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पुस्तकायनः रुधिर का तापमान

कवि मलखान सिंह दलित रचनाकारों की पहली पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं। उनका पहला कविता संग्रह 1997 में आया। इस संग्रह ने जैसी लोकप्रियता अर्जित की वैसी किसी अन्य समकालीन कवि या कविता पुस्तक को नहीं मिली।
Author January 17, 2016 01:10 am

कवि मलखान सिंह दलित रचनाकारों की पहली पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं। उनका पहला कविता संग्रह 1997 में आया। इस संग्रह ने जैसी लोकप्रियता अर्जित की वैसी किसी अन्य समकालीन कवि या कविता पुस्तक को नहीं मिली। एकबारगी सोच कर आश्चर्य होता है कि अत्यंत चुभने वाली भाषा, तिलमिला देने वाले तेवर और बेचैन कर देने वाले कथ्य को कैसे स्वीकार कर लिया गया! अब उनका दूसरा संग्रह आया है-ज्वालामुखी के मुहाने पर।

मलखान सिंह की कविताओं में व्याप्त तल्खी दायित्वबोध से उपजी है। वे जानते हैं कि उनकी आवाज उत्पीड़ित समाज की वाणी है। उनके व्यथापूरित अनुभव निरे वैयक्तिक नहीं हैं। वे दलित समाज की संचित पूंजी हैं। इतिहास के लंबे दौर में हिंसक व्यवस्था का ‘प्रदेय’। ‘स्वानुभव’ के प्रति उनकी भिन्न दृष्टि का यही कारण है। समूचे उत्पीड़ित समुदाय से ‘स्व’ की अकृत्रिम संबद्धता उनके स्वत्व का निर्माण करती है। उनका अस्मिताबोध इसीलिए अनुदार और संकीर्ण नहीं हो सकता। वह ‘अस्मि’ का विस्तार करता चलता है। अस्मितावाद में ढल जाने का रास्ता नहीं अपनाता। यह विशेषता ही उनकी कविताओं को स्वीकार्य बनाती है। इससे यह भरोसा भी मजबूत होता है कि व्यापक पाठक समुदाय वास्तविक और मौसमी प्रतिबद्धता के बीच अंतर करना जानता है।

मलखान सिंह संवादी कवि हैं। उनकी कविताएं बातचीत के लिए आमंत्रित करती हैं। उनका अंदाज धमकाने वाला नहीं, पर चुनौती देने वाला है। उनके पहले संग्रह का शीर्षक ‘सुनो ब्राह्मण’ इसकी ताईद करता है। यह शीर्षक एकबारगी हमें कबीर शैली की याद दिलाता है- ‘सुनो भाई साधो’ या ‘सुनो हो संतो’। लेकिन थोड़ा और ध्यान दें तो पाएंगे कि यह शैली बुद्ध की है। महात्मा बुद्ध के कई उपदेश ‘भो ब्राह्मण’- हे ब्राह्मण- से प्रारंभ होते हैं। मलखान सिंह की संबोधन शैली बुद्ध और कबीर की याद करा कर भी उनसे अलग है। उनके संबोधन में विनम्रता नहीं, तंज नहीं, ललकार है। इस ललकार में उठते-उमड़ते, आत्मगौरव के भाव को रेखांकित करते दलित समुदाय की तेजस्विता है। यह तेजस्विता वर्णवाद को हतप्रभ करती, जातिवाद का सत्व सुखाती और अवमानना के भारवाहकों को चौंधियाती है।

जाति के प्रपंच से अवगत कवि ‘देव विधान’ को बेपर्दा करता चलता है- ‘उफ! तुम्हारा न्याय/ महाछल महाघात/ ज्ञात को अज्ञात के/ पेट में घुसेड़ कर/ रचता महाभाष्य/ ठगता पसीने को/ हमारी फटेहाली को नियति ठहराता है।’ जाहिर है कि मलखान सिंह के संबोधन में उद्बोधन मुख्य है। यह उद्बोधन उनके लिए है, जो अज्ञात और नियति के व्यूह से बाहर आना चाहते हैं। व्यूह के निमार्ताओं को कवि पहचानता है। वह चाहता है कि बाकी लोग भी इसे पहचानें।
संबोधन की प्रक्रिया भिन्न धरातल पर घटित होती है। जिसे संबोधित किया जा रहा है वह तल के उस बिंदु पर अवस्थित है, जहां से दासता का सोता फूटता है। स्रोत को नि:शेष करना कवि का अभीष्ट है- ‘इस विष वृक्ष को/ जड़ से उखाड़ फेंकने में/ हमारी आजादी है।’ जाति एक शृंखला है। इस शृंखला से सब आबद्ध हैं। समान रूप से। कोई एक जाति समूह अलग से मुक्त नहीं हो सकता। सबकी मुक्ति साथ-साथ होनी है। कवि इसमें एक पूर्वापर संबंध बनाता है। दलितत्व के विलोप की पूर्व शर्त है ब्राह्मणत्व का विलय। ब्राह्मण का अंत ही दलितपन का समापन संभव करेगा। यह बात कहने-सुनने में भले कू्रर लगती हो, लेकिन है सौ फीसद सच- ‘सुनो ब्राह्मण!/ हमारी दासता का सफर/ तुम्हारे जन्म से शुरू होता है/ और इसका अंत भी/ तुम्हारे अंत के साथ होगा।’

दलित कवि कथाकाव्य रचने में बहुत कम रुचि लेते हैं। उनकी कविता में कथातत्त्व मुख्यत: आत्मकथा के संदर्भों से आता है। मलखान सिंह ने भी कथा-कविता में प्रयोग लगभग नहीं किए हैं। हां, उनकी ‘यह कैसा महाआख्यान’ कविता कथाकाव्य के उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। इस कविता में झीना-सा कथा-तत्त्व है। सर्दी की एक सुबह के दृश्य को प्लाट के तौर पर रखा गया है।

यहां ठंड समाज-निरपेक्ष प्राकृतिक अवस्था नहीं है। वह जाति और वर्ग के आधार पर असर करती है। खेत में अलसुबह ‘कमीन कौम’ से काम कराती ‘ठकुराइसी मूंछें’ ठंड की पहुंच से बाहर हैं, वहीं फावड़ा चलाता दलित पात्र पहले अपनी अन्यमनस्कता से और फिर दूर नीले आकाश में लहराते झंडे में बने धम्मचक्र से हाड़-तोड़ ठंड का मुकाबला करता है।
कविता में आया दलित बस्ती का ब्योरा सर्दी के समाजशास्त्रीय भाष्य की जमीन तैयार करता है। मंदिर से उठती आवाज प्रकृति पर धर्म-संस्कृति की पकड़ का प्रमाण प्रस्तुत करती है। मनुष्य की आद्य स्मृतियों में से एक है शीत की स्मृति। मलखान सिंह उसके आधार पर कथातत्त्व बुनते हैं। मौसम उनकी कविताओं को बार-बार रूपाकार देता दिखता है। इसी स्रोत से उन्होंने कुछ आद्य बिंबों का चयन किया है। ‘अंधड़’ उनमें से एक है। यह आद्य स्मृति है और आद्य बिंब भी। एक घोर नास्तिक कवि का ईश्वर के विभिन्न संबोधनों/ नामों का सार्थक विनियोग रचना कौशल का उत्कृष्ट नमूना पेश करता है।

मलखान सिंह अपने सरोकारों की व्यापकता के लिए ख्यात हैं। शुद्ध अस्मितावादी धारा बेहद चयनधर्मी है। वह मुद्दों को फैलाने से बचती है। मसलन, अगर दलित मुक्ति का आशय वर्ण-जाति से निजात पाना है, तो आर्थिक प्रश्नों पर ध्यान देना गैर-जरूरी माना जाता है। इसी मुद्दे पर दलित पैंथर में फूट पड़ी थी। मलखान सिंह दलितों की सांस्कृतिक गुलामी को आर्थिक पराधीनता या शोषण से अलग नहीं करते। समकालीन राष्ट्रवाद की छानबीन करते हुए वे वैश्वीकरण की जकड़न तक पहुंचते हैं। उस उलटबांसी को वे अपनी कविता का विषय बनाते हैं, जहां एक तरफ श्वेत कपोत उड़ाया जा रहा होता है, दूसरी तरफ हथियारों की खेप भेजी या मंगाई जाती है।

अठारह बरस बाद कवि के दूसरे संग्रह ‘ज्वालामुखी के मुहाने पर’ का प्रकाशन इस अर्थ में ‘सुखद’ नहीं है कि हिंसाग्रस्त समाज सचमुच ज्वालामुखी के मुहाने पर है।
बजरंग बिहारी तिवारी
ज्वालामुखी के मुहाने पर: मलखान सिंह; शब्दारंभ प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली; 200 रुपए।

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