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पढ़त की पगडंडियां : नंदकिशोर आचार्य

कवियों और काव्य कृतियों की समीक्षा करते हुए आचार्य ने कथ्य और संवेदना के बरक्स काव्य-भाषा और संरचना पर बल दिया है, पर वे यह भी संकेत करते हैं कि ‘भाषा और संरचना का बदलाव यथार्थ के नए रूपों और नई उद्भावनाओं को संभव बनाने के क्रम में भी होता है।’
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 06:26 am
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प्रतिष्ठित कवि नंदकिशोर आचार्य एक सजग, संवेदनशील और निष्पक्ष समीक्षक भी हैं। उन्होंने विविध विधाओं में सक्रिय रचनाकारों के रचनाकर्म का गहन विश्लेषण और समाज, संस्कृति, इतिहास, दर्शन और मानवाधिकार से संबद्ध विषयों पर भी गंभीर लेखन किया है। उनकी किताब पढ़त की पगडंडियां पिछले कई दशक की रचनाशीलता और रचनात्मक सरोकारों के विविध आयामों को प्रस्तुत करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है। संग्रह में संकलित रचनाकारों की कृतियों के विवेचन-विश्लेषण के माध्यम से आचार्य समीक्ष्य रचनाकार, रचना की संकल्पना, संवेदना, सर्जनात्मकता और भाषिक विशिष्टता के आलेखन के साथ ही रचनाकार-रचना के मूल्यांकन के संदर्भ में उसके व्यापक अभिप्रायों और सार्थकता की पहचान भी कराते हैं।

अज्ञेय के रचनाकर्म के मूल्यांकन के संदर्भ में सर्जनात्मक अन्वेषण के आयाम उद्घाटित करते हुए आचार्य लिखते हैं कि ‘किसी भी कलाकार की सर्जन-प्रक्रिया और सर्जनात्मक अवदान की सम्यक समझ और उसका मूल्यांकन किसी भी तरह की सरल एकरैखिक विधि में नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसकी सर्जनात्मकता बहुस्तरीय संश्लिष्टता के रूप में प्रतिफलित होती है।’ इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आचार्य ने रचनाकार की रचना-प्रक्रिया और रचनात्मक अवदान के विश्लेषण को सुविधाजनक बनाने के लिए उसे तीन स्तरों और उनके सूक्ष्म और आवयविक अंत:संबंधों में देखने की कोशिश की है। पहला, साहित्यकार ने अपने माध्यम, अपनी विधा यानी अन्वेषण विधि के साथ जो रिश्ता बनाया है, वह किस हद तक सर्जनात्मक है। दूसरा, अन्वेषण के माध्यम से वह क्या देख पाता है और उसे अनुभूत्यात्मक स्तर पर संप्रेषित कर पाने में कितना कामयाब हो सका है और तीसरा, कि वह अपने ग्रहीता के प्रति कितना उत्तरदायित्व अनुभव करता है। यह सवाल संप्रेषण की नैतिकता पर विचार की जरूरत की ओर इंगित करता है। इन मानकों को ध्यान में रख कर आचार्य ने अज्ञेय और अन्य रचनाकारों के कृतित्व का विश्लेषण किया है।

जयशंकर प्रसाद के नाट्य और कथा लेखन पर विचार करते हुए आचार्य ने प्रसाद का मूल्यांकन ‘जातीय स्मृति के संयोजक’ और ‘प्रामाणिक भावात्मकता के कथाकार’ के रूप में किया है। आचार्य का मत है कि मूल्यबोध, भाव संयोजन और भाषिक संरचना के माध्यम से प्रसाद की रचनाशीलता न केवल ऐतिहासिक और समकालीन विचलनों की पहचान, बल्कि अपने आत्म की स्मृति को पुन: संयोजित करने का एक सार्थक और गौरवपूर्ण प्रयास भी बन जाती है। प्रेमचंद की आध्यात्मिकता के विवेचन और उनके स्वराज की तत्त्वमीमांसीय व्याख्या के क्रम में आचार्य ने सर्जनात्मक लेखन और वैचारिक लेखन के अंत:संबंध और अलगाव को रेखांकित करते हुए लिखा है कि ‘सर्जक के लिए चिंतक भी होना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि उसका चिंतन तो सर्जन ही में रूपांतरित होता है और इसी कारण उसे किसी विशेष दर्शन पद्धति की सीमा में बांध कर नहीं देखा जा सकता। एकाधिक दर्शन पद्धतियां उसकी सर्जनात्मक संवेदना में घुलमिल गई होती हैं।’

आचार्य का मानना है कि प्रेमचंद दर्शनशास्त्र की बारीकियों में पड़ने वाले चिंतक नहीं हैं और उनका मूल प्रयोजन अपने समय और परिवेश के सम्मुख प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना है। पर आचार्य इस विचार प्रक्रिया की मूल प्रेरणा और जीवन को आंकने की कसौटी प्रेमचंद के आध्यात्मिक बोध को मानते हैं: ‘आत्मवाद वह अंत:सूत्र है, जो लगभग तीन दशक तक फैली उनकी चितंन यात्रा को एक आवयविक एकत्व देता है।’ जैनेंद्र के रचनाकर्म पर केंद्रित व्याख्यान ‘श्रद्धा का पुनरन्वेषण’ और आचार्य हजारी प्रसाद द्धिवेदी पर लिखी टिप्पणी ‘सनातनता की साधना’ में भारतीय संस्कृति की निरंतरता, उदारता और नैतिकता की परंपरा के आलोक में समीक्ष्य रचनाकारों और कृतियों का मूल्यांकन किया गया है। निर्मल वर्मा की कहानियों और उपन्यासों का उल्लेख करते हुए आचार्य ने लिखा है कि ‘निर्मल की कहानियां अकेलेपन से मुक्ति के लिए छटपटाहट की कहानियां हैं।…’

कवियों और काव्य कृतियों की समीक्षा करते हुए आचार्य ने कथ्य और संवेदना के बरक्स काव्य-भाषा और संरचना पर बल दिया है, पर वे यह भी संकेत करते हैं कि ‘भाषा और संरचना का बदलाव यथार्थ के नए रूपों और नई उद्भावनाओं को संभव बनाने के क्रम में भी होता है।’ आचार्य का मानना है कि ‘अज्ञेय हिंदी के पहले कवि हैं, जिनमें कविता के स्वभाव में परिवर्तन की सतर्क पहचान, नई रचना स्थिति के तर्क का पूरा स्वीकार और उससे उत्पन्न चुनौतियों का सजग अहसास है।’

रघुवीर सहाय के कवि कर्म पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा है कि ‘कविता रघुवीर सहाय के लिए एक अलग यथार्थ को जानने, रचने का नाम है, जिसे उनकी अतिरिक्त चेतना यानी उनका शिल्प संभव करता है। यह अलग यथार्थ दरअसल, एक कलात्मक या कलागत यथार्थ है, जिसकी संपुष्टि किसी सामाजिक यथार्थ से होनी आवश्यक नहीं हैं।’ हालांकि सामाजिक यथार्थ से कलागत यथार्थ का यह अलगाव रचना की सामाजिक सार्थकता, मूल्यवत्ता और वर्तमान बोध की पहचान से परहेज जैसा है।

जीवन दृष्टि और रचना दृष्टि के इन्हीं मानकों के आधार पर हिंदी के बहुपठित और बहुसमीक्षित रचनाकारों- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, विजयदेव नारायण साही, रमेशचंद्र शाह, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह, प्रयाग शुक्ल, गिरधर राठी, नंद चतुर्वेदी, वीरेंद्र कुमार जैन, मणि मधुकर, मंटो आदि के पूर्व प्रकाशित कविता संग्रह, कहानी संग्रह, उपन्यास, नाटक आदि पर आचार्य ने विगत दशकों में जो समीक्षाएं लिखी थीं वह इस संग्रह में संकलित हैं। कृति-केंद्रित समीक्षाओं का उद्देश्य केवल उनकी व्याख्या या भाष्य प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि इनके माध्यम से वह रचनाकार की रचनात्मकता के विविध आयामों को उद्घाटित करने के साथ ही रचना के अर्थ की खोज और उसकी सार्थकता की पहचान का प्रयास भी करते हैं।

इस प्रकार, संग्रह में संकलित समीक्षाओं और आलेखों के माध्यम से आचार्य ने साहित्य के उदात्त और मानवीय मूल्यों की पहचान कराने की सफल चेष्टा की है। अपनी अग्रज, मवयस्क और नई पीढ़ी के रचनाकारों की सर्जनात्मकता के परीक्षण और मूल्याकंन में आचार्य की दृष्टि निष्पक्ष और मतवाद से मुक्त रही है। हिंदी के प्रख्यात रचनाकारों और उनकी प्रसिद्ध कृतियों के विवेचन-विश्लेषण-मूल्यांकन द्वारा आचार्य भावी पीढ़ी को सजग, संवेदनशील, सक्रिय और समर्थ होने की प्रेरणा भी देते हैं।

आनंद शुक्ल
पढ़त की पगडंडियां: नंदकिशोर आचार्य; सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड, बीकानेर; 700 रुपए।

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