ताज़ा खबर
 

प्रसंग : मजहबी दीवारें

शंभुनाथ फ्रांसीसी यात्री बर्नियर 1656 में भारत आया था। उसने पुरी की उस जमाने की रथयात्रा का वर्णन करते हुए लिखा है, ‘जिस समय भगवान जगन्नाथ का रथ गड़गड़ाता हुआ चलता है, कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जो उस समय धार्मिक उन्माद में रथ के भारी पहियों के आगे गिर कर जान दे देते हैं। […]
Author November 30, 2014 12:35 pm

शंभुनाथ

फ्रांसीसी यात्री बर्नियर 1656 में भारत आया था। उसने पुरी की उस जमाने की रथयात्रा का वर्णन करते हुए लिखा है, ‘जिस समय भगवान जगन्नाथ का रथ गड़गड़ाता हुआ चलता है, कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जो उस समय धार्मिक उन्माद में रथ के भारी पहियों के आगे गिर कर जान दे देते हैं। रथ पर सवार पुरोहित अपने स्वार्थों से ऐसे काम के लिए लगातार उकसाते रहते हैं।’ गुजरात के आशाराम बापू, हरियाणा के गुरमीत राम रहीम सिंह (डेरा सच्चा सौदा) और रामपाल नए ढंग के धर्मगुरु हैं, जिनके भक्त पिछले दिनों धार्मिक पागलपन और अंधविश्वास के रास्ते पर रक्त तक बहाने के लिए तैयार दिखे। हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी राज्यों में ऐसे कई धर्मगुरु हैं और उनके भक्तों की संख्या अपार है। उनके भक्तों में ज्यादातर दलित और पिछड़ी जातियों के लोग हैं। ये इतने मोहाविष्ट हैं कि अपने धर्मगुरु को सच्चा मानते हुए उनकी गिरफ्तारी के लिए आए पुलिस दस्ते से मुठभेड़ करते हैं और जान देने तक से नहीं हिचकते।

कई सवाल उठते हैं। पिछले दशकों की दलित राजनीति ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए इन भोले लोगों को धर्मगुरुओं के जाल में क्यों फंसने दिया, इन्होंने ब्राह्मणवाद-विरोध के साथ बुद्धिवाद के आधार पर सांस्कृतिक सुधार आंदोलन क्यों नहीं चलाया? कबीर का नाम लेकर कोई इतनी ठगी करे, आत्मकथा लिखने वाले दलित लेखकों की दृष्टि ऐसी बुराइयों की ओर क्यों नहीं गई?

धर्मगुरुओं और स्वघोषित भगवानों ने पिछले बीस-पच्चीस सालों में ज्यादा लोकप्रियता और ताकत हासिल की है। विज्ञान, वैश्वीकरण और आर्थिक वृद्धि के जमाने में अंधविश्वास फैलाने वाले धर्मगुरुओं का जनसमर्थन बढ़ा है। यह कैसा उदारीकरण है कि विकास और अंधविश्वास के बीच इतना गहरा रिश्ता बना? हिंदुत्ववादियों से भी सवाल है, वेद और राम की दुहाई देने वालों ने धर्म की स्वच्छता के लिए कौन-सा अभियान छेड़ा? आमतौर पर उनकी ऐसे धर्मगुरुओं के प्रति कृपा है या अकृपा? क्या ‘भारत की स्वच्छता’ धर्म और मनुष्य की आंतरिक स्वच्छता के बिना संभव है? इससे सिर्फ डिजाइनर झाड़ू की बिक्री बढ़ेगी, साफ कुछ न होगा।

हम जानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं का भोंपू है। इसके चौबीसों घंटे के चैनेल हैं। पिछले दशकों में प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक, नौकरशाह जैसे तबकों से व्यक्ति अपना काम छोड़ कर महत्त्वाकांक्षावश धर्मगुरु बने हैं। दलित जातियों से भी धर्मगुरु हैं। अब धर्म के उद्योग चल रहे हैं, जिन्हें भरपूर राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है।

एक तरफ अंधविश्वास फैलाने वाले धर्मगुरुओं के हाथ में बड़ी पूंजी, टेक्नोलॉजी, प्रबंधक और एक माफिया है। दूसरी तरफ जो बुद्धिवादी हैं, वे लगभग अकेले हैं, उनके हाथ में रथ का सिर्फ टूटा पहिया है। धार्मिक उन्माद और अंधविश्वास को रोकने वाली कोई लोकताकत नहीं है।

दलितों और पिछड़ों के जो धर्मगुरु हैं, वे अपने को चमत्कारी भगवान के रूप में पेश करते हैं। संपन्न वर्गों के लिए वैभवशाली योग गुरु हैं या झक-झक कपड़ों में जीने की नई कला सिखाने वाले आध्यात्मिक गुरुओं का बाजार है। दलितों और गरीबों के धर्मगुरु उनके भय और निराशा का शोषण करते हैं। संपन्न वर्ग के लोगों के धर्मगुरु उनके तनाव का शोषण करते हैं। वे भौतिक विलासिता और आध्यात्मिकता, नदी के दोनों तटों पर एक साथ चलने का प्रशिक्षण देते हैं, ताकि लोग अध्यात्म पिएं- मस्त जिएं। आध्यात्मिक गुरु व्यापक व्यावसायिक पहुंच के लिए धार्मिक उन्माद, नस्लवाद और अंध-राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं, पर धर्म को महज तनाव रोधक आध्यात्मिक कैप्सूल में सीमित कर देते हैं।

दोनों तरह के धर्मगुरु स्पर्धा के बावजूद आपस में कभी एक-दूसरे की आलोचना नहीं करते। दोनों का रिश्ता न सादगी, ईमानदारी, परहित जैसे उच्च भारतीय मूल्यों से है, न भक्ति आंदोलन के महान कवियों से और न नवजागरण के सुधार आंदोलनों से। वे ईश्वर का आतंकवाद हैं।

आज जो व्यक्ति अति-भौतिकवाद से तंग आकर अध्यात्म की ओर बढ़ते हैं, उनके लिए धर्माचरण जरा भी महत्त्वपूर्ण नहीं है। वे अध्यात्म को उपभोग की वस्तु के रूप में देखते हैं। उनके बुरे आचरण में कोई फर्क नहीं आता। उनका अध्यात्म ‘मूल्यविमुख अध्यात्म’ या ‘रूपवादी अध्यात्म’ है। ऐसे अध्यात्म पर डॉलरों की भारी बरसात होती है।

हम अति-आधुनिक दुनिया में धर्म की शरण में अचानक आते अंगरेजी-दां लोगों को देख कर विस्मित हो सकते हैं। सबने देखा है कि अमिताभ बच्चन अति-आधुनिक विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय के मंगली होने के कारण पहले उसका विवाह पीपल के पेड़ से कराते हैं, बाद में बेटे से। अपनी जिंदगी का आधे से ज्यादा समय अमेरिका में बिताने वाले शशि थरूर दुबई में व्यापार करने वाली महिला सुनंदा पुष्कर से विवाह के वक्त अचानक धोती-कुर्ता पहन लेते हैं, केरल का मंगलवाद्य बजवाते हैं और रहस्यमय स्थितियों में पत्नी के मरने पर धार्मिक विधि से उसका अस्थिकलश पवित्र गंगा में ले जाते हैं। आज भी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा उच्च तकनीक से बना अरबों का राकेट लांच करने से पहले इसकी प्रतिकृति को तिरुपति मंदिर ले जाकर बालाजी से स्पर्श कराया जाता है। राजनीतिक पार्टियों के हिंदू नेताओं का इफ्तार पार्टियों में जाना और मुसलिम धर्मगुरुओं का चुनाव के समय फतवा जारी करना जग जाहिर मामले हैं। दरअसल, सिलेब्रिटी खुद धार्मिक अंधविश्वास के लिए वह खाद-पानी देते हैं, जिनमें धर्मगुरुओं की फसल लहलहाती है।

भारत एक धार्मिक देश है, यह अपने में कोई बुरी बात नहीं है। बुराई की जययात्रा तब शुरू होती है, जब धर्म पर निर्बुद्धिपरक धर्मसत्ता काबिज हो जाती है। क्या व्यावसायिक और राजनीतिक पहलुओं से स्वतंत्र धर्म की कल्पना अब नहीं की जा सकती? क्या आज भय और लोभ के बाहर धर्म की जड़ें कहीं हैं? क्या धर्मबहुल भारत में कभी शांति और स्वतंत्रता संभव नहीं है? क्या धर्म के सामूहिक पक्ष के साथ एक वैयक्तिक पक्ष नहीं हो सकता? जब भी समलंैगिकता, विवाहमुक्त सह-जीवन, जाति और धर्म की सीमारेखाएं तोड़ कर प्रेम का सवाल उठता है, धर्म की भुजाएं फड़कने लगती हैं। प्रेम करने वाले युवक-युवतियों पर हमले होते हैं। धर्म के इतने बड़े-बड़े पाखंडी व्यापारी हैं। धर्मध्वजधारी इन सबका पदार्फाश करने के लिए सामने नहीं आते। वे चुप रहते हैं। कोई बड़ा धर्मगुरु अपराध करने पर पुलिस वैन में गिरफ्तार होकर जा रहा होता है, तब किसी धर्मध्वजधारी का एक छोटा-सा बयान भी नहीं आता। वे जैसे मौन मातम मना रहे हों।

‘गंगावतरण’ लिखने वाले संस्कृत के विद्वान पंडितराज जगन्नाथ का मन एक मुसलिम युवती लवंगी पर आ गया। उन्होंने दाराशिकोह से उस युवती को मांग लिया। कहा, हाथी-घोड़े, धनदौलत नहीं चाहिए ‘न याचे गंजालि’! उन्हें लवंगी चाहिए। यह पंडितराज जगन्नाथ का लव जेहाद था। मुसलिम युवती से संस्कृत के इस उद्भट विद्वान के शादी करने पर काशी के किसी पंडित को उनसे टकराने का साहस नहीं हुआ था!

इक्कीसवीं सदी में धार्मिक व्यवस्था का भारी पतन हुआ है। अब धर्म की जगह धार्मिक झुंड हैं, मजहबी दीवारें हैं। धर्म के अच्छे तत्त्व सामाजिक चेतना से खदेड़ दिए गए हैं। मोबाइल का लेटेस्ट मॉडल हाथ में रखने वाला भी धार्मिक मामले में पुरातन कूपमंडूक जैसा है। आज का मनुष्य अगर विडंबनाओं से घिरा है, तो इसकी बड़ी वजह है कि वह दरअसल धर्म और विज्ञान दोनों से विच्छिन्न है, परंपरा और आधुनिकता दोनों से कटा हुआ है। वह नई से नई उपभोक्ता वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहा है, पर पुराने से पुराने कर्मकांड में फंसता जा रहा है। इस व्यवस्था में धर्म से सबसे ज्यादा पिट रहे हैं दलित, पिछड़े और गरीब लोग। जहां इतने सारे भक्त हों, रामपालों के लिए कुछ का रक्त तो बहना ही चाहिए। उनको बचाने के लिए हजारों भक्त इकट््ठे थे और छह लोग मरे थे!

एक समय था, जब राजनीति में राजनीति का अर्थ पैदा किया जा रहा था, संस्कृति में संस्कृति का अर्थ पैदा किया जा रहा था, धर्म में धर्म का और मनुष्य में मनुष्य का अर्थ पैदा किया जा रहा था। हमने क्या किया? उन अर्थों को उजाड़ दिया। राजनीति से राजनीति के अर्थ को, संस्कृति से संस्कृति के अर्थ को, धर्म से धर्म को उजाड़ फेंका और मनुष्य से मनुष्य को उजाड़ा, सिर्फ उजाड़ा। क्या अर्थ का पुनर्वास संभव है, कैसे होगा?

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. R
    raj
    Nov 30, 2014 at 11:15 pm
    80000 हज़ार लोगों ने एक बार कहने पर अपना खून दान किया एक साथ , और भारत की तीनो सेनाओं और हरियाणा पुलिस और देश के हजारो हस्पतालों के लिए हर महीने 5 से 6 हज़ार खून हर महीने दिया जाता है। एक साथ पुरे भारत और विदेशो में 15 अगस्त को 70 लाख पौधे लगाये जाने का रिकॉर्ड वो भी 70% success रेट के साथ, और हर 15 अगस्त को गुरु जी जन्म दिन पर हर साल 50 लाख से ज्यादा पौधे हर साल लगाये जाते हैं
    (0)(0)
    Reply
    1. R
      raj
      Nov 30, 2014 at 11:16 pm
      कोई भी आपदा आये चाहे गुजात का भूकम्प हो, उतराखंड की बाढ़ हो, कश्मीर की बाढ़ हो, दिल्ली की ललिता बिल्डिंग गिरी हो, आसाम का भू स्खलन हो, लेह लदाख म बादल फटा हो, बिहार की बाढ़ हो, अंडमान में सेना के 10 और डेरा के 21 मेम्बर पहुंचे, कोई भी ऐसी जगह हो जहां सेंकडो ट्रक राहत सामग्री और हज़ारो लोग डेरा से मदद के लिए न गएँ हो, ऐसा कोई मौका हुआ ही नहीं।
      (0)(0)
      Reply
      1. R
        raj
        Nov 30, 2014 at 11:13 pm
        शम्भुनाथ जी इतना बड़ा लेख लिख देने से आप महान और ज्ञानी लेखक नहीं बन गए, आपने रामपाल के बहाने डेरा सच्चा सौदा का नाम बिना मतलब जोड़ दिया, की पिछले दिनों इनके भक्त खून बहाने में व्यस्त रहे, तो पहले आप अपने तथ्य स्पष्ठ कीजिये। जिस डेरा सच्चा सौदा के बारे में आप बोल रहे हैं उनकी उप्लब्धियां मैं आपको बताता हूँ... 1. आज तक इतिहास में किसी की हिम्मत नहीं हुई जो ओं को शुभ देवी का नाम देके उनकी शादियाँ करवाके उनकी जिन्दगी बदल दे, और न ही किसी के कहने से कोई तैयार होता है।
        (0)(0)
        Reply
        1. R
          raj
          Nov 30, 2014 at 11:16 pm
          है किसी धार्मिक संस्था ने जिसने transgender को मुख्य धारा में लाने के लिए उनकी हर तरह की आर्थिक ायता की हो, उन्हें सुप्रीम कोर्ट से 3rd gender का दर्जा दिलवाया हो, उन्हें सुख दुआ समाज जैसा सम्मानित नाम दिया हो ।
          (0)(0)
          Reply
          1. R
            raj
            Nov 30, 2014 at 11:14 pm
            २. किसी में है हिम्मत जो 55000 लोगों को जीते जी गुर्दा दान करने के लिए प्रेरित कर दे, जिनमे हिन्दू और मुस्लिम भी हैं, और काफी तादाद में सिख भी हैं, हजारों दे भी चुके हैं । ३. है किसी में हिम्मत जिसके एक बार कहने पर, 5 लाख लोग हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश से मुंबई साफ़ करने के लिए चल पड़े । और ना जाने कितने जन टिक्ट न मिलने की वजह से जा नहीं पाए। जिनमे मैं भी एक था ।
            (0)(0)
            Reply
            1. R
              raj
              Nov 30, 2014 at 11:15 pm
              ४. आज तक 28 शहरो में 28 सफाई अभियान किये पिछले 3 सालों में, हर जगह 5 से 6 लाख लोगो ने पहुँच कर पुरे शहर को 5 से 6 घंटो में साफ़ कर दिया, जिनमे दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अजमेर, हरिद्वार, ऋषिकेश, पुष्कर, कोटा, गुडगाँव, फरीदाबाद, नॉएडा, रोहतक, होशंगाबाद जैसे जैसे बड़े बड़े शहर शामिल थे। सफाई भी ऐसी की सालों से बंद पड़े सीवर और नालों को खोल डाला। है किसी में इतनी हिमात कोई करके दिखाए।
              (0)(0)
              Reply
              1. Load More Comments
              सबरंग