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मीडिया : अंकुश और आजादी

वीरेंद्र जैन सर्वोच्च न्यायालय के आइटी अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त करने के फैसले पर जो बहस सामने आई, उसमें अभिव्यक्ति को बहुत सीधे-सरल अर्थों में लिया गया है, जबकि हर अभिव्यक्ति उतनी निर्मल नहीं होती। बाल ठाकरे के निधन पर बाजार बंद कराने के अनुभव की अभिव्यक्ति और आजम खां के नाम […]
Author March 29, 2015 07:55 am

वीरेंद्र जैन

सर्वोच्च न्यायालय के आइटी अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त करने के फैसले पर जो बहस सामने आई, उसमें अभिव्यक्ति को बहुत सीधे-सरल अर्थों में लिया गया है, जबकि हर अभिव्यक्ति उतनी निर्मल नहीं होती। बाल ठाकरे के निधन पर बाजार बंद कराने के अनुभव की अभिव्यक्ति और आजम खां के नाम से किसी युवक की भड़काऊ अभिव्यक्ति को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता। दोनों मामलों में धारा 66 ए का प्रयोग हुआ है। इसलिए सवाल कानून की धारा से ज्यादा उसकी भावना को समझ कर, उसके अनुरूप उपयोग या दुरुपयोग करने का है।

प्रेमचंद ने आज से अस्सी साल पहले एक लेख में लिखा था कि सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद का मुखौटा लगा कर आती है। स्वार्थी तत्त्व समाज में मान्य आदर्शों की ओट लेकर समाज-विरोधी काम करते रहते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की आजादी की ओट में गलत बयानी करने, अफवाह फैलाने और चरित्र हनन करने का काम किया जा रहा है। जब इस विकृति की ओर अंगुली उठाई जाती है, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया जाने लगता है। अभिव्यक्ति की आजादी, झूठ बोलने की आजादी में बदलती जा रही है, जबकि आदर्श सच की अभिव्यक्ति और उसकी आजादी का है।

सोशल मीडिया में बेनामी अभिव्यक्ति की सुविधा होने से इसकी ओट में ढेर सारे लोकतंत्र-विरोधी काम किए जा रहे हैं। आखिर अभिव्यक्ति की ऐसी आजादी क्यों होनी चाहिए, जिसमें इस अधिकार का उपयोग करने वाले नागरिक की कोई पहचान न हो और उसके कथन की जिम्मेवारी लेने वाला कोई न हो। उसमें भी जब ऐसे अधिकतर कथन किसी व्यक्ति, समूह, आस्था, समाज हितैषी संस्थाओं या राजनीति विशेष को गलत आधार पर बदनाम करने और विद्वेष फैलाने के लिए व्यक्त किए जा रहे हों। उल्लेखनीय है कि ऐसी अभिव्यक्ति का दुरुपयोग 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में एक पार्टी विशेष के समर्थकों, एजेंटों द्वारा ध्रुवीकरण करने के लिए व्यापक रूप से किया गया था और अब उसकी सत्ता की रक्षा में किया जा रहा है।

किसी भी कानून का दुरुपयोग उस समाज का दुगुना नुकसान करता है, जिसके हित में यह कानून लाया गया होता है। इसलिए उस कानून को बनाने से अधिक उसका दुरुपयोग रोकना जरूरी होता है। समाज के निहित स्वार्थ जब उस अधिकार का सीधे-सीधे विरोध नहीं कर पाते तो उसे विकृत करने लगते हैं। दहेज-विरोधी कानून का ऐसा ही परिणाम हुआ है, जिनकी सुनवाई में विभिन्न अदालतों ने पाया है कि उनके सामने लाए गए ज्यादातर मामले पारिवारिक कलह या खराब दांपत्य संबंधों के होते हैं, जिन्हें इस तरह प्रस्तुत करके जनता के बीच इस कानून के प्रति नफरत पैदा की जा रही है। इस कानून से दहेज प्रथा रोकने में तो कोई प्रभावी मदद नहीं मिली है, पर इसके दुरुपयोग को देखते हुए अदालतों को आरोपियों के प्रति नरम होना पड़ा है। इन कमजोरियों के कारण बड़े अपराध की जनक झूठ बोलने की आजादी को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। मुजफ्फरनगर का उदाहरण सबसे ताजा है।

प्रेस की आजादी का सवाल भी ऐसा ही है। इस क्षेत्र में सच बोलने वाले पत्रकारों को हंसी का पात्र बनाया जाता है और वे हर तरह से पिछड़ते जा रहे हैं। हम आज जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हैं, वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा भ्रष्ट तंत्र है। अधिकतर मीडिया संस्थानों के मुखिया यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं करते कि अगर हम सच्ची पत्रकारिता करेंगे तो अखबार को ज्यादा दिन नहीं चला सकते। सरकारी विज्ञापन लेने के लिए बहुत सारे अखबार प्रसार संख्या के गलत आंकड़े देते हैं, पर विज्ञापन की दरें बदलवाने के लिए कोई सामूहिक अभियान नहीं चलाते।

आए दिन कोई न कोई नेता यह कहता नजर आता है कि उसके बयान को उसकी भावना के विपरीत आधा-अधूरा या तोड़-मरोड़ कर छापा गया है और कई मामलों में ऐसा होता भी है। अखबार के पास अपने विचार व्यक्त करने के लिए केवल संपादकीय पृष्ठ होता है, बाकी में उसे जैसा देखा या कहा गया है वैसा ही छापना चाहिए। मगर अफसोस कि हम जिस मीडिया की स्वतंत्रता की पक्षधरता करते हैं वह वैसा पवित्र रहा ही नहीं। इसका बड़ा हिस्सा किसी न किसी नेता, दल या कॉरपोरेट घराने का पिछलग्गू बन गया है और खबरें देने की जगह, खबरें बनाने, तोड़ने-मरोड़ने, बदलने, अफवाहें फैलाने के साथ-साथ खबरें दबाने का माध्यम बन गया है।

होना तो यह चाहिए कि हर गलत खबर का खंडन उसी जगह पर छापने की अनिवार्यता हो और जानबूझ कर गलत खबर देने के लिए जिम्मेवार हर व्यक्ति को रेखांकित किया जाए। भ्रष्टाचार और अपराध के हर बड़े भंडाफोड़ के साथ इस बात को भी याद किया जाना चाहिए कि उस क्षेत्र में इतने सूचना प्रतिनिधि काम करते रहे फिर भी इतने लंबे समय तक अपराध कैसे चलता रहा। पत्रकारों को जितना सम्मान मिलता और जितनी पूछ-परख होती है उसके अनुपात में वे सामाजिक जिम्मेवारी महसूस नहीं करते। प्रदेश की राजधानियों में आए दिन सीबीआइ, आयकर, लोकायुक्त, आर्थिक अपराध ब्यूरो आदि के छापे पड़ते हैं, जिनमें करोड़ों-अरबों रुपयों के दुरुपयोग सामने आते हैं, पर हजारों की संख्या में सरकारी सुविधाएं पाने वाले पत्रकारों में से कोई कभी ये मामले नहीं उठाता। कभी-कभार जब कोई ऐसा मामला आता भी है तो उसमें पत्रकारिता का कोई योगदान नहीं होता, बल्कि वह राजनीति या नौकरशाही की आपसी प्रतिद्वंद्विता में बाहर आई जानकारी का परिणाम होता है। इसमें पत्रकार का काम पोस्टमैन से अधिक नहीं होता। इनमें से कौन अभिव्यक्ति की आजादी चाहता है और इनकी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए कौन लड़ेगा!

इस नक्कारखाने में सच्ची अभिव्यक्ति का दम घुट रहा है, फिर भी हम उसके लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे। सोशल मीडिया केवल चहचहाहटों को दर्ज करने का माध्यम बन रहा है, पर इसमें जो गलत चल रहा है उस पर कोई अंकुश नहीं है। इस कारण उससे बड़ी उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए।

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