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चर्चाः भाषा संरक्षण और लिपि

हालांकि भाषाई संकट-ग्रस्तता एक वैश्विक समस्या है, लेकिन भारत इससे सबसे अधिक शिकार देशों में शामिल है।
Author September 17, 2017 01:39 am

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

हिंदी दिवस एक रस्मी कवायद बन कर रह गया है। मगर इस बहाने हिंदी में कामकाज को प्रोत्साहन और इसके प्रचार-प्रसार के उपायों पर चर्चा हो जाती है। संसदीय समिति सरकारी कार्यालयों में हिंदी में हो रहे कामकाज की समीक्षा करती रहती है। यह भी कहा जाता है कि हिंदी का दुनिया भर में प्रसार हो रहा है, खासकर फिल्मों के माध्यम से इसकी पहुंच अहिंदीभाषी क्षेत्रों में भी बन पा रही है। हिंदी प्रकाशन का कारोबार फैल रहा है। मगर इसके बरक्स हिंदी माध्यम से पढ़ाई-लिखाई करने वाले बच्चों को रोजगार के कितने अवसर उपलब्ध हो पा रहे हैं, इसकी समीक्षा नहीं होती। हिंदी की बोलियों और अन्य भाषाओं में मौजूद ध्वनियों को देवनागरी लिपि में समेटने की क्षमता विकसित करने पर काम नहीं हो पा रहा है। ऐसा क्यों है, इस बार की चर्चा इसी पर।   – संपादक

हालांकि भाषाई संकट-ग्रस्तता एक वैश्विक समस्या है, लेकिन भारत इससे सबसे अधिक शिकार देशों में शामिल है। वृहत्तर भूगोल, विषम आर्थिक परिस्थितियां, दुर्गम यातायात के साधन और सूचना-क्रांति की अंग्रेजी केंद्रीयता ने देश की भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रवाह को बनाए रखने को अधिक चुनौतीपूर्ण बनाया है। इस क्रम में अनेक स्थानीय भाषाओं की किसी अपनी लिपि का न होना भी भाषाई-संरक्षण के प्रयासों में एक अवरोध है। देश की हजारों भाषाओं के लिए उपलब्ध लिपियों की बहुलता भी व्यावहारिक धरातल पर एक अवरोध के रूप में ही सामने आ रही है।

हालांकि भाषाई मानवाधिकार के लिए आदर्श स्थिति यही है कि हर भाषा की एक बहुस्वीकृत लिपि हो, जो उस भाषा की सभी ध्वनियों को अभिव्यक्त कर सकने में समर्थ हो और उसी के अनुरूप उसमें लेखन और अद्यतन टंकण की सुविधा उपलब्ध हो। लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं पा रहा है। आज कुछ ऐसी भाषाएं हैं, जिनकी लिपि के विकास के लिए लोग व्यक्तिगत स्तर पर प्रयत्नशील हैं, लेकिन ऐसे छिटपुट प्रयास समुद्र पर बन रहे किसी पुल में ‘गिलहरी के प्रयास’ जैसे ही हैं और जाहिर है वर्तमान समय को न तो किसी गिलहरी की चिंता है और न ही उसके प्रयास को स्वीकार करने की संवेदना। बल्कि आज के पुल निर्माण के साधनों में कितनी गिलहरियां दब-कुचल जाती हैं, उनकी कोई गणना भी नहीं होती है। जिस तेजी से भाषाई परिवेश बदल रहे हैं और एक व्यापक समाज की स्थानीय भाषाओं के प्रति उदासीनता बढ़ रही है, उसमें भाषा-संरक्षण के ठोस उपायों के बारे में सोचने की आवश्यकता है।

आम जन में यह भ्रम भी समानांतर काम करता है कि भाषा और लिपि का अन्योन्याश्रित संबंध है, जबकि आधुनिक भाषाविज्ञान के आरंभिक विद्वान ब्लूमफील्ड ने स्पष्ट कर दिया था कि ‘लेखन भाषा नहीं होती, बल्कि ये माध्यम किसी भाषा को सुरक्षित रखने के दर्शनीय चिह्न मात्र होते हैं।’ तात्पर्य यह कि भाषा अलग और लिपि अलग होती है। लिपि की आवश्यकता किसी भाषा को लिखने के क्रम में पड़ती है। आज की अनेक लोकप्रिय भाषाएं जैसे अंग्रेजी और हिंदी उधार की लिपियों के साथ ही खड़ी हैं। इसी क्रम में मैथिली और भोजपुरी जैसी भाषाएं क्रमश: तिरहुत और कैथी लिपियां छोड़ कर देवनागरी के साथ खड़ी हैं और आज इनके संवर्धन के तर्कों में लिपि शामिल नहीं है। गौरतलब है कि भाषा को अपने समाज का प्रतिनिधि होना चाहिए और लिपि को अपने भाषा की।
यह भी सही है कि किसी भाषा की पूरी ध्वनि-व्यवस्था संबंधित वर्णमाला तक सीमित नहीं होती, बल्कि भाषाएं उस लिपि और लेखन-व्यवस्था में स्वयं को समायोजित भी करती हैं। अंग्रेजी का उदाहरण हम सबके सामने है, जिसमें कुल बयालीस ध्वनियों को रोमन के छब्बीस वर्णों के माध्यम से ही अभिव्यक्त किया जाता है। रोटी, कपड़ा और मकान की तरह भाषा भी मनुष्य की आवश्यकता है। पर अंतर यह है कि भाषा के लिए रोज उपक्रम नहीं करना पड़ता, एक बार सीख लेने पर शब्दावली जोड़-जोड़ कर हम अपने बढ़ते जीवन-चक्र में भाषा को साधते रहते हैं। इस मायने में वे लोग सौभाग्यशाली हैं, जिनको परंपरा से एक भाषा और लिपि मिली हुई है, लेकिन यहां चिंता उनकी है, जिन भाषाओं की कोई लिपि नहीं है।

पूर्वोत्तर भारत की असंख्य भाषाओं की आज तक कोई अपनी लिपि विकसित नहीं हो पाई है। कुछ जागरूक लोगों ने भाषाई और जातीय अस्मिता के संरक्षण के नाम पर लिपि का विकास तो किया है, लेकिन उसे उस समाज से सर्वस्वीकार्यता नहीं मिली है। मिशनरियों के प्रभाव से इन भाषाओं पर रोमन का भी प्रभाव रहा है। इसमें असंतोष यह होता है कि यहां बहुसंख्य तानी भाषाएं हैं, जिनमें एक ही लिखित शब्द के उच्चारण के आरोह-अवरोह के भेद से तीन या इससे भी अधिक अर्थ संप्रेषित होते हैं। ऐसे में रोमन लिपि इन भाषाओं को संपूर्णता नहीं दे पा रही है। प्रसिद्ध भाषाविद प्रो. वृषभ प्रसाद जैन कहते हैं कि ‘इन भाषाओं में ‘ङ’ ध्वनि की बहुलता है और इन्हें सहज ढंग से रोमन में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।’

इसके साथ देश की कोंकणी, कश्मीरी, संथाली जैसी भाषाएं भी हैं, जो एकाधिक लिपियों में लिखी जाती हैं। ये ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वालों की आबादी कम और विभिन्न क्षेत्रों में बिखरी हुई है। ऐसे में इन पर विलुप्ति के खतरे का एक कारण इनका भौगोलिक और लिपिगत स्तर पर एकत्र न होना भी है। इन समाजों के लोग खुद भी संवाद के स्तर पर मुख्य धारा के समाजों से कटे हुए महसूस करते हैं। ऐसे में वे भाषाएं जिनकी अभी तक कोई लिपि न विकसित हो पाई हो, उनके लिए उनकी भाषाई और जातीय पहचान की समग्रता के साथ देवनागरी को अपनाया जाना एक व्यावहारिक समाधान की तरह है, जिससे न सिर्फ ऐसी भाषाओं को एक स्थायी और लोकप्रिय लिपि मिलेगी, बल्कि उनको इसी बहाने वृहत्तर भाषी समाजों से जुड़ने का आधार मिलेगा।
देवनागरी पहले से अवधी, कश्मीरी, कोंकणी, छत्तीसगढ़ी, डोगरी, नेपाली, पालि, प्राकृत, बोडो, भीली, भोजपुरी, मराठी, मागधी, मुंडारी, मैथिली, राजस्थानी, संथाली, संस्कृत, सिंधी, हरियाणवी और हिंदी आदि अनेक भाषाओं के लेखन की लिपि है। इसमें यूनीकोड के मापांकन तक की प्रक्रिया हो चुकी है और भाषाई विशिष्टता की मांग के अनुसार अतिरिक्त ध्वनि-प्रतीकों के लेखन की व्यवस्था भी उपलब्ध है, जैसे- भोजपुरी की ध्वनि ‘ऽ’ और मराठी की ध्वनि ‘ळ’ आदि। इसके वैज्ञानिक और लचीले स्वभाव के भरोसे इस बात की पूरी संभावना है कि तानी भाषाओं के लिए भी आवश्यक कुछ वर्ण अलग से विकसित किए जा सकते हैं और यह तुलनात्मक रूप से रोमन से बेहतर सिद्ध होंगे। हालांकि इस क्रम में कुछ असुविधा होगी, लेकिन यह भाषाओं के प्रति आसन्न खतरों से होने वाली असुविधाओं से कम ही होगी।

यह भी समझने की आवश्यकता है कि महज किसी भाषा में उसकी सर्वस्वीकार्य लिपि के होने से उस भाषा का भविष्य नहीं सुनिश्चित किया जा सकता। लेकिन यह प्रक्रिया भाषाई-संरक्षण में एक प्रभावी कारण हो सकती है। देवनागरी के होने से अन्य लाभ यह भी है कि इसमें अनेक सूचना-प्रौद्योगिकीय सुविधाएं जैसे- फांट, की-बोर्ड, टंकण-टूल, फांट-परिवर्तक, ओसीआर आदि उपलब्ध हैं, जिसका लाभ इन छोटी-छोटी भाषाओं को आरंभ से ही मिलने लगेगा।
ऐसे में जब भूमंडलीकरण का अघोषित संरक्षक अमेरिका नई राष्ट्रवादी चेतना के साथ अपनी नीतियां निर्धारित करने में व्यस्त हो, तो एक सवाल बनता है कि क्या उसके उदारीकरण की पहल महज शेष दुनिया के देशों पर अपनी भाषा, संस्कृति और सभ्यताई प्रतीकों को थोपने पर केंद्रित था? दुनिया जिस तेजी से सपाट हो रही है, उसमें सबसे अधिक लाभ किसका हुआ है?

भाषाई संकट-ग्रस्तता और इनके संरक्षण के क्रम में अंग्रेजी और रोमन स्थायी मुद्दे हैं, जो सभी भारतीय भाषाओं और उनकी लिपियों को प्रतिस्थापित करने पर उतारू हैं, इस क्रम में अंतत: ये वैश्विक बाजार के प्रतिनिधि के रूप में खड़े दिखते हैं। आज अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन यह देश की स्थानीय भाषाओं को समाप्त करके नहीं होना चाहिए, बल्कि इनमें स्थानीय परिवेश के अनुरूप वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ियों को इन भाषाओं से जोड़े रखा जा सके।

भाषाएं किसी देश या समाज की अस्मिता की पहचान के साथ उसकी धरोहर भी होती हैं। हर व्यक्ति के लिए भाषा उसकी नित्य की आवश्यकता है, लेकिन हम इनके प्रति लगातार उदासीन होते जा रहे हैं। गौरतलब है कि किसी भाषा की सुरक्षा उसको संग्रहालय में रखने से नहीं, बल्कि समाज के विविध संदर्भों में बने रहने से है। ऐसे में देवनागरी को अपनाया जाना भी कोई स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि संरक्षण और संवर्धन के प्रति मौजूदा विकल्पहीन धरातल के पर एक ठोस पहल जरूर है।

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