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मतांतर : हिंदी का हीनताबोध

के विक्रम राव विष्णु नागर ने (24 नवंबर) अंगरेजी भाषाई अखबारों की उचित ही भर्त्सना की है। उनकी समाचार-निरपेक्षता, चलताऊ सोच और सरोकारहीन मानसिकता पहले कभी चुभती थी। अब आम पाठक उनमें न रुचि रखता है, न कोई मायने देखता है। मगर इससे हिंदीभाषी पत्रकारों की कमीज ज्यादा सफेद नहीं हो जाती। इन पत्रकारों की […]
Author November 30, 2014 12:30 pm

के विक्रम राव

विष्णु नागर ने (24 नवंबर) अंगरेजी भाषाई अखबारों की उचित ही भर्त्सना की है। उनकी समाचार-निरपेक्षता, चलताऊ सोच और सरोकारहीन मानसिकता पहले कभी चुभती थी। अब आम पाठक उनमें न रुचि रखता है, न कोई मायने देखता है। मगर इससे हिंदीभाषी पत्रकारों की कमीज ज्यादा सफेद नहीं हो जाती। इन पत्रकारों की पेशेवर मांदगी, कार्यद्वेषी-प्रवृत्ति और समाचार पर चलताऊ सोच से कोई कम को कोफ्त नहीं होती। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कितनी रुचिकर खबरों का टोटा रहता है, इसे संपादक खुद देखते हैं, पर असहाय रहते हैं। पत्रकारीय कौशल कोई उत्पाद नहीं है, जो मॉल-मार्केट से खरीदा जा सके। यह दिमाग से उपजती है।

पिछले चार दशकों से तेलुगू, हिंदी, उर्दू और अंगरेजी दैनिकों के पत्रकारों से निकट और निजी वास्ता रहा, इसलिए मेरे अनुभव-जनित तथ्यों को सुन लिया जाए। उस दौर में मुंबई के बड़े दैनिक नवभारत टाइम्स के चीफ रिपोर्टर की टेबल मुझ अंगरेजी संवाददाता की मेज से बस चंद बालिश्त दूर रहा होगा। वे मेरी रपट की कॉर्बन कॉपी की बड़ी उत्कंठा से बाट जोहते थे। तब हम सबको निर्देश था कि अपनी रपट की पांच कॉपी टाइप करो। एक फाइल के लिए, दो हिंदी और मराठी बंधु-दैनिकों के लिए।

हालांकि मैं कनिष्ठतम कार्मिक था, पर मैंने विरोध व्यक्त किया था कि काम तीन दैनिकों के लिए और वेतन केवल एक से! उस वर्ष दादर में हिंदी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन आयोजित था। नामी-गिरामी हिंदी अदीब राष्ट्र भर से पधार रहे थे। मेरे चीफ रिपोर्टर (एस विश्वम, बाद में दिल्ली के स्टेट्समैन के ब्यूरो प्रमुख) ने आदेश दिया कि केवल चार पैरा यानी मात्र दो सौ शब्दों की रपट हो। मैंने विरोध किया, क्योंकि मैं लखनऊ विश्वविद्यालय के अंगरेजी-हटाओ संघर्ष की उपज था। तो समाचार संपादक ने कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया में एक शब्द का, विज्ञापन के मानक में दर एक रुपया होता है। मैंने नवभारत टाइम्स के चीफ रिपोर्टर (श्रीधर पाठक) से आग्रह किया कि वे भी साथ चलें। वे नहीं आए।

पर लखनवी मन और हिंदीप्रेम का दबाव था। मैंने एक डेढ़ कॉलम की लंबी रपट नागरी लिपी में लिखी। नभाटा में छपी। पर हिंदी वालों की इस अक्षम्य कोताही पर खिन्न होकर मैंने स्थानीय संपादक महावीर अधिकारी और बाद में प्रधान संपादक अक्षय कुमार जैन से अपनी पीड़ा व्यक्त की। सोचता हूं कि अगर मैं केवल स्वाभाविक अंगरेजी पत्रकारीय अहंकार में केवल चार पैरा की रपट की कॉपी नभाटा को देता तो? तब भाषा और वार्ता संवाद समितियां भी नहीं थीं। विष्णु नागर को इस घटना से झलकती मानसिकता पर भी टिप्पणी करनी चाहिए।

अब एक नजदीकी क्षेत्र उत्तर प्रदेश से। तब नागरी का टेलीप्रिंटर भू्रणावस्था में था। हिंदी संवाददाता रोमन लिपि में रपट लिख कर भेजते थे। वे सब बहुधा टूटी, विकृत और अबूझ रह जाती थीं। मुझे इससे व्यक्तिगत हानि होती थी। एक ही टेलीप्रिंटर और हिंदी और अंगरेजी की ढेर सारी खबरें शाम तक भेजनी पड़ती थीं। कविवर सुरेंद्र चतुर्वेदी नभाटा के और मैं टाइम्स आॅफ इंडिया का संवाददाता था। दुर्घटना में उनके निधन के बाद एक अन्य आए। उधर दिल्ली नभाटा का डेस्क बजाय रोमन लिपि में लिखी रपट को बूझ, वह मेरी अंगरेजी की रपट का अनुवाद करना सुगम मानते थे। उधर विलंब से कॉपी मिलने पर दिल्ली न्यूज सर्विस से मुझे डांट पड़ती थी।

तभी मुझे पता चला कि भारत के सरकारी निगम हिंदुस्तान टेलीप्रिंटर ने प्रयोग के तौर पर नागरी लिपि में मशीन बनाई है। तब नभाटा के प्रधान संपादक थे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय। मैं उनके दर्शन के लिए दिल्ली कार्यालय गया था। उनसे विनती की कि वे नागरी का टेलीप्रिंटर किराए पर लगवा लें। अज्ञेयजी ने मेरा अनुरोध मान लिया। समय की बचत हो गई। हिंदीभाषी विधानसभा की अंगरेजी में लिखी रपट की जूठन (हिंदी अनुवाद) नभाटा के पाठकों को भुगतने का कष्ट खत्म हो गया।

मगर यहां विष्णु नागरजी से दो प्रश्न हैं। आज भी कई हिंदीभाषी पाठक चेन्नई, बंगलुरू, हैदराबाद, पणजी, कोचीन आदि में हैं। तो वहां इन बड़े हिंदी दैनिकों का संचार तंत्र ढीला क्यों है? अंगरेजी संवाद समिति पर निर्भरता क्यों? गौर कीजिए, भारतीय अंतरिक्ष यात्री कैप्टन सतीश शर्मा रूस के कास्मोड्रोम से उड़े तो केवल मलयाली दैनिकों के संवाददाता सोवियत रूस के नगर में कवर करने गए थे। हिंदी प्रदेशवासी शर्मा की खबर किसी भी हिंदी दैनिक ने अपने रिपोर्टर से कवर नहीं करवाया था।

यहां मेरा अभिप्राय केवल इतना है कि अंगरेजी भाषाई पत्रकारों की औंधी उत्कर्ष भावना, जो दरअसल, हीन भावना है, पर समय जाया करने के बजाय, आत्मालोचन करें कि हिंदी पाठकों को क्या और कैसे दिया जाए? अनुवाद के रूप में लेख और खबरों की जूठन परोसना बंद हो। यों भी जूठन से दोष आ जाते हैं। अंगरेजी के संक्रामक दोष क्यों अपनाएं? विकलांगता का अहसास क्यों पालें? बच्चों की कहानी दुबारा पढ़ें। कछुआ रेस जीता था।

 

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