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किताबें मिलीं : इसी दुनिया में

अपने समकालीनों में संभवत: सबसे अभिनव और साहसी कवि वीरेन डंगवाल साधारण और रोजमर्रा दिखने वाले संसार के साथ गहन वस्तुनिष्ठता और कौशल के साथ बर्ताव करते हैं।
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 06:31 am
कविता में संसार का होना समाज का होना है। कवि उसे महसूस करता है समाज में जीते हुए भी।

वीरेन डंगवाल के इस संग्रह की कुछ कविताएं अब हिंदी साहित्य संसार में कल्ट की हैसियत रखती हैं। उनकी ‘हमारा समाज’, ‘इतने भले नहीं बन जाना साथी’, ‘तोप’, ‘पीटी ऊषा’ और अनेक अन्य रचनाएं इधर के दशकों में कविता के पाठकों और प्रेमियों द्वारा अनगिनत बार उद्धृत की गई हैं और उनका सार्वजनिक पाठ हुआ है। अपने समकालीनों में संभवत: सबसे अभिनव और साहसी कवि वीरेन डंगवाल साधारण और रोजमर्रा दिखने वाले संसार के साथ गहन वस्तुनिष्ठता और कौशल के साथ बर्ताव करते हैं। जैसा कि कई बार कहा जा चुका है, उन्होंने अपने अद्वितीय कविता संसार में गाय, मेज और मख्खी जैसी चीजों के लिए भी जगह बनाई। ऐसा करने के लिए बहुत अधिक प्रेम और साहस की दरकार होती है।

प्रेम, आशा, संघर्ष, विडंबना और सबसे ऊपर जीवन के इस महाकवि की रचनाओं ने हमें बार-बार उम्मीद और हौसला दिया है- ‘इन्हीं सड़कों से चल कर/ आते रहे हैं आतताई/ इन्हीं पर चल कर आएंगे/ हमारे भी जन।’

इसी दुनिया में: वीरेन डंगवाल; नवारुण, सी-303, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद; 100 रुपए।


स्त्री कथा, कथा अनंता
स्त्री-विमर्श की तमाम वैचारिक हलचलों और हो-हल्ले के बावजूद आज भी आधी आबादी का सच बेहद भयावह और डरावना बना हुआ है। पूरे आसमान और गोलार्द्ध पर कब्जा जमाए पुरुष सत्ता से स्त्री अपने हिस्से की मांग कर रही है; उसकी यह जद्दोजहद आज भी जारी है। आस्थाओं के बाजारीकरण के साथ ही स्त्री-विमर्श का भी विस्तार हुआ है। मीडिया के उभार के बीच स्त्री को महज ‘वस्तु’ या ‘उत्पाद’ के रूप में पेश किया जा रहा है। बाजार, मीडिया और पुरुष-सत्ता की तिहरी मार के बीच स्त्री को महज ‘उपभोग’ योग्य मान लिया गया है।

लेकिन देश की महिलाएं अब अपनी सच्ची और असली आजादी चाहती हैं। परिवार, समाज, राजनीति और अन्यान्य क्षेत्रों में भी स्त्री अपनी मुकम्मल जगह चाहती है। वह मुक्त होना चाहती है, उड़ना चाहती है। वह अपनी चाहतों को आकार देना चाहती है। बिस्तर से लेकर रसोई तक और रसोई से लेकर सड़क तक दौड़ती स्त्री अब अपना आकाश मांग रही है। पूरी पृथ्वी की धुरी होकर भी अधूरी रहने के संत्रास से मुक्त होना चाहती है स्त्री। इस पुस्तक में स्त्री-विमर्श के नए और व्यापक आयाम की तलाश की गई है। स्त्री-समस्याओं पर चर्चा है तो समाधान की कोशिश भी है।

स्त्री कथा कथा अनंता: रंजन जैदी; नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5, इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली; 80 रुपए।


क्षितिज पर एक पगडंडी
कविता में संसार का होना समाज का होना है। कवि उसे महसूस करता है समाज में जीते हुए भी। वरुण कुमार तिवारी कहते हैं कि ‘कवि मन सभी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक मूल्यों द्वारा अपना पर्यावरण पृथक निर्मित करता है। वह आदर्श और मूल्यों में जीता है। उसमें नैसर्गिक रूप से सत्य, न्याय और अच्छाई, सुसंगति आदि गुणों का विकास होता है और यह स्वाभाविक विकास होता है और यह स्वाभाविक विकास बाधित होने पर रचनाकार असीम दुख सागर में गोते खाने लगता है।’

वरुण कुमार तिवारी के इस संग्रह में कवि और कविता की जिजीविषा देखते बनती है। कवि की आस्था की दाद देनी होगी कि वह अनास्था के स्वर को देखते-सुनते हुए भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए आस्था के पक्ष में खड़ा होता है। जब कोई कवि कविता को जीवन की शर्त पर पाने की कामना कर रहा हो तो उसे और उसकी कविता के मन्तव्य को समाज और साहित्य के अनिवार्य अंग की तरह देखा जाना चाहिए।

क्षितिज पर एक पगडंडी: वरुण कुमार तिवारी; विकास पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, इ-33, सेक्टर ए-5/6, ट्रॉनिका सिटी, लोनी, गाजियाबाद; 395 रुपए।

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