ताज़ा खबर
 

कभी-कभार : नेहरू-स्मृति

आजकल जवाहरलाल नेहरू को अवमूल्यित करने का एक सुनियोजित अभियान चल रहा है: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिकुड़ते क्षेत्र पर भी बहस है। इस संदर्भ में कुछ घटनाएं..
Author नई दिल्ली | November 14, 2015 19:58 pm
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू

आजकल जवाहरलाल नेहरू को अवमूल्यित करने का एक सुनियोजित अभियान चल रहा है: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिकुड़ते क्षेत्र पर भी बहस है। इस संदर्भ में कुछ घटनाएं याद आती हैं। 1956 में जब रूसी कवि-उपन्यासकार बोरिस पास्तरनाक को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो सोवियत सरकार ने इसका घोर विरोध किया। उसने पास्तरनाक को नोबेल लेने स्वीडन जाने से इनकार भर नहीं किया, उन्हें रूस से देशनिकाला देने का उपक्रम भी किया जाने लगा। शुरुआत के तौर पर मास्को लेखक संघ ने पास्तरनाक को देशद्रोही करार कर उन्हें देशनिकाला देने का प्रस्ताव पारित किया।

उसके बाद जल्दी ही सोवियत लेखक संघ इसी तरह का प्रस्ताव पारित करने जा रहा था कि इंग्लैंड में कई बुद्धिजीवियों ने, जिनमें आल्डुअस हक्सले और स्टीफेन स्पेंडर प्रमुख थे, पास्तरनाक का बचाव करने के लिए एक समिति गठित की और नेहरू से उसकी अध्यक्षता करने का अनुरोध किया जो उन्होंने मान लिया। उसके बाद नेहरू ने सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ख्रुश्चोव से आग्रह किया कि वे पास्तरनाक को देशनिकाला न दें और उन्हें नोबेल पुरस्कार लेने दें। चूंकि सोवियत संघ से भारत के संबंध उन दिनों घनिष्ठ थे और नेहरू का बहुत आदर था, ख्रुश्चोव ने पहली बात तो मान ली, पर दूसरी नहीं। पास्तरनाक रूस में रहे आए, पर स्टाकहोम नहीं जा सके।

अमेरिका में बस गए एक दूसरे रूसी लेखक नोबोकोव के उपन्यास ‘लोलिता’ की एक अश्लील रचना के रूप में बहुत चर्चा हो रही थी। उसकी प्रतियां जब भारत आर्इं, तो कस्टम अधिकारियों ने उन्हें रोक लिया। मामला नेहरू तक पहुंचा। एक प्रति भी उन्हें भेजी गई। उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को उसे पढ़ कर राय देने के लिए कहा। रात भर उसे पढ़ कर सुबह बेटी ने पिता से कहा कि उसे अश्लील करार देना उचित नहीं है। उपन्यास की प्रतियां कस्टम ने मुक्त कर दीं। नेहरू जब साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष थे तब हिंदी के लिए उसका राष्ट्रीय पुरस्कार राहुल सांकृत्यायन को देने का निर्णय जूरी ने किया। राहुल विख्यात वामपंथी थे। इसलिए अंतिम निर्णय अध्यक्ष ले, यह तय किया गया। वामपंथी तब कांग्रेस के कटु आलोचक थे और आजादी को झूठी आजादी बताते थे। नेहरू ने निर्णय लिया कि पुरस्कार जूरी की सिफारिश के अनुसार दिया जाए और इसमें वैचारिक मतभेद या विचारधारा के आधार पर हस्तक्षेप या फेरबदल अनुचित होगा।

याद तो यह भी आता है कि पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के उपन्यास ‘चाकलेट’ को अश्लील करार देते हुए बनारसीदास चतुर्वेदी ने उसे घासलेटी साहित्य घोषित किया था और ऐसे साहित्य के विरुद्ध अभियान चला दिया था। श्लील-अश्लील का फैसला करने के लिए बनारसीदास ने एक प्रति महात्मा गांधी को भेजी, जिन्होंने उसे पढ़ कर उत्तर दिया कि पढ़ने के बाद वह उन्हें अश्लील नहीं लगा। यह बड़ी विडंबना है कि विचारधारा और नैतिकता में हम स्वतंत्रता संग्राम और लोकतंत्र के आरंभिक दौर में अधिक उदार थे: अब अधिक कट््टर और असहिष्णु और हिंसक हो गए हैं! तीन बुद्धिजीवियों और लेखक की उनके विचारों के कारण दिन दहाड़े हत्या की गई है!

एक ‘देशद्रोही’ टिप्पणी:

आठ दिन पहले एक अभिनेता के नेतृत्व में एक मार्च निकला, जिसमें उन लेखकों-कलाकारों आदि को देशद्रोही कहा गया, जिन्होंने देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में अपने पुरस्कार आदि लौटाए हैं, ‘जो बाघा सरहद के उस पार फेंके जाने के काबिल हैं’। यह नारा भी उछला: ‘ढोंगी साहित्यकारों को, जूते मारो सालों को।’ एक मुसलमान और लोकप्रिय अभिनेता ने सार्वजनिक रूप से बढ़ी असहिष्णुता की निंदा की और पुरस्कार आदि लौटाए जाने को साहसिक कार्रवाई बताया था। सो उनके बारे में इस मार्च में शामिल एक बालीवुड अभिनेता ने कहा कि ‘जब उनकी कोई फिल्म रिलीज होती है तब मुसलमानों को मुफ्त टिकट बांटे जाते हैं।’ कन्नड़ के एक मूर्धन्य लेखक ने कहा कि ‘नए प्रधानमंत्री को गिराने की साजिश है- यह शुद्ध राजनीति है और हम यह नहीं होने देंगे।’ इसके बरक्स हमने एक नवंबर को दिल्ली में अपने एक आयोजन प्रतिरोध में सार्वजनिक वक्तव्य स्वीकार किया, उसका एक प्रासंगिक अंश इस प्रकार है:

‘शिक्षा और संस्कृति के सभी महत्त्वपूर्ण संस्थानों में हस्तक्षेप करके उन्हें कद और दृष्टि में ओछा और संकरा किया जा रहा है और उनके मूल उद्देश्यों को नष्ट किया जा रहा। हम इस नतीजे पर पहुंचने को मजबूर हुए हैं कि विचार और कर्म का उदार स्पेस तेजी से सिकुड़ रहा है। इसी कारण सृजन और बुद्धि के समुदाय के हम लोगों ने इसके प्रतिरोध में आवाज उठाने का फैसला किया है।

हम भारतीय जन और नागरिकों से निवेदन करते हैं कि चूंकि वे ही मुख्यत: और अंतत: भारतीय लोकतंत्र और उसकी साझी परंपरा के रखवाले हैं, वे एकजुट होकर सुनिश्चित करें कि विभाजनकारी शक्तियां कामयाब न हो पाएं। हम सभी राजनीतिक दलों, केंद्र और राज्य सरकारों से मांग करते हैं कि वे अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह करें और ऐसी शक्तियों को प्रोत्साहित करने और उन्हें संरक्षण देने से बाज आएं। वे ऐसी संस्थाओं, समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करें जो अभी नफरत, हिंसा का माहौल बना कर भारत की संवैधानिक आत्मा को जख्मी कर रहे हैं।

हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि राजनीतिक दल और सरकारें भारतीय संविधान से ही अपनी वैधता पाती हैं और इसलिए उनकी जिम्मेदारी है कि वे संविधान के मूल सिद्धांतों और दृष्टि को दरकिनार या नष्ट न करें। हम अपने सांसदों और विधायकों को याद दिलाना चाहते हैं कि वे भारतीय जनता से प्रतिबद्ध हैं और इस कारण उनसे मांग करते हैं कि वे जनहित में और संविधान के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करें, न कि बोलने के अपने अधिकार को बहिष्कार आदि में जाया करें।’

वक्तव्य में यह भी कहा गया: ‘भारतीय परंपरा, लोकतंत्र और उसका जटिल सामाजिक ढांचा अनिवार्य और गहरे बद्धमूल बहुलता, परस्पर आदर-विश्वास, सहयोग और सामाजिक सामंजस्य और मेलमिलाप से पुष्ट और सशक्त होते रहे हैं। लेकिन अभी ऐसी सामाजिक-राजनीतिक आबोहवा बन गई है, जिसमें किसी भी तरह की अल्पसंख्यकता, वह धर्म की हो या विचार की, खतरे में है। असहमति जाहिर करने वालों का चरित्रहनन किया जा रहा है, दूसरी तरह से धमकियां दी जा रही हैं, उन पर हमले हो रहे हैं।’ कोई भी देख सकता है कि असहिष्णुता कितने रूप धर रही है और हमारे संयुक्त वक्तव्य के बरक्स गालीगलौज और चरित्रहनन का मार्च अपने आप में उसी का एक भदेस रूप है।

गीता के भाष्य:

कुछ महीनों पहले किसी मंत्री ने यह प्रस्ताव किया था कि भगवद्गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाए। बात आई-गई हो गई। इधर खयाल आया कि बीसवीं शताब्दी में गीता पर जिन तीन, बल्कि चार नेताओं ने बाकायदा भाष्य लिखे और प्रकाशित किए वे हैं बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, सर्वपल्ली राधाकृष्णन और विनोबा भावे। राधाकृष्णन ने गीता का अंगरेजी में और विनोबा ने मराठी में अनुवाद भी किया।

ऐसा याद नहीं आता कि जो शक्तियां आजकल भारतीय परंपरा, हिंदू धर्म, अध्यात्म की मनमानी दुर्व्याख्याएं लगातार फैला रही हैं, उनके किसी नेता या विद्वान ने गीता का कोई विधिवत नया भाष्य लिखा हो। हमारी परंपरा में किसी ग्रंथ को स्वायत्त करने का एक मान्य तरीका यह था कि आप उसकी विस्तार से व्याख्या करें। निरे भावुक उच्छवास या भक्ति भावना से गीता जैसी महान दार्शनिक कविता को समझा-समझाया नहीं जा सकता।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. S
    shalabh
    Nov 15, 2015 at 8:51 am
    foolish
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग