 अरब डॉलर)। अनुमान है कि भारत की छाया अर्थव्यवस्था 500 अरब डॉलर की है (2250 अरब डॉलर के इसके जीडीपी का 22.2 फीसद)। यह विशाल है, पर अपूर्व नहीं, और यह अच्छी खबर है कि इसका आकार सिकुड़ रहा है। ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका में छाया अर्थव्यवस्थाएं इससे बड़ी हैं; इजराइल और बेल्जियम तुलना करने योग्य हैं।

 

नगदी का विमुद्रीकरण
लगता है कि प्रधानमंत्री नगदी-रहित अर्थव्यवस्था के विचार पर लट््टू हैं और उन्होंने तय किया कि नगदी के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जाए। उनके समर्थकों ने इसे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कहा, इस पर सोचने की तनिक जहमत नहीं उठाई कि भारत में लोगों का अधिकांश लेन-देन नगदी में होता है और वह वैध है- और कई वजहों से यह लंबे समय तक नगदी में ही रहेगा। यहां एक महत्त्वपूर्ण आंकड़ा पेश करना चाहूंगा: 133 करोड़ लोगों के लिए खुदरा बिक्री की केवल 14 लाख 60 हजार ऐसी दुकानें (प्वाइंट्स आॅफ सेल) हैं जहां कंप्यूटरीकृत लेन-देन होता है। नगदी से डिजिटल की तरफ एक लंबा रास्ता करना पड़ेगा।
उड़ी के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का मकसद घुसपैठ का खात्मा करना था, पर हकीकत यह है कि घुसपैठ में तीन गुना की भारी बढ़ोतरी हुई है (जैसा कि सरकार ने खुद स्वीकार किया है)। करेंसी नोटों पर हुई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का नतीजा करोड़ों लोगों के लिए आर्थिक विपत्ति तथा अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों का काम ठप पड़ जाने के रूप में आया है। यह सोचते हुए मुझे डर लगता है कि अगला ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ क्या होगा और उसके किस तरह के भयानक नतीजे आएंगे।

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First Published on November 20, 2016 3:18 am

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