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भाषाई भेदभाव की शिक्षा

भारत का एक बड़ा वर्ग भेदभाव का शिकार है। सरकारी नीतियों और प्रावधानों के कारण बड़ी आबादी शिक्षा, रोजगार और न्याय के क्षेत्र में घोर उत्पीड़न की शिकार है।
Author September 17, 2017 01:40 am
शिक्षा में हिंदी और अंग्रेजी समेत अनेक भाषाई माध्यमों और बोर्डों की वजह से एक बहुत बड़ी खाई बन गई है और माध्यम को ही कौशल का आधार मान लिया गया है। यही वजह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी माध्यम और भारतीय भाषा के माध्यम से प्रतियोगियों की सफलता का प्रतिशत बहुत कम है।

विजय जायसवाल

भारत का एक बड़ा वर्ग भेदभाव का शिकार है। सरकारी नीतियों और प्रावधानों के कारण बड़ी आबादी शिक्षा, रोजगार और न्याय के क्षेत्र में घोर उत्पीड़न की शिकार है। जिस तरह की शिक्षा नीति और प्रतियोगी परीक्षाओं का जैसा ढांचा बना दिया गया है, वह पूरी तरह ग्रामीण और गरीब आबादी के लिए भाषा-विरोधी है। शिक्षा और रोजगार समेत न्याय प्रणाली को भारत के उच्च वर्ग के अनुरूप बना दिया गया है, जिसका प्रतिनिधित्व देश के प्रभुत्व संपन्न लोग करते हैं, जो अधिकतर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा हासिल करते हैं। आजादी के बाद से ही शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और न्याय में हिंदी और भारतीय भाषाओं की उपेक्षा की गई है। जो थोड़ी-बहुत सहूलियत मिली है, उसे उपेक्षित और संकीर्ण नजर से देखा जाता है। हिंदी या भारतीय भाषाओं के माध्यम से सफलता हासिल कर लेने के बाद भी ऐसे लोगों को अनेक तरह से हतोत्साहित किया जाता है। जबकि देश में अंग्रेजी माध्यम का प्रतिनिधित्व करने वाले या अंग्रेजीभाषी तीन प्रतिशत से अधिक नहीं हैं। यही कारण है कि देश की बड़ी आबादी, इन चंद प्रभु वर्ग के बच्चों का मुकाबला करने से पहले ही पराजित हो जाती है। या कहें कि भाषाई भेदभाव नीति के चलते उन्हें पराजित कर दिया जा रहा है।

हिंदी माध्यम से विज्ञान, समाज विज्ञान, चिकित्सा, अभियांत्रिकी और प्रबंधन में शिक्षा हासिल करने, कौशल तथा प्रतिभा होने के बावजूद भारतीय युवाओं को अंग्रेजी में अलग से दक्षता साबित करनी पड़ती है, जिसकी वजह से उन्हें पूरी साजिश के तहत अच्छे अवसरों से हाथ धोना पड़ता है। इस देश में इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि राजभाषा अधिकारी बनने के लिए भी अंग्रेजी में स्नातक या परास्नातक डिग्री अनिवार्य बना दी गई है। राजभाषा विभाग, हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने वाले विभाग से ज्यादा अनुवाद विभाग बन कर रह गए हैं। यही नहीं, हिंदी पत्रकारिता भी अनुवाद पत्रकारिता के रूप में ही विकसित होती जा रही है। इसका सीधा असर स्वतंत्र पेशों पर पड़ रहा है। आज देश में मौलिक शोधों का अभाव इसलिए भी है कि प्रोफेसर अंग्रेजी माध्यम पर जोर देते हैं, जबकि विद्यार्थी उसका अभ्यस्त नहीं होता। इस तरह वह अपनी पूरी प्रतिभा अंग्रेजी मापदंडों और प्रविधियों को सीखने में लगा देता है। फिर उसका मौलिक विचार और मौलिक खोज पनपने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। ऐसे शोध केवल अंग्रेजी में उपलब्ध होने के कारण शोध, शैक्षिक संस्थानों, पुस्तकालयों, सेमिनारों और बहुत हुआ तो पाठ्यक्रमों का हिस्सा बन कर रह जाते हैं। ये शोध हिंदी या भारतीय भाषा में न होने के कारण जनता से जुड़ नहीं पाते हैं, जिससे अकादमियों के बाहर की प्रतिभाएं न तो इन्हें परख पाती हैं और न ही दैनिक जीवन में उनका कोई उपयोग समझ पाती हैं। वैसे भी हमारे यहां के शोध लकीर के फकीर की तरह किया जाता है, जिसमें पश्चिम में विकसित अवधारणाओं का भारतीय परिप्रेक्ष्य में रूपांतरण भर किया जाता है।

शिक्षा में हिंदी और अंग्रेजी समेत अनेक भाषाई माध्यमों और बोर्डों की वजह से एक बहुत बड़ी खाई बन गई है और माध्यम को ही कौशल का आधार मान लिया गया है। यही वजह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी माध्यम और भारतीय भाषा के माध्यम से प्रतियोगियों की सफलता का प्रतिशत बहुत कम है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी और प्रबंधन में हिंदी और भारतीय भाषाओं की अनदेखी जगजाहिर है। ऐसा अहसास कराया जाता है कि हिंदी में इन विषयों को पढ़ा ही नहीं जा सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश और दूसरे बोर्डों में लाखों बच्चे हिंदी माध्यम से विज्ञान पढ़ते हैं, लेकिन डिग्री कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्तर पर उन पर अंग्रेजी थोप दी जाती है।

हाल के वर्षों में सरकार ने अभियांत्रिकी और चिकित्सा की प्रवेश परीक्षा के लिए अवसरों को विभिन्न तरीके से सीमित करते हुए, उन्हें प्रतिशत के आधार पर तय कर दिया है, जिससे ग्रामीण, गरीब और भारतीय भाषा में पढ़े बच्चों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है, क्योंकि वे सीमित अवसरों के कारण आधुनिक सुविधाओं में पढ़े बच्चों का मुकाबला करने में पिछड़ रहे हैं, इससे उनमें निराशा और कुंठा पनप रही है। इससे भी बुरा हाल है भारतीय प्रशासनिक सेवा की चयन प्रतियोगिता का। इसमें पहले से ही मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी की कौशल जांच परीक्षा, हजारों हिंदी और भारतीय भाषा प्रतियोगियों की सफलता की राह का रोड़ा बन जाती है। ज्ञान और कौशल होने के बावजूद वे अपने माध्यम के कारण देश के योग्य पदों पर पहुंचने से रह जाते हैं। अंग्रेजी माध्यम के प्रतियोगी को महज अंग्रेजी के कारण अतिरिक्त लाभ मिलता है। इसी तरह सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और बहुत-सी सीधी भर्तियों में अंग्रेजी ज्ञान के अभाव में हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चों को परीक्षा तक से वंचित कर दिया जाता है। कई बार तो न्यूनतम प्राप्तांक का आधार इतना अधिक कर दिया जाता है कि बहुत से मेधावी विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षा से ही बाहर हो जाते हैं, जबकि अंग्रेजी और हिंदी माध्यम, विभिन्न विश्वविद्यालयों और विभिन्न राज्यों के शिक्षा बोर्डों और केंद्रीय शिक्षा बोर्डों में शिक्षा और अंक प्रदान करने के मानक काफी असमान हैं। इससे भी गांव से आने वाली और गरीब प्रतिभाएं हतोत्साहित हो रही हैं।

इसी तरह न्यायप्रणाली में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में न तो याचिका दाखिल की जा सकती है और न ही वकालत की जा सकती है। भारतीय भाषाओं में फैसले की प्रति भी नहीं मिलती। संविधान के अनुच्छेद 348 के अनुसार देश के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों का काम अंग्रेजी में किए जाने का प्रावधान है। यह अनुच्छेद देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ घोर अन्याय है।

आज जरूरत इस बात की है कि देश में प्राथमिक से लेकर हाईस्कूल और इंटरमीडिएट तक समान शिक्षा-व्यवस्था लागू करने पर विचार हो। सरकारी और निजी विद्यालयों-महाविद्यालयों के बीच आर्थिक असमानता खत्म करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए। भाषा की विभेदकारी व्यवस्था को समाप्त करने पर विचार होना चाहिए। देश में विश्वविद्यालयी शिक्षा में एकरूपता लाई जानी चाहिए। परीक्षा के लिए देशव्यापी विश्वविद्यालयी परीक्षा बोर्ड बनाने पर विचार किया जाए। इससे परीक्षा, अंक/ ग्रेड में एकरूपता आएगी। इससे इंटरमीडिएट के बाद स्नातक में और स्नातक के बाद परास्नातक में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी, देश का संसाधन बचेगा, विद्यार्थियों को भाग-दौड़ और तनाव से राहत मिलेगी। ध्यान रखा जाए कि भाषा के आधार पर किसी भी तरह का विभेद न हो। संघ लोक सेवा आयोग, राज्य लोक सेवा आयोगों, केंद्रीय भर्तियों, राज्य भर्तियों, सेना, न्यायालय, सार्वजनिक उपक्रमों, वैज्ञानिक, शोध, प्रबंध और व्यावसायिक संस्थानों में होने वाली नियुक्तियों में, जहां कहीं भी अंग्रेजी ज्ञान की अनिवार्यता थोपी गई है, उसे खत्म किया जाना चाहिए। किसी भी तरह की नियुक्ति में केवल क्षेत्रगत, विषयगत और आवश्यक ज्ञान को परखा जाए, चाहे वह ज्ञान उसे किसी भी भाषा में क्यों न प्राप्त हो।

देश के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में कामकाज की भाषा को हिंदी और क्षेत्रीय भाषा में लागू करने के लिए अनुच्छेद 348 में संशोधन प्रस्तावित किया जाए, ताकि इस देश का आम आदमी अपनी भाषा में न्याय का अधिकार पा सके। हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में कानून की पढ़ाई करने वाला भी देश के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में वकालत करके बराबरी का हक पा सके।

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