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अभिमत : आम आवाज की ताकत

शंभुनाथ ‘रंगभूमि’ (1925) का अंधा सूरदास उजबक-सा दिखता है, पर पहला आम आदमी है जो अपनी जमीन बचाने के लिए निर्दय औद्योगिक विकास और राजनीतिक छल-छद्म से बहादुरी के साथ लड़ता है। उसके पास एक भीतरी आंख है, जो इतिहास, राजनीति और औपनिवेशिक बौद्धिकता से ऊपर उठ कर देखती है। वह परिघटनाओं के बीच इस […]
Author March 1, 2015 16:43 pm

शंभुनाथ

‘रंगभूमि’ (1925) का अंधा सूरदास उजबक-सा दिखता है, पर पहला आम आदमी है जो अपनी जमीन बचाने के लिए निर्दय औद्योगिक विकास और राजनीतिक छल-छद्म से बहादुरी के साथ लड़ता है। उसके पास एक भीतरी आंख है, जो इतिहास, राजनीति और औपनिवेशिक बौद्धिकता से ऊपर उठ कर देखती है। वह परिघटनाओं के बीच इस तरह हस्तक्षेप करता है कि प्रेमचंद के इस उपन्यास में बाकी सभी चरित्र फीके पड़ जाते हैं। वह साहित्य में नायक-चरित्र के रूप में तब आया था, जब राजनीतिक आंदोलन ठहराव पर था। क्या आज का आम आदमी और नागरिक समाज उसका नया अवतार है? क्या नया उभार सत्ता-विमर्शों के बीच आम आवाज की वापसी है?

वर्ष 1989 में अमिताभ बच्चन की एक फिल्म आई थी ‘मैं आजाद हूं’। इसमें नायक सवाल करता है कि आजादी के इतने सालों बाद भी आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान मयस्सर क्यों नहीं हुआ। उसके गले में मफलर था! वह अहसास कराता है कि हम मामूली हो सकते हैं, लेकिन हम अपने को सबसे अधिक ताकतवर साबित कर सकते हैं। इस फिल्म में कैफी आजमी का गीत है, ‘इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से। हारेगा वह हर बाजी जब खेलें हम जी-जान से।’ ‘महान भारतीय मध्यवर्ग’ का दिग्दर्शन कराते हुए पिछले दिनों उसकी खुदगर्जी, ढुलमुलप*न और धूर्तता के बिंब बनाए जा रहे थे और दिखाया जा रहा था कि हर तरफ स्मृति-ध्वंस और स्वप्नहीनता है और यह सब खतरनाक है। इसी समय ‘उजबक आम आदमी’ ने बता दिया कि वह ‘महान भारतीय मध्यवर्ग’ की अवधारणा का बंदी या ‘राजनीतिक बंदी’ बना कर ज्यादा देर तक नहीं रखा जा सकता। उसे न स्मृतिहीन किया जा सकता है और न स्वप्नहीन। वह नरक से भी स्वप्न देख सकता है।

आम जनता बौद्धिक तौर पर राजनीतिक बंदीगृह से मुक्त हो रही है, यह बात राजनीतिक दलों को चिंता में डाल सकती है। आम आदमी में सदा एक ‘भीतरी आंख’ रही है। भारत अपनी इस भीतरी आंख की वजह से ही बचा हुआ है जो विविधता, विकास और हर राजनीति को अपने पैमाने से देखती है। हम देख सकते हैं कि गरीबों और वंचितों के लिए आंदोलन खड़ा करने वाले नागरिक संगठन जाति, धर्म और ऐसी दूसरी संकीर्णताओं से ऊपर उठ कर एक व्यापक सार्वजनिक जगह बनाते हैं। यह मामूली बात नहीं है कि दिल्ली के चुनाव में शाही इमाम ने जिसके पक्ष में फतवा जारी किया था, उसी ने उसे ठुकरा दिया। ऐसा साहस पहली बार सामने आया। हमारे समाज में आज भी ‘कॉमन प्लेस’ का फिलहाल अभाव है, क्योंकि पुरानी राजनीति की रूढ़ियां धार्मिक रूढ़ियों की तरह ही मजबूत हैं। निश्चय ही ‘आम आदमी’ या ‘नागरिक’ शब्द मानव भाव पैदा करता है। वह एक ऐसी आवाज है, जिसमें राजनीति के पुनर्मानवीयकरण की आवाज भी शामिल है।

आज आम आदमी की आवाज दमनकारी आर्थिक सुधारों, कट्टरवादी हिंसक अभियानों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध है। इसलिए राजनीतिक उजबकों और बौड़मों से सफेदपोश धूर्त परेशान हैं। अब मुश्किल हो उठेगा देश को अंधाधुंध तरीके से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करना और मीडिया प्रबंधन के बल पर लोकमानस को देर तक नियंत्रित रखना। व्यापारियों को असीमित मुनाफा पहुंचाने वाले वैश्वीकरण के पैरोकार तर्क देंगे कि आर्थिक सुधार का पहिया राजनीति के कीचड़ में फंस गया है। प्रधानमंत्री भारी दबाव में होंगे, जबर्दस्ती भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का क्या करें। किसानों ने इसके खिलाफ आंदोलन खड़ा करके अंधाधुंध आर्थिक सुधारों का रास्ता रोक दिया है। ये आम आदमी बड़े उजड्ड और मत वाले हैं, भारत को अमेरिका बनने नहीं दे रहे हैं।

दूसरों को दोष देने की जगह पश्चिम के पिट्ठू अर्थविद क्यों नहीं सोचते कि वैश्वीकरण ने किस तरह पूरी दुनिया की आधी संपत्ति- साढ़े तीन अरब लोगों के बराबर संपत्ति- को दुनिया के महज अस्सी व्यक्तियों की मुट््ठी में बंद कर दिया है (आक्सफेम)। इस तरफ नजर क्यों नहीं जाती कि समाज में बढ़ती विषमता भी आर्थिक वृद्धि को प्रभावित करती है और भ्रष्टाचार उसे लगातार खोखला करता है। इसलिए ‘मानवीय चेहरा’, ‘रोजगार गारंटी’ या ‘स्वच्छता अभियान’ के ढोंगों से काम नहीं चलेगा। बिल गेट्स भारत में टायलेट बनाएं, यह ढोंग ही है। वस्तुत: बढ़ती विषमता और भ्रष्टाचार दोनों मोर्चों पर सावधान होने की जरूरत है।

उजबक आम आदमी सामुदायिक कट्टरता छोड़ कर तेजी से ‘कॉमन प्लेस’ बनाने लगे हैं। फिर सफेद को काले से, ईमानदारी को बेईमानी से और न्याय को अन्याय से अलग करना संभव हो रहा है। यही वजह है कि आम लोगों को ‘चायवाले’ और दस लाख का कीमती सूट पहनने वाले के बीच फर्क नजर आया।

यह सही है कि आंदोलन एक चीज है और प्रशासन दूसरी चीज। अतीत में इसके कई उदाहरण हैं कि आंदोलन से प्रशासन में आए नेता भी कीचड़ में धंस गए। निश्चय ही भावावेग से प्रशासन नहीं चल सकता। फिर भी, पिछले कुछ समय से राजनीति कितनी अमानवीय चीज हो गई थी इससे कोई अनजान नहीं है। यह जैसे महज भ्रष्टाचार, सामुदायिक संकीर्णता या अहं की होड़ हो। राजनीति एक ऐसी हिंसक प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन गई थी, जिसका असर लोकतंत्र के बुनियादी चरित्र पर पड़ रहा था। कला-साहित्य, शिक्षा, परिवार और आम दोस्ती भी राजनीतिक दुनिया की उस हिंसक प्रतिद्वंद्विता से बुरी तरह प्रभावित थी। इसलिए राजनीति में मानव भाव और इसके आवेगों की जरूरत है।

हाल में जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल का सौजन्यवश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलना या मोदी का मुलायम सिंह-लालू प्रसाद यादव के निमंत्रण पर तिलक समारोह में उपस्थिति सराहनीय है। यह कितनी राजनीतिक बाजीगरी है और कितनी सच्ची-टिकाऊ है, कहना मुश्किल है। लेकिन स्पष्ट है कि ऐसी चीजों पर उस ‘उजबक आम आदमी’ का भारी दबाव है, जो प्रेमचंद के सूरदास या लक्ष्मण के कार्टून के ‘कॉमन मैन’ की तरह दुर्बल, एक हड््डी का आदमी समझा जाता है।

आम आदमी के हस्तक्षेप का असर कितना क्षणभंगुर है और राजनीति पर कितना गहरा असर डालने वाला, यह लोकतंत्र की नई बुनियाद है या उसका दुश्मन, इस पर बहस हो सकती है। कई बार कहा जाता है भ्रष्टाचार, पर्यावरण, जमीन अधिग्रहण आदि मुद््दों पर होने वाले जन आंदोलन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अपने अंतर्विरोध के नतीजे हैं, रोजगार-विरोधी हैं और देश को पिछड़ा रखने की साजिशें हैं। एनजीओ की बढ़ी सामाजिक भूमिका पर चिंता व्यक्त करते हुए आरोप लगाया जाता है कि ऐसे संगठन पहले गरीबों का मसीहा बन कर विद्रोह भरी बातें करते हैं, शासन पर दबाव बनाते हैं, फिर व्यवस्था का अंग बन कर खूब खाते-पीते हैं। अमेरिका की मशहूर सोशलाइट नाओमी कैंपबेल ने पशु अधिकारों के लिए कभी नग्न होकर प्रदर्शन किया था, ‘फर के कपड़े पहनने से अच्छा है हम नंगे रहें।’ 2014 की क्रिसमस में वे फर के कपड़े में ही नजर आर्इं!

निश्चय ही भारत में भी कई एनजीओ सिर्फ लूटने-खाने और दिखावे के लिए बने हैं। पर सच्चे ढंग से काम करने वाले और मानव अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग भी निस्संदेह हैं। दरअसल, गैर-सरकारी संगठन- यह निषेधवाची नाम ही दोषपूर्ण है। कॉरपोरेट घरानों द्वारा दिए गए इस नाम से पहली बार यही ध्वनित होता है कि ये कॉरपोरेट घरानों और सरकार से पैसा लेने के लिए बने हैं और उन्हीं के एजेंट हैं।

आम आदमी के भय और आक्रोश, प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों की चिंताओं और नागरिक संगठनों के दीर्घ आंदोलनों को दिखावटी एनजीओ संस्कृति का अंग मानना ठीक नहीं है। आज के दमघोंटू वातावरण में जहां-तहां छोटी-छोटी लहरों जैसे जन-आलोड़न जीवित समाज के लक्षण हैं। ये कट्टरवादी माहौल में मानव भाव के संरक्षक हैं। सच्ची राजनीति के लिए थोड़ा कम राजनीतिक होना जरूरी है, जबकि पिछले कुछ समय से राजनीतिक और न्यायप्रिय होना विरोधी विषय हो गए हैं- राजनीति महज लफ्फाजी में सीमित हो गई है। इधर की हलचलों से स्थिति ज्यादा नहीं बदली है। फिर भी संभव है नए जन-आलोड़नों की वजह से खुद राजनीति का पानी थोड़ा बदले। इसकी ‘भीतरी आंख’ खुले, जो देश के नए भविष्य के लिए जरूरी है।

 

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