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बाजार में दुर्दशाग्रस्त अनुवाद

व्यापारिक क्षेत्र में अनुवाद ने जिस तरह पैर पसारे हैं, उसे एक सीमा तक ठीक कहा जा सकता है। भाषा की बोधगम्यता का परीक्षण करके ही वे भुगतान करते हैं। पर जहां कहीं पाठ की संप्रेषणीयता का तत्काल परीक्षण नहीं होता, वहां अनुवाद की बड़ी दुर्गति है।
Author July 30, 2017 02:54 am

जब से ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के विकास पर जोर दिया जाने लगा है, अनुवाद की जरूरत भी बढ़ी है। आज समाज, शिक्षा, मनोरंजन और अर्थव्यवस्था से जुड़ा शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो, जहां अनुवाद का उपयोग न होता हो। प्रकाशन उद्योग में अनुवाद का बाजार काफी विस्तृत हो चुका है। तमाम भाषाओं में बनी फिल्मों को डब करके दुनिया के बाजार में उतारने का जतन किया जाता है। आज कोई ऐसा कारोबार नहीं, जो अनुवाद का सहारा लिए बगैर एक भाषा के बल पर आगे बढ़ने का दम भरता हो। ऐसे में, खासकर हिंदी में, अनुवाद की क्या स्थिति है, उससे हिंदी कितनी समृद्ध हो पा रही है, भाषा संवर्द्धन में अनुवाद का कितना योगदान होता है आदि पहलुओं पर इस बार की चर्चा।   – संपादक

वस्तु और विचार के विनिमय के लिए अनुवाद का चलन मानव सभ्यता के साथ ही शुरू हो गया था। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के फैलने से पहले तक इसकी नैष्ठिक पवित्रता बनी रही। इस दीर्घ यात्रा में यह धर्म-प्रचार, ज्ञान-विस्तार और शासन-संचालन का भी अभिन्न अंग बना रहा। आगे चल कर भारतीय ग्रंथों के अनुवाद में अपनाई गई ब्रिटिश कुटिलता के कारण अनुवाद-कर्म की धारणा पर पहली बार शक किया जाने लगा। साम्राज्य-विस्तार की धारणा से अनुवाद कराने की उसकी कलुषित नीति को भारत के राष्ट्रवादी बौद्धिकों ने उन्हीं दिनों उजागर कर दिया।
भूमंडलीकरण के इस दौर में अनुवाद का बाजार गरम है। इस बाजार को देख कर हमारे स्वदेशी बंधु बड़े उल्लसित हैं। वे अपने लिए बड़ी संभावनाएं ढूंढ़ने में लगे हैं। क्योंकि हमारे देश का शिक्षित समाज अनुवाद को लेकर बहुत भ्रम में है। उन्हें लगता है कि दो भाषाओं का समान्य ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति अनुवाद कर सकता है। भ्रम यह भी है कि स्रोत-भाषा और लक्ष्य-भाषा का ज्ञान कम भी हो, तो क्या फर्क पड़ता है, शब्दकोश तो है न! और उससे भी बड़ा सहायक, गूगल ट्रान्सलेट वेबसाइट तो है ही!… भाषा और अनुवाद के बारे में ऐसी अवहेलनापूर्ण धारणा शायद ही दुनिया के किसी कोने में हो! ऐसे में अबूझ अनूदित पाठ की अराजकता अकारण नहीं है।

भारतीय भाषाओं में अनूदित सामग्री जुटाने के लिए पीवी नरसिंह राव सरकार के समय ‘विशेष कोष’ की स्थापना हुई थी। बाद में 13 जून, 2005 को एक उच्च-स्तरीय सलाहकार संस्था ‘राष्ट्रीय ज्ञान आयोग’ का गठन हुआ। भारत के प्रधानमंत्री को ज्ञान-व्यवस्था संरक्षण के क्षेत्र में सलाह देने के लिए इसकी सिफारिशों की मुख्य चिंता का विषय था कि इक्कीसवीं सदी की आधुनिकता की वैश्विक दौड़ का मुकाबला ज्ञान-संपन्नता से ही संभव है; क्योंकि अब आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख संसाधन ज्ञान है। स्पष्टत: भारत को अपनी समृद्ध विरासत, राष्ट्रीय निजता और विलक्षण ज्ञान-परंपरा की ओर अनुरागपूर्वक सावधान होना था। संघ लोक सेवा आयोग के सन 2007-08 की वार्षिक रिपोर्ट का नतीजा निकला कि मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषयों की विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई में अस्सी-पचासी प्रतिशत शिक्षार्थी भारतीय भाषाओं में ही सहज रहते हैं, उसमें भी प्रमुखता हिंदी की रहती है। स्पष्टत: भारतीय ज्ञान और शोध को प्रोन्नत करना अनिवार्य था और इसके लिए आने वाले समय में अनुवाद की भूमिका सुनिश्चित थी। मातृभाषा के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पाठ्य पुस्तकों का सभी मातृभाषाओं में अनुवाद कराने की दिशा में पहल हुई; विभिन्न विषयों की कई दर्जन पुस्तकों का अनुवाद के लिए चयन हुआ; राष्ट्रीय अनुवाद मिशन का गठन हुआ; और भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

अब भारतीय पुस्तक बाजार की ओर रुख करें। इस समय भारत में लगभग उन्नीस हजार पुस्तक प्रकाशक हैं। संशोधित संस्करणों के अलावा यहां प्रति वर्ष करीब नब्बे हजार पुस्तकें छपती हैं, इनमें आधे से अधिक हिंदी और अंग्रेजी की होती हैं; शेष अन्य भारतीय भाषाओं की। इस संख्या का एक बड़ा हिस्सा अनूदित पुस्तकों का होता है। ये पुस्तकें भारतीय भाषाओं के पारस्परिक अनुवाद से लेकर विदेशी भाषाओं से भारतीय भाषाओं में अनुवाद तक की होती हैं। इन अनूदित पुस्तकों का व्यापार भी अच्छा-खासा होता है। पर विडंबना है कि भारत में पनपी ‘अनुवाद एजेंसी’ और ‘हम भी अनुवाद कर कमा सकते हैं’ की संस्कृति ने इस कर्म की धज्जियां उड़ा दी है।

असल में भारत में अनुवाद-कर्म से जुड़े लोगों के साथ एक बड़ी विडंबना है। इनके लिए समुचित मानदेय की कोई मानक व्यवस्था नहीं है। मोल-भाव से सारी बातें तय होती हैं। अधिकतर सरकारी संस्थाएं आज भी पचास पैसे प्रति शब्द से अधिक अनुवाद-शुल्क नहीं देतीं। निजी संस्थाएं उन्हीं का अनुकरण करती हैं। इस दर पर एक श्रेष्ठ अनुवादक का दैनिक भत्ता चार सौ रुपए से अधिक नहीं बनता। फिर यह काम भी निरंतरता में नहीं मिलता; लिहाजा काम पाने के लिए अनुवादक को किसी न किसी बिचौलिए की तलाश रहती है। ये बिचौलिए अनुवादकों का भरपूर शोषण करते हैं। इस विचित्र परिस्थिति में भारतीय सांगठनिक क्षेत्र के नियंता तनिक सोचें कि जिस अनुवादक को उचित मजदूरी भी नहीं मुहैया होती, उससे कैसे अनुवाद की अपेक्षा करेंगे!

अनुवाद-कर्म व्यापार नहीं, एक मिशन है। अनुवाद के लिए दी जाने वाली राशि मेहनताना या मूल्य नहीं, मानदेय कहलाती है- ज्ञान के विकास में निष्ठा से लगे किसी उद्यमी के सम्मान में दी जाने वाली मानद राशि। संस्थाओं-संगठनों का भी दायित्व बनता है कि वे एजेंसियों को न्यूनतम भुगतान पर अनुवादक तलाशने के लिए मजबूर न करें। फिर अनुवाद के अखाड़े में कूदने से पहले अनुवादकों को भी आत्म-मूल्यांकन करना चाहिए। इस क्षेत्र में आने की इच्छा ही है, तो कौशल जुटाएं। श्रेष्ठ अनुवादक को वांछित पारितोषिक देने के लिए भूमंडलीकृत बाजार और उनकी भाषा की सराहना करने के लिए विशाल उपभोक्ता समाज तैयार बैठा है। सरकारी नौकरी के अलावा जनसंचार, पर्यटन, व्यापार, फिल्म, प्रकाशन हर क्षेत्र में अनुवाद की तूती बजती है। सभी देशी-विदेशी फिल्मकार भारतीय भाषाओं में अपनी फिल्म की डबिंग करवाना चाहते हैं; विभिन्न ज्ञान-शाखाओं में बड़े-बड़े विचारकों की पुस्तकें प्रकाशक छापना चाहते हैं; सभी उद्योगपति अपने उत्पाद का विज्ञापन सभी भाषाओं में कराना चाहते हैं। इन सभी कार्यों की अपेक्षित योग्यता के बिना जो इस क्षेत्र में हाथ डालते हैं; वे सचमुच अपने देश के उपभोक्ता समाज के साथ गद्दारी करते हैं।

इस समय सभी संस्थानों की वेबसाइटों के हिंदी अनुवाद पर जोर है। सारी संस्थाएं मुस्तैदी से सरकारी फरमान के अनुपालन में यह काम एजेंसियों को सौंप कर निश्चिंत हो रही हैं। धनलोलुप, विवेकहीन एजेंसियां न्यूनतम कोटेशन के अनुवादक के आखेट में जुट जाती हैं। ऐसे में बेचारे अनुवादक क्या करें! गूगल देवता के चरण में पाठ को रख कर वे भी प्रसाद उठाते और एजेंसी को सौंप देते हैं। एजेंसियां उस पाठ का मूल्यांकन जिन विद्वानों से कराती हैं; उन्हें क्या पड़ी है कि उसमें खोट निकालें। एक बार खोट निकाल दें तो अगली बार उन्हें काम नहीं मिलेगा। वे उसे बेहतरीन अनुवाद का तमगा दे देते हैं। ऐसी रामभरोसे धारणा से संचालित अनुवाद-उद्योग के गरम बाजार पर संवेदना प्रकट करने के अलावा और कुछ नहीं किया जा सकता।

व्यापारिक क्षेत्र में अनुवाद के पांव जिस तरह पसरे हैं, उसमें मामला एक सीमा तक ठीक कहा जा सकता है, क्योंकि वहां अनूदित पाठ का सीधा संबंध भुगतान करने वालों के निजी हित से है। भाषा की बोधगम्यता का परीक्षण करके ही वे भुगतान करते हैं। पर जहां कहीं पाठ की संप्रेषणीयता का तत्काल परीक्षण नहीं होता, वहां अनुवाद की बड़ी दुर्गति है।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण तक भारतीय चिंतकों और उद्यमियों के अनुवाद संबंधी सारे प्रयास मानवीय, राष्ट्रीय और ज्ञान के प्रचार-प्रसार की धारणा से प्रेरित होते थे। अनुवाद तब तक कमाई का साधन नहीं बना था। ज्ञानाकुल समाज के हित में लोग राष्ट्रवादी भावना से अनुवाद करते थे। पर व्यापारिकता के प्रवेश ने इनकी लुटिया डुबो दी।
अनुवाद का एक समानधर्मा शब्द है आत्मसातीकरण। इसके लिए अंग्रेजी का शब्द एप्रोप्रिएशन है। धनार्जन के भारतीय आखेटकों के पास ऐसा बेहतरीन कौशल है कि वे जटिल से जटिल संयंत्र को अपने हित में एप्रोप्रिएट बना लेते हैं। अनुवाद के साथ भी ऐसा ही हुआ है। आत्मसातीकरण तो पहले भी होता था, तमाम भारतीय भाषाओं में वाल्मीकि रामायण का आत्मसातीकरण मौजूद है; पर इधर अनुवाद-कर्म स्वयं आत्मसातीकृत होकर दया की भीख मांग रहा है।

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