January 17, 2017

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पुस्तकायनः कविता का नया मुहावरा

सदानंद शाही की छोटी-बड़ी अड़सठ कविताओं का संकलन सुख एक बासी चीज है अपने समय के सच को जितनी तीक्ष्णता से अनुभूत करने की गवाही देता है उतने ही तीखे स्वर में उसे शब्दों में बयान करने की कवि-सामर्थ्य का भी अहसास करा देता है।

Author October 16, 2016 01:21 am
सुख।

सदानंद शाही की छोटी-बड़ी अड़सठ कविताओं का संकलन सुख एक बासी चीज है अपने समय के सच को जितनी तीक्ष्णता से अनुभूत करने की गवाही देता है उतने ही तीखे स्वर में उसे शब्दों में बयान करने की कवि-सामर्थ्य का भी अहसास करा देता है। कुछ कविताएं बहुत छोटी हैं, केवल तीन-चार पंक्तियों की, लेकिन ये कविताएं सिर्फ कुछ शब्द या पंक्तियां भर नहीं हैं, एक मुकम्मल विचार की वाहक हैं। शाहीजी की कविताओं का फलक बहुत व्यापक है। अगर इन कविताओं में कालाहांडी की भूख है, चालीस बरस की कुंवारियों की चिंता है, बदलते ही नहीं, पूरे बदल चुके मानवीय मूल्य हैं, तो निरी प्रेम कविताएं भी हैं। खास बात यह है कि कवि की यह विषय-विविधता उसे एक ऐसे सजग सहृदय संवेदनशील रचनाकार के रूप में पाठकों के समक्ष लाती हैं, जो कविता के लिए किसी परहेज में विश्वास नहीं करता- यहां तक कि वह काले कौवे में भी उस सौंदर्य को पहचान लेता है, जिससे कविता जन्मती है।

‘शेष मिलने पर’ कविता शाही के कवि-व्यक्तित्व की ऐसी कविता है, जो छोटी से छोटी चीजों के प्रति उनकी अत्यधिक सूक्ष्म दृष्टि का बेहतरीन खुलासा करती है। लंबे-लंबे पत्रों में सब कुछ लिख देने पर आदतन ‘शेष मिलने पर’ लिख ही दिया जाता है, जिस पर शायद ही किसी का खयाल जाता है, लेकिन यही तीन शब्द शाहीजी को पूरी कविता रच देने के लिए विवश कर देते हैं: ‘ऐसा क्या कुछ बच जाता है जिसके लिए लिखना पड़ता है शेष मिलने पर/ ऐसा क्या कुछ उमड़ता-घुमड़ता है कि हम/ लिख ही डालते हैं/ तीन शब्दों का यह महावाक्य या फिर यह भी संभव है/ कि मिलने पर न कुछ बोलें न कुछ कहें/ बैठ कर पीते रहें चाय/ और उठ कर चल दें चुपचाप/ यह सोचते हुए/ कि कह लेंगे/ शेष मिलने पर।’

ऐसा लगता है कि कविता कह रही हो कि जैसे ‘कभी भी खत्म नहीं होती कविता’ वैसे ही बातें भी कभी खत्म नहीं होंती, चिट्ठियों में ही नहीं, मिल कर भी, बार-बार मिल कर भी- बहुत कुछ रह जाता है अनकहा, अनबोला। बड़ी-बड़ी बातों, तात्कालिक घटनाओं पर कवि-हृदय का कविता में उतर पड़ना स्वाभाविक है, अनदेखी चीजें-प्रसंग भी कवि के लिए आकर्षण का विषय होते हैं, पर परिचित और रोजमर्रा के विषयों पर रचना कवि की गहन-दृष्टि का ही परिणाम हो सकती है। ‘हुनर मंद लोग’ शीर्षक से छह कविताएं भी कवि की बेचैनी को बहुत बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत करती हैं। अब कहीं रूई की धुनाई होते नहीं दीखती- देखते-देखते इस तरह न जाने कितने छोटे-छोटे व्यापार बंद होते जा रहे हैं- जानते हम सभी हैं, संभवत: अनुभूत भी करते हैं, लेकिन उसे कहना कैसे है यह शाहीजी जैसे कवि के ही बस की बात है: ‘रूई धुनने के अलावा/ उसे आता नहीं था कुछ/ और रूई थी ही नहीं/ अब क्या धुने/ अपना सिर।’ कुम्हार का सच भी यही है: ‘मिट्टी बची नहीं/ चाक गया टूट/ बच गया डंडा/ कहां दे मारे?’
सदानंदजी की कविताओं में जो बाहर निकल कर बोलती है, वह उनकी तीखे व्यंग्य करने की अद्भुत क्षमता। कविता में ध्वनि और ध्वन्यर्थ की उपस्थिति कविता को कितना मारक बना सकती है, और कितना गहरा व्यंग्य कर सकती है, देखिए: ‘क्योंकि विचारधारा का अंत हो गया है/ कविता के अंत की मुनादी की जा चुकी है/ इसलिए/ आलोचकगण विमर्श पर विमर्श कर रहे हैं/ बकरियां भेड़ों पर/ भेड़ें नील गायों पर/ और नीलगाएं कवियों की दाढ़ी पर विमर्श के लिए आमादा हैं/ मुद्दा है कि दाढ़ी पर विमर्श करते हुए तिनके को/ कैसे नजर अंदाज किया जाए।’
सदानंद शाही के संदर्भ में एक सुखद बात यह है कि ऐसे समय में जब कविता में ‘प्रेम’ लगभग अनुपस्थित होता जा रहा है, उन्होंने निरी प्रेम कविताएं भी इस संग्रह में सम्मिलित की हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए जो एक बात और एकदम स्पष्ट होती है कि उनकी कविताओं में ‘प्रेम’ मनोभाव के रूप में ही उभरा है, उसमें न ऐंद्रिकता है, न मांसलता। जैसा कि आमतौर पर ‘प्रेम कविताओं’ में होता है। शाही का ‘प्रेम’ विशुद्ध रूप से एक कवि का प्रेम है, जो ‘स्थूलता’ का अतिभ्रमण कर के नितांत सूक्ष्म स्तरों तक पहुंचता है। शाही जब लिखते हैं: ‘इस जीवन को नागा नहीं जाने दूंगा/ एक प्रेम-पत्र लिखूंगा/ चुपके से तुम्हारे सिरहाने रख आऊंगा/ तुम्हारे बालों में लगाने के लिए/ कुछ फूल उगाऊंगा/ तुम्हारे दरवाजे रख आऊंगा।’ तो उनके प्रेम के मूक स्वरों को सरलता से समझा जा सकता है- यही तो उनकी कविता की अपनी विशिष्टता है, जहां स्वरों के मूक होने पर भी उन्हें साफ-साफ सुना जा सकता है। पंक्ति से अलग होकर वही कविता सहृदय के हृदय तक पहुंचती है, जो शब्दों के शोर का बोझ नहीं ढोती, बल्कि सिर्फ उतने शब्दों को चुनती है, जिनके बिना अपनी कही न जा सके: ‘समुद्र तट की रेत पर/ तुम्हारा नाम लिखा/ कि नहरों के साथ बह जाए/ मेरी बेचैनी भी/ अब हजार हजार लहरें/ मुझे लौटा रही हैं/ एक हाहाकार-सा मच गया है/ मेरे भीतर/ मेरे बाहर!’ यह पूरी की पूरी छोटी-सी कविता सिर्फ एक कविता भर नहीं है, बल्कि कवि के भीतर की समूची बेचैनी को सामग्रता में व्यक्त कर देती है।
कुल मिला कर सदानंद शाही की इन कविताओं को पढ़ते हुए कविता के नए मुहावरे से परिचय होता है, विशेष रूप से ‘हुनरमंद लोग’ जैसी कविताओं को पढ़ कर। लेकिन यह भी सच है कि संग्रह में ‘एक दिन यों ही’ जैसी भी कुछ कविताएं हैं, जो कतिपय हल्की लगती हैं, लेकिन एक संग्रह की हर कविता एक जैसी भारी तो नहीं हो सकती।
कृष्णा शर्मा
सुख एक बासी चीज है: सदानंद शाही; प्रतिश्रुति प्रकाशन, 7-ए, बेंटिक स्ट्रीट, कोलकता; 240 रुपए।

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First Published on October 16, 2016 1:20 am

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