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पत्रकारिता: सिकुड़ता दायरा

हिंदी पत्रकारिता को यह गौरव प्राप्त है कि वह न सिर्फ इस देश की आजादी की लड़ाई का मूल स्वर रही, बल्कि उसने हिंदी को एक भाषा के रूप में रचने, बनाने और अनुशासनों में बांधने का काम भी किया। हिंदी भारतीय उपमहाद्वीप की एक ऐसी भाषा बनी, जिसकी पत्रकारिता और साहित्य के बीच अंतर्संवाद बहुत गहरा था।
Author May 3, 2015 16:33 pm

हिंदी पत्रकारिता को यह गौरव प्राप्त है कि वह न सिर्फ इस देश की आजादी की लड़ाई का मूल स्वर रही, बल्कि उसने हिंदी को एक भाषा के रूप में रचने, बनाने और अनुशासनों में बांधने का काम भी किया। हिंदी भारतीय उपमहाद्वीप की एक ऐसी भाषा बनी, जिसकी पत्रकारिता और साहित्य के बीच अंतर्संवाद बहुत गहरा था। लेखकों-संपादकों की एक बड़ी परंपरा इसीलिए हमारे लिए गौरव का विषय रही है। हिंदी आज सूचना के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन को व्यक्त करने वाली भाषा बनी है, तो इसमें उसकी पत्रकारिता के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। हिंदी पत्रकारिता ने इस देश की धड़कनों को व्यक्त किया है, आंदोलनों को वाणी दी है और लोकमत निर्माण से लेकर लोकजागरण का काम भी बखूबी किया है।

आज की हिंदी पत्रकारिता पर आरोप लग रहे हैं कि वह अपने समय के सवालों से कट रही है। उन पर बौद्धिक विमर्श छेड़ना तो दूर, वह उन मुद्दों की वास्तविक तस्वीर सूचनात्मक ढंग से भी रखने में विफल हो रही है। सवाल उठने लगा है कि आखिर ऐसा क्यों है। 1990 के बाद के उदारीकरण के सालों में अखबारों का कलेवर सुदर्शन हुआ, छपाई शानदार हुई और प्रस्तुति बदली है। वे अब पढ़े जाने के साथ-साथ देखे जाने लायक भी बने हैं।

पर क्या कारण है कि उनकी पठनीयता बहुत प्रभावित हो रही है। वे अब पढ़े जाने के बजाय पलटे ज्यादा जा रहे हैं। क्या कारण है कि ज्वलंत सवालों पर बौद्धिकता और विमर्शों का सारा काम अब अंगरेजी अखबारों के भरोसे छोड़ दिया गया है? हिंदी अखबारों में अंगरेजी के जो लेखक अनूदित होकर छप रहे हैं, वे सेलिब्रिटी ज्यादा, बौद्धिक दुनिया के लोग कम हैं। कम पाठक, सीमित स्वीकार्यता के बावजूद अंगरेजी अखबारों में हमारी कलाओं, किताबों, फिल्मों और शेष दुनिया की हलचलों पर बात करने का वक्त है, तो हिंदी के अखबार इनसे मुंह क्यों चुरा रहे हैं।

हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक अशोक वाजपेयी अगर यह कहते हैं (कभी-कभार, 26 अप्रैल) कि- ‘‘पत्रकारिता में विचार अक्षमता बढ़ती जा रही है, जबकि उसमें यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। हिंदी में यह क्षरण हर स्तर पर देखा जा सकता है। हिंदी के अधिकांश अखबार और समाचार-पत्रिकाओं का भाषाबोध बहुत शिथिल और गैरजिम्मेदार हो चुका है। जो माध्यम अपनी भाषा की प्रामाणिकता आदि के प्रति सजग नहीं हैं, उनमें गहरा विचार भी संभव नहीं है। हमारी अधिकांश पत्रकारिता, जिसकी व्याप्ति अभूतपूर्व हो चली है, यह बात भूल ही गई है कि बिना साफ-सुथरी भाषा के साफ-सुथरा चिंतन भी संभव नहीं है।’’ तो जाहिर तौर पर उनकी और हिंदी समाज की चिंताएं साझा हैं।

हिंदी के पाठकों, लेखकों, संपादकों और समाचार-पत्र संचालकों को मिल कर अपनी भाषा और उसकी पत्रकारिता के सामने आ रहे संकटों पर बात करनी चाहिए। यह देखना रोचक है कि हिंदी पत्रकारिता के सामने आर्थिक संकट वैसा नहीं है जैसा भाषाई या बौद्धिक संकट। हमारे समाचार-पत्र अगर समाज में चल रही हलचलों, आंदोलनों और झंझावातों की अभिव्यक्ति करने में विफल हैं और वे बौद्धिक दुनिया में चल रहे विमर्शों का छींटा भी अपने पाठकों पर नहीं पड़ने दे रहे, तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमारी बड़ी जिम्मेदारी अपने पाठकों का रुचि परिष्कार करना भी रही है। साथ ही हमारा काम अपने पाठक का उसकी भाषा और समाज के साथ एक रिश्ता बनाना भी है।

कई बार ऐसा लगता है कि हिंदी के अखबार टीवी न्यूज चैनलों से होड़ कर रहे हैं। यह होड़ अखबार के सौंदर्यबोध, उसकी सुंदर प्रस्तुति तक सीमित हो तो ठीक, पर यह विषय-वस्तु के स्तर पर जाएगी तो खतरा बड़ा होगा। एक एफएम रेडियो के जॉकी और अखबार की भाषा में अंतर सिर्फ माध्यमों का अंतर नहीं है, बल्कि उस माध्यम की जरूरत भी है। इसलिए टीवी और रेडियो की भाषा से होड़ में हम अपनी मौलिकता को नष्ट न करें। हिंदी अखबारों के संपादकों का आत्मविश्वास शायद इस बाजारू हवा में हिल गया लगता है। वे हिंदी के प्रचारक और रखवाले जरूर हैं, पर इन सबने मिल कर जिस तरह आमफहम भाषा के नाम पर अंगरेजी के शब्दों को स्वीकृति दी है, वह आपराधिक है। यह स्वीकार्यता अब होड़ में बदल गई है। हिंदी पत्रकारिता में आई यह उदारता भाषा के मूल चरित्र को ही भ्रष्ट कर रही है।

यह चिंता भाषा की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की भी है, जिसे हमने बौद्धिक रूप से विकलांग बनाने की ठान रखी है। आखिर हिंदी अखबारों के पाठक को क्यों नहीं पता होना चाहिए कि उसके आसपास के परिवेश में क्या घट रहा है। हमारे पाठक के पास चीजों के होने और घटने की प्रक्रिया के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलुओं पर विश्लेषण क्यों नहीं होने चाहिए? क्यों वह गंभीर विमर्शों के लिए अंगरेजी या अन्य भाषाओं पर निर्भर हो? हिंदी क्या सिर्फ सूचना और मनोरंजन की भाषा बन कर रह जाएगी? अपने बौद्धिक विश्लेषणों, सार्थक विमर्शों के आधार पर नहीं, सिर्फ चमकदार कागज पर शानदार प्रस्तुति के चलते कोई पत्रकारिता लोकस्वीकृति पा सकती है? आज का पाठक समझदार, जागरूक और दूसरे विविध माध्यमों से सूचना और विश्लेषण पाने की क्षमता से लैस है। ऐसे में हिंदी अखबारों को यह सोचना होगा कि वे कब तक अपनी छपाई और प्रस्तुति के आधार पर लोगों की जरूरत बने रहेंगे।

एक समय अखबार सूचना के प्रमुख साधन थे, पर अब इसके लिए लोग अखबारों पर निर्भर नहीं हैं। लगभग हर सूचना पाठक को अन्य माध्यमों से मिल जाती है। इसलिए लोग सूचना के लिए अखबार पढ़ते रहेंगे, यह सोचना ठीक नहीं है। अखबारों को आखिरकार विषय-वस्तु पर लौटना होगा। गंभीर विश्लेषण और खबरों के पीछे छिपे अर्थ तलाश करने होंगे। हिंदी अखबारों को अब सूचना और मनोरंजन की खुराक के बजाय नए विकल्प देखने होंगे। उन विषयों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जिससे पाठक को घटना का परिप्रेक्ष्य पता चले। इसके लिए हमें सूचनाओं से आगे होना होगा।

हिंदी अखबारों को यह मान लेना चाहिए कि वे अब सूचनाओं के प्रथम प्रस्तोता नहीं हैं, बल्कि उनकी भूमिका सूचना पहुंच जाने के बाद की है। इसलिए घटना की सर्वांगीण और विशिष्ट प्रस्तुति ही उनकी पहचान बना सकती है। आज सारे अखबार एक सरीखे दिखने लगे हैं, उनमें भी विविधता की जरूरत है। हिंदी के अखबारों ने अपनी साप्ताहिक पत्रिकाओं को विविध विषयों पर केंद्रित कर एक बड़ा पाठक वर्ग खड़ा किया है। उन्हें अब साहित्यिक, बौद्धिक विमर्शों, संवादों, दुनिया में घट रहे परिवर्तनों पर नजर रखते हुए अपने को ज्यादा सुरुचिपूर्ण बनाना होगा। भारतीय भाषाओं, खासकर मराठी, बांग्ला और गुजराती में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, जहां सूचना के अलावा अन्य संदर्भ भी बराबरी से जगह पा रहे हैं।

एक बड़ी भाषा होने के नाते हिंदी से ज्यादा गंभीर प्रस्तुति और ठहराव की उम्मीद की जाती है। उसकी तुलना अंगरेजी के अखबारों से होगी और होती रहेगी, क्योंकि अंगरेजी के बौद्धिक आतंक को चुनौती देने की संभावना से हिंदी भरी-पूरी है। हिंदी के पास ज्यादा बड़ा फलक और जमीनी अनुभव हैं। अगर वह अपने लोक, देश की पहचान कर, अपने देश की वाणी को स्वर दे सके तो भारत का भारत से परिचय तो होगा ही, यह देश अपने संकटों के समाधान भी अपनी भाषा में पा सकेगा। क्या हिंदी पत्रकारिता, उसके अखबार, संपादक और प्रबंधक इसके लिए तैयार हैं?

संजय द्विवेदी

 

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