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पुस्तकायन : मिथक में वर्तमान के रंग

रीतारानी पालीवाल सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक, नाटककार नंदकिशोर आचार्य के संपूर्ण नाटकों का संग्रह है रंग-यात्रा। लगभग तीन दशक की इस रंग-यात्रा में उन्होंने इतिहास, पुराकथा, मिथक और वर्तमान की जांच-पड़ताल और उसकी पुनर्व्याख्या की है। सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श करते हुए उन्होंने राजनीति के कुचक्रों को उजागर किया है, वहीं मानवीय मनोविज्ञान की गुत्थियों और विसंगतियों को […]
Author November 30, 2014 12:08 pm

रीतारानी पालीवाल

सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक, नाटककार नंदकिशोर आचार्य के संपूर्ण नाटकों का संग्रह है रंग-यात्रा। लगभग तीन दशक की इस रंग-यात्रा में उन्होंने इतिहास, पुराकथा, मिथक और वर्तमान की जांच-पड़ताल और उसकी पुनर्व्याख्या की है। सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श करते हुए उन्होंने राजनीति के कुचक्रों को उजागर किया है, वहीं मानवीय मनोविज्ञान की गुत्थियों और विसंगतियों को उकेरा है। संग्रह में नौ नाटक संकलित हैं।

पहला नाटक ‘देहांतर’ चक्रवर्ती राजा ययाति द्वारा अपने पुत्र पुरू का यौवन दान लिए जाने की मिथकीय पौराणिक कथा पर केंद्रित है। मिथक के भीतर निहित जटिलताओं और विसंगतियों को यह नाटक नए प्रश्नों के माध्यम से उठाता है। आत्मकेंद्रित चक्रवर्ती ययाति तो पुत्र का यौवन पा अपने आप में संतुष्ट है, पर शर्मिष्ठा की संवेदनात्मक विडंबना यह है कि ययाति से उसका संबंध पति-पत्नी का हो या मां-बेटे का। नाटक के अंत में जब ययाति को अपने आत्म-सीमित होने का बोध होता है और वह पुरू को उसका यौवन वापस करना चाहता है तो पुरू की समस्या है कि पिता जिस यौवन को भोग चुका है वह अब पुत्र के लिए त्याज्य है- ‘यह यौवन अब वही नहीं है।… यौवन कोई वस्त्र नहीं है, एक अनुभव है, मेरे लिए अब वह अनुभव एक स्मृति होगा- एक असहनीय स्मृति मेरी चेतना इस अनुभव को नहीं झेल पाएगी- टूट जाएगी।’

दूसरे नाटक ‘किमिदम् यक्षम्’ प्राचीन न होकर वर्तमान समय का प्रतीत होता है। पर इसमें भी कथावस्तु का आधार ब्रह्मा द्वारा अपनी पुत्री सरस्वती से संभोग का मिथक है। नाटक की जटिल संरचना में यथार्थ, फैंटेसी, लोक-विश्वास, यौन कुंठाएं, बौद्धिक व्यक्ति की प्रश्नाकुलता, विक्षोभ और विसंगति परस्पर गुंथे हुए हैं। मंदिर के खंडहरों के रहस्य खोज लेने को व्याकुल पुरातत्त्व के प्रोफेसर की खुद अपने अतीत के विषय में अपने पिता के विषय में जानने की बेचैनी नाटक में कई तरह की गुत्थियां पैदा करती है। फ्लैश बैक का सहारा लेते हुए अतीत की गुत्थी के सूत्र तलाशे गए हैं। पर यथार्थ से साक्षात्कार असह्य पीड़ादायक सिद्ध होता है। कुंठाओं और उलझनों के बीच अतीत के उद्दंड यौन व्यवहार की वर्तमान में पुनरावृत्ति विसंगतियों का नया गुंजलक पैदा करती है। नाटक में फैंटेसी और यथार्थ, अतीत और वर्तमान परस्पर गुंथे हैं। इसलिए हर स्थिति, हर घटना प्रतीक बन कर पाठक के चित्त में एक खास तरह की बेचैनी पैदा करती है।

‘हस्तिनापुर’ महाभारत की कथा पर आधारित एक नया काल्पनिक प्रसंग है, जिसके माध्यम से महाभारत के चरित्रों को नया अर्थ देने की कोशिश की गई है- विशेष रूप से कुछेक स्त्री पात्रों की त्रासदी और भीष्म की विराटता और महानता को। शास्त्र-सम्मत नियोग व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर करते हुए उसमें स्त्री द्वारा वरण की स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया गया है। अंबिका, विदुर की मां शुभा जैसे महाभारत के लगभग मूक पात्रों को वाणी दी गई है। इसके साथ ही भीष्म के व्यक्तित्व के उन अंतर्विरोधों को उभारा गया है, जो परंपरा में उनके महिमावान रूप के पीछे छिपे रहे हैं। आजन्म, ब्रह्मचारी बने रहने के उनके ‘आत्मबिंब’ पर प्रश्न उठाते हुए यह नाटक उन्हें ही महाभारत के लिए पूर्णतया जिम्मेदार ठहराता है।

‘जूते’ पहले तीन नाटकों से अलग हट कर सामान्य आदमी के जीवन से संबंधित है। हालांकि इसकी सेटिंग भी इतिहास के उस परिवेश में है, जब गुलामों का व्यापार होता था और न्याय-व्यवस्था धर्मगुरुओं और काजी की जुबान में बसती थी। सौदागर कासिम अपने फटे जूतों को अपनी बुद्धिमत्ता से हासिल किया गया अपना मुकद्दर समझता है, क्योंकि वे उसकी गुलामी के अतीत और गुलामी से मुक्त होने की यादगार हैं। घर-बाहर सबको जूतों पर हंसता देख जब-जब कासिम उन जूतों से छुटकारा पाने की कोई युक्ति निकालता है, तब-तब जूते उसे नई मुसीबत में डाल देते हैं। इस तरह जूते अतीत का प्रतीक बन जाते हैं, जो कभी व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ता।

‘जिल्ले सुब्हानी’ खिलजी वंश के पतन और तुगलक सल्तनत की स्थापना के समय के इतिहास पर आधारित ऐतिहासिक नाटक है। यह सत्तारूढ़ पक्ष की नृशंसता, बर्बर क्रूरता और अय्याशी प्रस्तुत करता है। जनता की जरूरतों से पूरी तरह निरपेक्ष शासक वर्ग को स्वार्थ-लिप्सा ग्रस्त उमरावर्ग- जिसमें दरबारी बौद्धिक वर्ग के प्रतिनिधि आइनलमल्क भी शामिल है- पूरा सहयोग प्राप्त है। शिष्टता, मर्यादा और उसूलों को तार-तार करता निरंकुश शासक वर्ग जनता को ‘हुकूमत के कुत्ते’ मानता है। नैतिकता और मर्यादा को कथ्य, कार्यकलाप, भाषा हर स्तर पर ध्वंस करने वाला यह नाटक विसंगतियों और विडंबनाओं को नए रूप में प्रस्तुत करता है।

‘गुलाम बादशाह’ बलबन के अंतिम दिनों के अंतर्द्वंद्व पर केंद्रित-ऐतिहासिक नाटक है। सत्ता की निरंकुशता, स्वार्थ लिप्सा और बेरहमी यहां भी घटनाओं के केंद्र में है। सुल्तान बन जाने के बावजूद बलबन अपनी गुलामी के इतिहास से मुक्त नहीं हो पाता। बदले की भावना उसे और ज्यादा आत्म-सीमित और क्रूर बना देती है। बलबन की विडंबना यह है कि न केवल आवाम, बल्कि उसके बेटे-बेटी भी उसके इस व्यवहार से नफरत करते हैं। सत्ता पर परिवारवाद का वर्चस्व, उसके भीतर की गुटबंदी, रक्त-रंजित राजनीति, भुला दिए गए पूर्व नायक इतिहास की ही नहीं, समकालीन समय की विडंबनाएं हैं।
‘किसी दूसरे का सपना’ में नाटक के रिहर्सल को कथ्य बनाते हुए समसामयिक स्थितियों पर व्यंग्य किया गया है। फैंटेसी का आधार लेते हुए पांच रंगकर्मी पात्र रखे गए हैं। जिनमें से चार मिल कर एक व्यक्ति से अपनी मर्जी की भूमिका कराना चाहते हैं। जब वह उनके मुताबिक अभिनय नहीं कर पाता तो जोर-जबरदस्ती करते हैं, त्रास देते हैं। पर वह व्यक्ति उनकी असलियत को पहचानता हुआ उनके इशारों पर चलने से इनकार कर देता है। बहुत बरगलाए जाने पर भी वह एक नकली विद्रोही की भूमिका अदा करके ‘किसी और का सपना’ पूरा नहीं करता। चतुर, होशियार लोगों द्वारा सीधे-सादे व्यक्ति को ठगे जाने के प्रयास को विफल कर देता है।

‘पागलघर’ नाटक में स्वतंत्र विचार रखने वाले लेखक को सत्ता व्यवस्था, अफसर और पुलिस द्वारा बंदी बना कर वरिष्ठ चिकित्सक की सहायता से पागल सिद्ध कर दिया जाता है, ताकि उसे काबू में रखा जा सके, अन्य लोगों तक उसके विचार न फैल सकें, अपनी राय उससे मनवाई जा सके और अगर वह मानने को तैयार न हो तो धीरे-धीरे उसे नष्ट किया जा सके। राजनीति और सत्ता पर प्रहार करने वाले इस नाटक में सत्ता पक्ष के मन का भय परोक्ष रूप से प्रकट हुआ है कि अगर उनसे भिन्न या स्वतंत्र विचार रखने वालों की तादाद बढ़ गई तो उसके लिए खतरा पैदा हो जाएगा। दूसरों को घोड़ा बना कर स्वयं सवार होने की आकांक्षा इसी भय से पैदा हुई कुंठा है।

‘बापू’ गांधीजी के जीवन के अंतिम दिनों की व्यथा पर केंद्रित एक-पात्रीय नाटक है, जो अपने ढंग का नया प्रयोग है। स्वाधीनता आंदोलन के अपने साथियों- जवाहरलाल, सरदार पटेल, राजाजी, मौलाना, और राजेंद्र बाबू- द्वारा गांधीजी की राय न माने जाने और अहिंसा का रास्ता छोड़ दिए जाने के कारण गांधीजी अपने को अकेला और उपेक्षित महसूस करते हैं। गांधी को बताए बगैर वे लोग बंटवारे की सहमति दे देते हैं, जिसके परिणाम भयंकर रक्तपात में होते हैं। गांधी अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए उपवास कर हिंसा को रोकने में सफल होते हैं, पर दरकिनार कर दिए जाने की पीड़ा उन्हें सालती रहती है। गांधी की आत्मव्यथा के माध्यम से यह नाटक ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर करता है।

इन नाटकों में विषय, भाषा और शिल्प की विविधता और नयापन है। इतिहास, मिथक, पुराकथा और समकालीन जीवन से विषय लेते हुए समाज-व्यवस्था और राजनीति की जटिलताओं और अंतर्विरोधों को बहस, विसंगतियों, व्यंग्य, फैंटेसी, तर्क अंतर्द्वंद्व, आवेगों की तीव्रता और कार्य-व्यापार की सघनता के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। तनावपूर्ण स्थितियों की कुशल योजना से जिस तरह का मानसिक द्वंद्व पात्रों में पैदा किया गया, वह आधुनिक जीवन के यथार्थ की अभिव्यक्ति प्रतीत होता है।

आचार्य के नाटकों की भाषा में दृश्यात्मकता और काव्यात्मकता के साथ-साथ विषय के अनुरूप विविधता है। ‘देहांतर’ और ‘हस्तिनापुर’ की तत्सम प्रधान भाषा है, तो ‘जिल्ले सुब्हानी’ और ‘गुलाम बादशाह’ की फारसी-उर्दू मिश्रित। ‘किमिदम् यक्षम्’ की जटिल स्थितियों के तनाव में गुंथी प्रश्नाकुल भाषा है, तो ‘जूते’, ‘किसी और का सपना’ और ‘पागलघर’ की रोजमर्रा की जिंदगी की भाषा और संवाद शैली। छोटे संवादों में भाव और विचार की सघनता है। केवल ‘बापू’ नाटक ऐसा है, जहां मार्मिक वेदना लंबे विचार प्रधान स्वगत कथनों द्वारा व्यक्त की गई है। क्योंकि उसका उद्देश्य ही निकट अतीत की परतें खोलना और वर्तमान में गांधी को अप्रासंगिक बना दिए जाने की स्थिति को उजागर करना है। कुल मिला कर इन नाटकों के पात्र जटिल होते हुए भी लंबे वक्तव्य नहीं देते। शब्दाडंबर से दूर रहते हुए जीवन संघर्षों से जूझते हैं।

विविध प्रकार की और विविध स्तरों पर मौजूद विसंगतियों के बावजूद ये नाटक पश्चिम के विसंगत नाटक (एब्सर्ड नाटक) नहीं हैं। क्योंकि इनमें अनास्था न होकर आस्था का स्वर है, जो विसंगतियों को नकारता हुआ संगति की जरूरत और समझ पैदा करता है।

रंगशिल्प की दृष्टि से आचार्य के नाटक हिंदी में एक नई शुरुआत सिद्ध हुए हैं। वे भाषा की नाट्यात्मक संभावनाओं को पहचानते हैं। नाटक की संरचना के सूक्ष्मबोध से वह कथ्य की जटिलता को सघनता और गहराई से उभारते हैं। इसके लिए कभी फ्लैश बैक, तो कभी सूच्य संवाद जैसी युक्तियों को अपनाते हैं। इस तरह नाट्यालेख में पाठ के भीतर अंतर्पाठ (सब-टेक्स्ट) को बड़े ही प्रभावपूर्ण और सार्थक ढंग से विकसित करते हैं।

रंगयात्रा: नंदकिशोर आचार्य; सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर; 700 रुपए।

 

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