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हमारा इस्लाम, उनका इस्लाम

हिंदुस्तान में इस्लाम खतरे में नहीं है। इस्लाम की वजह से भी यहां कोई धर्म खतरे में नहीं है। इस्लाम पर खतरा और इस्लाम से खतरा फिलहाल हमारे यहां नहीं है।

हिंदुस्तान में इस्लाम खतरे में नहीं है। इस्लाम की वजह से भी यहां कोई धर्म खतरे में नहीं है। इस्लाम पर खतरा और इस्लाम से खतरा फिलहाल हमारे यहां नहीं है। शायद होगा भी नहीं। हालांकि इसकी मैं गारंटी नहीं ले रहा- कहीं भी, कभी भी, कुछ भी हो सकता है जैसे कुछ दिन पहले रूस के यात्री विमान के साथ हुआ, जिसमें दो सौ चौबीस मासूम मारे गए या फिर गए हफ्ते पेरिस में हुआ। दोनों दर्दनाक घटनाएं थीं। सीरिया में अमेरिका और मित्र राष्ट्रों की जवाबी बमवर्षा और साथ ही जी-20 सम्मेलन के नेताओं का इस्लामिक स्टेट (आइएस) के प्रति कड़ा रुख इस बात का द्योतक है कि यूरोप के कुछ हिस्सों और पश्चिम एशिया के ज्यादातर देशों में या तो इस्लाम पर खतरा है, या इस्लाम से खतरा है। दोनों खतरे बहुत गंभीर हैं और दोनों आपस की आग में घी डाल रहे हैं। एक बड़ा विस्फोट पेरिस में हो चुका है। कई और होंगे और एक बड़ी लड़ाई इसके बाद छिड़ जाएगी। शायद यह लड़ाई शुरू भी हो गई है।
इस्लामोफोबिया पश्चिम में अपने चरम पर है। कुछ जानकार पिछले एक दशक से इसे सभ्यताओं का टकराव बता रहे हैं। यानी उदारतावाद बनाम कट््टरवाद। सीधे लफ्जों में ईसाई बनाम मुसलमान। शुरू में यह वाद कुछ चरमपंथियों के बीच ही था। धीरे-धीरे फैलता गया और आज ऐसी स्थिति है कि एक-दूसरे का सिर कलम करना इन दोनों के लिए एकमात्र रास्ता बचा है। कुछ लोगों से उठ कर यह विवाद आज एक बड़े क्षेत्र में फैल गया है और विश्व की शांति और सुरक्षा पर गंभीर सवालिया निशान लग गया है। मजहब के नाम पर देश आपस में भिड़ गए हैं। कल का उपद्रवी तत्त्व आज की मुख्य धारा बन गया है।
भारत में इसका असर हम लगभग तीन दशक से देख रहे हैं। इससे पहले पाकिस्तान का बनना इस बात का सबूत है कि मुट्ठी भर चरमपंथी देखते-देखते कौम की सोच पर हावी हो जाते हैं और इतिहास को प्रभावित कर जाते हैं। अनजाने में, अनचाहे भी, लाखों लोगों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है और नक्शे भोंड़े और छोटे हो जाते हैं। उस वक्त कुछ लोगों ने यह दलील दी थी कि मुसलिम राष्ट्र इसलिए जरूरी है, क्योंकि हिंदू और मुसलिम दो अलग-अलग संस्कृतियां हैं और एक-दूसरे के साथ नहीं रह सकतीं। पता नहीं क्यों, पर यह बात दब गई कि दोनों सदियों से एक साथ रह रहे हैं और अलग होने का मुद्दा कभी उठा ही नहीं। यह भी भूल गए थे कि इस्लाम जितना भारत में पल्लवित-पुष्पित हुआ है, उतना दुनिया के किसी कोने में नहीं। इस्लाम के सभी संप्रदाय सिर्फ हिंदुस्तान में संरक्षित हैं, और कहीं नहीं। आज भी उन पर कोई आंच नहीं है। शिया हों या सुन्नी, अहमदिया हों, वोरा या फिर सूफी, सभी महफूज हैं। इस्लाम के नाम पर बने देशों में ज्यादातर इस्लामी कौमें/ संप्रदाय/ समूह गायब हो गए हैं।
पाकिस्तान बनाने की सोच विदेशी थी। स्वतंत्र भारत में यह सोच कश्मीर से सालों बाद एक बार फिर उभरी। आयात किया हुआ वहाबी इस्लाम हावी हो गया और घाटी की विविधता लुप्त हो गई। सिर्फ एक तरह का इस्लाम कबूल था। इसकी शुरुआत फिरकापरस्ती की छोटी-मोटी घटनाओं से हुई, जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। 1980 के अंत में इसे कुछ शरारती तत्त्वों का उन्माद कहा जाता था। बंदूक के बल पर शुरू हुआ सिलसिला घाटी के सभ्य समाज की सोच का हिस्सा बन गया। वहाबी इस्लाम ने एक तरफ तो सूफी परंपरा खत्म कर दी और दूसरी तरफ कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर दिया। एक हजार साल से चली आ रही इस्लामी सहजता अचानक आयातित कट््टरता की असहिष्णुता से लबालब हो गई। कश्मीर में आज चाहे अमन-चैन हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था चल रही हो, पर इसमें धर्म के नाम पर कब उलट-फेर हो जाए, कहना मुश्किल है।
कश्मीर से हमको सबक लेना चाहिए। हिंदुस्तान में इस्लामिक स्टेट का वहाबी इस्लाम होगा, सऊदी अरब का इस्लाम होगा या फिर हिंदुस्तानी परंपरा का इस्लाम, इस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। बहस इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि हिंदुस्तानी अवाम ने सर्वधर्म समभाव और लोकतांत्रिक तौर-तरीके को अपनी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का मूल स्तंभ बनाया है। इन दोनों के बिना भारतीय लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आम नागरिक इसी व्यवस्था के लिए कटिबद्ध है। इसी के लिए उन्होंने हजारों कुरबानियां दी हैं। यही उनके लिए सर्वोपरि है, सर्वश्रेठ है।
हिंदुस्तान का मुसलमान इसमें पूरी भागीदारी करता है। सैंतालीस के विभाजन के दौरान ही एक बड़े मुसलिम तबके ने धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में रहने का फैसला कर इस जीवन पद्धति के प्रति अपनी सहमति जता दी थी। वह धर्म के नाम पर बने देश में नहीं गया। आज भारत में जितने मुसलमान हैं, उतने दुनिया के किसी देश में नहीं हैं। साथ ही पाक इस्लाम के जितने संप्रदाय हैं उतने हिंदुस्तान को छोड़ कर किसी देश में नहीं हैं। साफ है कि हिंदुस्तान में रहने वाले मुसलमान हर प्रकार के धर्मों के साथ रहना और पनपना चाहते हैं। यही उनका इस्लाम है, पाक कुरआन का इस्लाम, दुनिया के इस कोने में रचे-बसे लोगों का इस्लाम। हिंदुस्तान का इस्लाम। यानी सहिष्णुता का मजहब।
हिंदुस्तान में इस्लाम को खतरा या इस्लाम से खतरा तभी होता है, जब इस परिवेश के मजहब का रूपांतर करने की कोशिश होती है। जब अरब या उसके आसपास का इस्लाम आयात किया जाता है, तो वह देश के मूलभूत ढांचे से संघर्ष में आता है। जैसा कश्मीर में हुआ, जहां कश्मीरियत की जगह वहाबी इस्लाम रोपा गया। प्रत्यारोपण हो तो गया, पर उसके परिणाम सबके सामने हैं- कत्लेआम, लाखों कश्मीरी शरणार्थी और कश्मीरियत का लोप। हिंदुस्तान जैसे विशाल देश के लिए कश्मीर एक छोटा-सा अनुभव है। छोटा, पर अत्यंत कटु अनुभव। क्या हम सभी देशवासी इस अनुभव को राष्ट्र स्तर पर दोहराना चाहेंगे? क्या आम हिंदुस्तानी मुसलमान इस तरह का खून-खराबा चाहता है, जैसा पश्चिम एशिया में हो रहा है, जहां इस्लाम के विभिन्न अनुयायी ही एक-दूसरे की जान के प्यासे हो गए हैं? क्या वह चाहता है कि यहां भी सभ्यताओं का टकराव हो, जो यूरोप में हो रहा है?
अगर ऐसा नहीं है तो सारे समाज को एकजुट होना पड़ेगा। बाहरी इस्लाम से प्रेरित किसी भी घटना को हम कुछ सिरफिरों की करतूत कह कर नहीं टाल सकते। उस पर राजनीति भी नहीं कर सकते। किसी भी बहस में पड़ कर वक्त बर्बाद नहीं कर सकते। आयातित विचार-व्यवस्था को हिंदुस्तानी मानस पर नहीं मढ़ सकते। जहां भी ऐसा प्रयास अंकुरित हो, उसे उसी वक्त जड़ से उखाड़ा जाना चाहिए। आयातित इस्लाम- चाहे वह सऊदी प्रकार का हो, इस्लामिक स्टेट जैसा हो, अल-कायदा हो या बोको हराम सरीखा- हमारे लिए हलाल नहीं हो सकता। सिर्फ हिंदुस्तानी इस्लाम हमको कबूल होना चाहिए, क्योंकि यही एक इस्लाम है, जो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखता है और देश की मुख्यधारा से जुड़ा है। यह इस्लाम जानता है कि आधुनिक होने का मतलब अपने मजहबी संस्कारों से कट जाना नहीं है, वेश-भूषा, खानपान या रीति-रिवाज बदलना नहीं, बल्कि इन सभी में वह जोड़ना है, जिससे एक आम मुसलमान की रूहानी-भौतिक जिंदगी ज्यादा सरल, सहज, खुशहाल हो। हमारा इस्लाम आदमी को इंसान होने का मौका मयस्सर करा रहा है। इस सिलसिले को रोकने की कोई भी कोशिश नाकाबिले-बर्दाश्त होनी चाहिए।

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