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कभी-कभार : याद करना

अशोक वाजपेयी याद करना वैसे तो मनुष्य का लगभग नित्य कर्म है: हम हर दिन कुछ न कुछ, किसी न किसी को याद करते हैं। याद अक्सर अराजक और अव्यवस्थित होती है। उसमें कोई सुसंगति नहीं होती। जो लोग लिखते-पढ़ते हैं उनके लिए याद करने का विशेष महत्त्व है: लिखना एक तरह से याद करना […]
Author May 24, 2015 12:01 pm

अशोक वाजपेयी

याद करना वैसे तो मनुष्य का लगभग नित्य कर्म है: हम हर दिन कुछ न कुछ, किसी न किसी को याद करते हैं। याद अक्सर अराजक और अव्यवस्थित होती है। उसमें कोई सुसंगति नहीं होती। जो लोग लिखते-पढ़ते हैं उनके लिए याद करने का विशेष महत्त्व है: लिखना एक तरह से याद करना है। जिसे हम याद करते हैं, घटना या बात या व्यक्ति, उसे अक्सर हम पुनर्जीवित करते हैं- स्मृति पुनर्जीवन भी होती है। जो याद नहीं कर सकता, जिस भी कारण से, उसका जीवन बहुत सीमित होगा। इस याद में कई बार क्लेश, पछतावा, आभार आदि होते हैं। हम अपने अवसर चूकने, समय पर कुछ न कर या कह पाने, कुछ गलत कर जाने, किसी को व्यर्थ आहत करने, किसी की मदद न कर पाने, वक्त गंवाने आदि को भी याद करते हैं और याद कर उनसे थोड़ा-बहुत मुक्त हो जाते या राहत पाते हैं। अपनी नीचताओं, तुच्छताओं, विश्वासघातों, अधूरी रह गई आकांक्षाओं आदि को याद करना त्रासद होता है, पर हम करते हैं। कई बार बरसों किया गया किसी का दुर्व्यवहार हमें आज भी याद आने पर आहत करता है। हम पुरखों, अध्यापकों, दोस्तों, परिजनों को तो याद करते ही हैं, दुश्मनों को भी हम भूल नहीं पाते।

रज़ा फाउंडेशन ने कुछ दिनों पहले इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक शाम तीन चित्रकारों परमजीत सिंह, अमिताव दास और मनु पारेख को आमंत्रित किया अपने दोस्तों को याद करने के लिए। माहौल में अनौपचारिक आत्मीयता थी। तीनों ने बहुत मर्म और कई बार भावुकता के साथ अपने कलाध्यापकों, सहधर्मियों आदि को याद किया। कला-जगत में यों काफी पैसा आ जाने के कारण कड़ी स्पर्धा है और अक्सर कलाकार अपनी बात में सावधानी बरतते हैं। पर उस शाम यह स्पष्ट प्रभाव पड़ा कि वे अपने दोस्तों को याद करने में ये सब भेदभाव भुला सकते हैं और ऐसे मानवीय और कलात्मक प्रसंग याद कर सकते हैं, जिनसे उनके और उनके दोस्तों के संबंधों और बहसों आदि पर प्रभाव पड़ा हो। यह देखना रोचक था कि सभी के आरंभिक कला-जीवन में दोस्तों की, उनके किए-कहे की बड़ी भूमिका थी।

किसी व्यक्ति को उसकी समग्रता में जान पाना हमेशा बहुत कठिन होता है, क्योंकि वह व्यक्ति अपने को कई रूपों और स्तरों पर प्रगट करता है। कला उसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष जरूर होती है। लेकिन वही एकमात्र ध्यान देने योग्य पक्ष नहीं होती। किसी कलाकार के संघर्ष, उत्सुकताओं, शैली, दृष्टि आदि को समझने में बड़ी मदद मिलती है अगर हमें उसके दोस्तों के बारे में भी कुछ प्रामाणिक पता चल सके। ये दोस्त जरूरी नहीं कि कलाकार ही हों। एक कलाकार की जिंदगी बनाने में बहुत से गैर-कलाकारों का भी योग होता है। कला में कलाकार के अलावा कई औरों के जीवन का भी कुछ न कुछ विनिवेश होता है। उसकी जीवनधर्मिता और जीवनदर्शिता दोनों ही इस अतिरिक्त से पोषण पातीं और सशक्त तथा ऊर्जस्वित होती हैं। याद कर हम इस विनिवेश को भी सजीव करते हैं।

कविता का सुख

पिछले कुछ दशकों से कविता के बारे में जो भी लिखा-कहा जाता है, उसमें उससे मिलने वाले सुख का कोई जिक्र प्राय: नहीं होता। यह धारणा ही बहुत पीछे ढकेल दी गई है कि कविता लिखने, पढ़ने-सुनने से कुछ सुख भी मिलता है। अलग तरह का, ऐसा जो सिर्फ कविता यानी शब्द-बिंब-लय से ही संभव है, पर है वह सुख ही। इन दिनों बोलबाला संघर्ष का है, सौंदर्य का नहीं। बल्कि सौंदर्य की अवधारणा को तो हमारी आलोचना से देशनिकाला ही दे दिया गया है। कविता इन दिनों संघर्ष की विधा है, सौंदर्य की नहीं, जबकि वही सदियों से सौंदर्य की विधा रही है। कबीर, तुलसीदास, निराला, प्रसाद, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा आदि सभी अगर संघर्ष के सिलसिले के कवि हैं, तो वे सभी सौंदर्य की परंपरा के भी रचनाकार हैं। संघर्ष का भी सौंदर्य होता है: सौंदर्य का भी संघर्ष होता है।

हाल ही में रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित कविता की एक शाम में चार कवियों को सुनते हुए यह खयाल दिमाग में घूमने लगा। लगभग पचास-साठ श्रोता थे। उनके बारे में यह अनुमान करना कठिन था कि वे संघर्ष की गाथाएं सुन कर द्रवित होने आए होंगे। जो कविताएं सुनाई गर्इं उनमें संघर्ष और सौंदर्य दोनों ही गुंथे हुए थे। वे कविता से उसका अद्वितीय सुख पाने आए थे और उनके चेहरों पर आए भावों से जाहिर था कि उन्हें वह सुख मिल रहा था।

बहुत सारी कविताओं में रोजमर्रा की जिंदगी की घटनाएं, चीजों आदि का बखान या नियोजन था। कविता जो कई अचरज हमें देती है उनमें से एक है कि वह हमें ऐसा कुछ हमारे आसपास दिखा देती है, जिसे हमने पहले लक्ष्य न किया हो। वह उन घटनाओं-प्रक्रियाओं-चीजों-चरित्रों में ऐसे संबंध स्थापित कर या खोज लेती है, जिनका हमें अंदाजा न था। कई बार लगता है कि कविता का असली संघर्ष और सौंदर्य दोनों ही उस शिल्प से आते हैं, जिससे वह साधारण को उजालते हुए ऐसी आभा दे देती है कि वह हमारी स्मृति में अंकित हो जाता है। हम कई बार असाधारण से इस कदर आक्रांत रहते हैं कि हम अपने आसपास, पड़ोस में जो निपट साधारण है उसे अलक्षित करते हैं। कविता हमें साधारण से जोड़ती है: वह हमारी मानवीयता, हमारे ध्यान, हमारी संवेदना आदि का इसी तरह विस्तार करती है या उन्हें गहरा करती है। कविता का असली सुख उस पहचान से उपजता है, जो वह हमें अपने आसपास की, साधारण की अनायास ही कराती रहती है।

यह भी स्पष्ट है कि गद्य ज्यादातर पढ़ने का मामला है, जबकि कविता के अर्थ-मर्म-आशय उसे सुनने से ही बेहतर और आसानी से खुलते हैं। यह तब जबकि आजकल ज्यादातर कविता पढ़ने के लिए लिखी जाती है, सुनने के लिए नहीं। हर कविता एक आवाज होती है और जब वह आवाज सचमुच आवाज के रूप में हमारे सामने आती है तो इस उपस्थिति का सीधा प्रभाव पड़ता है। कविता सिर्फ शब्द और लय का मामला नहीं है, वह ध्वनियों का भी संभार होती है। कविता को सुनने के अगर अवसर अधिक हों तो कविता की समझ भी अधिक बढ़ सकती है।

कुछ इधर-उधर की

कई बार आप बहुत बेतरतीब ढंग से पलटते हैं अपनी स्मृति या डायरी में वह सब कुछ, जिसने आपका ध्यान अपनी ओर खींचा था। आप कुछ विशेष खोज नहीं रहे होते हैं: आप सिर्फ उन सचों को नबेर रहे होते हैं, जो कभी आपकी झोली में आ गिरे थे और जो अब आपके हिस्से में हैं। मार्सेल प्रूस्त ने कहा था: असली जिंदगी, आखिरकार अनावृत्त और आलोकित की गई, सिर्फ वह जिंदगी, जो नतीजतन कही जा सकती है कि असल में जी गई, साहित्य है। अपनी लंबी जिंदगी साहित्य में बिताने और अक्सर निराश रहने वाले मुझ जैसे व्यक्ति को यह उक्ति आश्वस्त करती है कि साहित्य असली जिंदगी है! प्रूस्त ने यह भी कहा था कि जिंदगी में इसका कोई महत्त्व नहीं कि हमने किससे या क्या प्यार किया… हम जिन कठोर और मोटी लकीरों से प्यार की हदबंदी करते हैं जिंदगी के हमारे पूरे अज्ञान से मुमकिन होता है।

अमेरिकी कथाकार-बुद्धिजीवी मेरी मैंकार्थी ने, शायद उस समय के वैचारिक विवादों से त्रस्त होकर, कहा था कि एक खास अर्थ में विचार खलनायक हैं और लोग उनके निस्सहाय शिकार। क्या यह बात आज के भारत पर, हमारे साहित्यिक माहौल पर भी लागू नहीं होती? अचरच होता है यह सोच कर कि चमकते-दमकते भारत का कितना बड़ा हिस्सा ऐसे विचारों की गिरफ्त में है, जिन्हें बेहद पिछड़ा हुआ और स्वतंत्रता-समता-न्याय विरोधी ही कहा जा सकता है। आयरिश कवि शीमस हीनी ने उत्तर आयरलैंड के खूनी अभियान को याद करते हुए कहा था कि विचार किसी व्यक्ति को सूली पर चढ़ा और यंत्रणा दे सकते हैं। बहुत सारी हिंसा, जिसका हमारे समाज में हम रोज ही नंगा नाच देखते हैं, दूसरों के बारे में जिनमें मुख्य रूप से स्त्रियां, दलित और अल्पसंख्यक शामिल हैं, घृणित विचार रखने के कारण ही उपजती है। इतिहासकार ह्यू ट्रेवर-रोपर ने जिस मध्यवर्ग के बारे में कहा था कि उनके उबाऊ सुख, उनकी जिंदगी की अस्वस्थ तुच्छता, उनकी फूहड़ सफलता सभी सच्ची शिक्षा और मूल्यों के अभाव के कारण हैं, वह मध्यवर्ग अब भारत में लगातार फैल-बढ़ रहा है।

इतालवी साहित्यकार लियोपाल्डी का मत था कि दो सत्य हैं, जिन पर लोग भरोसा नहीं करते: एक कि हम कुछ नहीं जानते, दूसरा कि हम कुछ नहीं हैं! तीसरा भी जोड़ लीजिए जो बहुत कुछ दूसरे पर निर्भर करता है कि मृत्यु के बाद उम्मीद करने के लिए कुछ भी नहीं है। इसे शीमस हीनी के इस कथन से जोड़ें: कोई स्वर्ग नहीं है, जो पहले ही गंवाया न जा चुका हो। जो भी कुछ कहो, कुछ नहीं कहो।

अमेरिकी कवि चार्ल्स सिमिक का कहना है कि कविता ऐसी जगह होती है जहां आपका सामना दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रश्नों से होता है। उनके जैसा अनास्थावान व्यक्ति भी, जब-तब, भाषा से परे कुछ महसूस करता है और शक होता है कि आधिभौतिकता की वह संक्षिप्त अनुभूति और अस्ति-नास्ति से साक्षात उन्हें परिभाषित करता है।

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