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परिदृश्यः बंद दिमाग के ताले

शिक्षित व्यक्ति को स्त्री के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? किस तरह समानता, न्याय को व्यवहार में उतारना है? इसकी कोई जानकारी शिक्षा के किसी भी पाठ से नहीं मिल पाती। तो फिर कौन से ये सबक हैं, जो बड़े से बड़े आलिम फाजिल को स्त्री के बारे में तयशुदा सोच से बाहर नहीं आने देते।

माना जाता है कि शिक्षा से ज्ञान के द्वार खुलेंगे, रूढ़ियों से मुक्ति मिलेगी और भविष्य कुछ बेहतर और शायद चमकदार हो उठेगा। जोड़-जुगाड़ से, नकल से या जैसे-तैसे डिग्री पा लेने के उपक्रम से लेकर अंगरेजी स्कूलों की नई शिक्षा पा लेने तक मामला सिर्फ रोजगार का नहीं रहता, बल्कि शिक्षित हो जाने या कहलाए जाने का भाव भी इसमें जुड़ा रहता है। इन सारे प्रयत्नों के बावजूद जो लोग बहुत पढ़-लिख नहीं पाए या जो बहुत ऊंची डिग्रियां हासिल कर सके, कुछ अपवादों को छोड़ कर, उन सभी की सोच स्त्री को लेकर एक जैसी ही दिखाई पड़ती है। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर हमारी शिक्षा देती क्या है? अगर दिमाग उसने खोला नहीं, सारी टेक्नोलॉजी के बावजूद वैचारिक-व्यावहारिक प्रगतिशीलता की तरफ वह ले नहीं गई, मनुष्यता के प्रश्नों से टकराने का तर्क सम्मत हौसला उसने पैदा नहीं किया, संवेदनशीलता को बढ़ाया नहीं, सोच के स्तर पर अगर उसी जड़ता से चिपके रह गए, तो यह सारा ज्ञानकांड ही हुआ कि सही मायनों में कुछ बिना सीखे आप शिक्षित कह दिए गए।

दफ्तर का चपरासी हो, माली, कर्मचारी, आला अफसर या कोई बौद्धिक क्षेत्र का व्यक्ति या अपने को विद्वान कहलाने को आतुर, अपनी पत्नी को नियंत्रित करने के सामंती तरीके अपनाना नहीं भूलता और उसके नैतिक आदर्श पुराने मापदंडों से तय करता है। साथ ही बदले हुए समय को देखते हुए चाहता है कि वह कमा कर भी लाए, लेकिन अपने निर्धारित कर्तव्यों में जरा भी चूक न करे। अगर उसकी कहीं थोड़ी भी मदद कर दिया तो उसका अहसान बहुत बड़ा बना देते हैं।

बचपन में मैं समझती थी कि विज्ञान पढ़ने वाले लोग सही वैज्ञानिक दृष्टि पा जाते होंगे। इसलिए ऐसे लोग जो विज्ञान पढ़ने के बावजूद संकीर्णता में मेडल देने योग्य होते थे, बहुत बचपन से ही मैं उनके पढ़ने को संदेह की दृष्टि से देखती थी। ऐसा लगता था कि इन लोगों ने जी चुरा कर पढ़ाई की होगी, इसलिए विद्या के मर्म को ग्रहण करने में असमर्थ हो गए होंगे। लेकिन धीरे-धीरे मेरी यह समझ निर्मूल साबित हुई। पता चलने लगा कि कितना भी पढ़ लें और अपने विषय के विशेषज्ञ बन जाएं पर स्त्री के बारे में उनकी सोच में कोई आमूलचूल परिवर्तन की गुजांइश नहीं हो पाती है। हल्के-फुल्के कुछ परिवर्तन आर्थिक मामले के कारण जरूर करने पड़ गए हैं। पर वे इतने भी नहीं हैं कि स्त्री को मनुष्य की गरिमा के साथ सामान्य रूप से समाज में जगह दे दी जाए।
अब देखिए, आज भी विज्ञान का एक प्रोफेसर अपनी पत्नी की यौनशुचिता का परीक्षण परंपरागत तरीके से करता है और इसे तलाक का आधार बनाता है। इसके भी आगे उसके बंद दिमाग का सबूत है, उसका उतना ही परंपरागत दूसरा विवाह करना, जिसमें फिर से उन्हीं स्थितियों की परीक्षा करनी होती है या यौन नियंत्रण के अधिक हिंसक तरीके अपनाए जा सकते हैं। फिर इस शिक्षा ने बंद दिमाग के कौन से कपाट खोले?
डॉक्टर स्त्री का पिटना, चित्रकार स्त्री की बेइज्जती या शिक्षिका स्त्री के रोटी बनाने की कला के आधार पर उसके क्षिक्षित होने को तय किया जाना आदि ऐसी ही घटनाएं हैं, जो लगातार शिक्षा के ज्ञानकांड का परदाफाश करती रहती हैं। इसी तरह जब तब हमारा शिक्षित समुदाय, ज्ञानी समुदाय या नेतृत्वकारी समुदाय, स्त्री पर की गई जघन्य घटनाओं के समय प्रतिक्रिया देते हुए अपने बलशाली मानस को व्यक्त करता रहता है। कभी ड्रेस कोड की बात करके, कभी अंधेरा होने के बाद बाहर निकलने को लेकर, कभी उनकी पुरुषों के साथ बातचीत को लेकर, मैत्री को लेकर आदि पर अपनी टिप्पणियों से बता देता है कि समय बदलने का भ्रम करना बेमानी ही होगा। महानगरों में पढ़ने आई लड़कियों के लिए बिना विचारे ही उसके मुख मंडल से अपमानजनक वाणी फूट पड़ती है! फिर यह कौन-सी सभ्यता में पंहुच पाए हैं हम? कौन-से विकास की दिशा तय की जा सकी है?

इस तरह शिक्षा पूरी कर लेने या डिग्रियां इकट्ठी कर लेने के बाद भी प्राय: लोग चेतना और जागरूकता से दूर ही रह जाते हैं। रूढ़ियों के बंधन काटने के बजाय उन्हें यथावत बनाए रखने में उनकी आस्था पूर्ववत बनी रहती है। शिक्षित व्यक्ति को स्त्री के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? किस तरह समानता, न्याय को व्यवहार में उतारना है? इसकी कोई जानकारी शिक्षा के किसी भी पाठ से नहीं मिल पाती। तो फिर कौन से ये सबक हैं, जो बड़े से बड़े आलिम फाजिल को स्त्री के बारे में तयशुदा सोच से बाहर नहीं आने देते। जीवन व्यवहार और शिक्षा को दो अलग-अलग पाटों में किस तरह बांट दिया गया है कि जीवन के सबसे जरूरी मुद्दों को समझे-जाने बिना ही पढ़ कर निकल आएं!
कई बार छोटे बच्चे यह प्रश्न करते भी हैं कि ‘जो हम पढ़ रहे हैं, उसका हमारे जीवन में क्या उपयोग है? पहली कक्षा में जो पढ़ा था, दूसरी में उसे भूल चुके हैं, केवल परीक्षा लक्ष्य है।’

बाद में यही लक्ष्य नौकरी तक सीमित रह जाता है। लेकिन धीरे-धीरे व्यवस्था से अनुकूलित होते हुए बच्चे यह प्रश्न करना छोड़ देते हैं और परीक्षा में अधिक अंक लाने की होड़ में शामिल हो जाते हैं। या कई बार यह भी होता है कि ऐसी शिक्षा से उनका मन उचाट हो जाता है, जो उन्हें कहीं से भी अपने से नहीं जोड़ रही होती है। प्राय: पढ़ाने वाले भी तंगनजर ही रह जाते हैं, नतीजा दिए गए पाठ्यक्रम को समय से निबटा देने के अलावा उसके इर्द गिर्द या उससे जुड़ी दुनिया के दरवाजे अपने विद्यार्थियों के लिए वे नहीं खोल पाते।

दूसरा पहलू यह भी है कि तमाम पढ़-लिख कर स्त्री के भी बंद दिमाग के ताले मुश्किल से खुल पाते हैं। उनका दिमागी अनुकूलन इतना गहरा है कि उसे छिन्न-भिन्न करना आसान नहीं रह जाता। प्रारंभ में उनकी शिक्षा के साथ सिर्फ स्त्री धर्म शिक्षा ही जरूरी मानी गई थी, जिसमें गृहविज्ञान अनिवार्य विषय हुआ करता था। नवजागरणकालीन सुधारकों की चिंता में स्त्री शिक्षा थी जरूर, पर उसका पाठ्यक्रम तैयार करने वालों की चिंता में स्वयं स्त्री बड़ी समस्या थी। पढ़ाइए, मगर इस चाल से कि सद्गृहिणी की भूमिका और अच्छी तरह निभा सके। यही स्त्री शिक्षा का मूल भाव था, जिसने लंबे समय तक स्त्री पर मानसिक दबाव बनाए रखा कि कहीं शिक्षित होना उनके पारिवारिक जीवन पर भारी न पड़ जाए।

ज्ञान-विज्ञान के अन्य क्षेत्र स्त्री के लिए माने ही नहीं गए थे। इसके बावजूद अगर स्त्रियां उधर गई हैं तो यह प्रगतिशील दिमागों के सहयोग और उनकी अपनी समझ का नतीजा था। इस जागरूकता में अनुभव से प्राप्त ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टि, बाहरी दुनिया से संपर्क और संघर्ष की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। स्वयं के द्वारा किए गए प्रयत्न ही इस पाट-कपाट से मुक्ति की समझ तैयार करने में मदद कर पाते हैं। इसे समझते हुए ही, इसी अक्षरज्ञान को माध्यम बना कर स्त्रियों और दलितों ने अपनी प्रगति के रास्ते तैयार किए। लेकिन ध्यान देने की बात है कि दोनों ने ही तयशुदा पाठ्यक्रम से बाहर आकर अध्ययन, चिंतन, लेखन और प्रतिरोध किया।

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