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पुस्तकायन : टूटते सपने

पूनम सिन्हा रामधारी सिंह दिवाकर के उपन्यास दाखिल खारिज का कथानायक प्रमोद सिंह प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्ति के बाद शहर की गृहस्थी समेट कर कुछ सपनों के साथ अपने गांव सरायगंज लौटता है। गांव आने पर वह देखता है कि हत्यारे, दुराचारी, बलात्कारी और बाहुबली स्थानीय राजनीति और सरकारी तंत्र को अपने हित में […]
Author May 24, 2015 12:00 pm

पूनम सिन्हा

रामधारी सिंह दिवाकर के उपन्यास दाखिल खारिज का कथानायक प्रमोद सिंह प्रोफेसर पद से सेवा निवृत्ति के बाद शहर की गृहस्थी समेट कर कुछ सपनों के साथ अपने गांव सरायगंज लौटता है। गांव आने पर वह देखता है कि हत्यारे, दुराचारी, बलात्कारी और बाहुबली स्थानीय राजनीति और सरकारी तंत्र को अपने हित में संचालित करते हैं। मनरेगा, इंदिरा आवास योजना, शिक्षा मित्रों की नियुक्ति, जवाहर रोजगार योजना- एक से बढ़ कर एक मालदार योजनाएं हैं। गांव में ‘लाल सेना’ के तथाकथित नक्सली आर्थिक रूप से संपन्न लोगों से ‘लेवी’ वसूलते हैं। प्रमोद बाबू को भी उनकी धमकी मिलती है। प्रमोद बाबू के भाई-भतीजे भी उनके खेत और घर को हड़पने के लिए उन्हें गांव से खारिज करने के यातनादायक कुचक्र में लग जाते हैं।

गांव के लोग अब उन्हें बाहरी आदमी मानते हैं। उनका गांव अब उनके बाबा के जमाने का नहीं रहा। बाजारवाद पूरी धमक के साथ वहां पैर पसार चुका है। अब गांव के किसान भी पहले वाले किसान नहीं रहे। उनकी वेशभूषा, चाल-ढाल और सोच में परिवर्तन हुआ है। बिना पूंजी के अब खेती संभव नहीं। सीमांत किसान भी अब खेती से अधिक फायदा मनरेगा में काम करने में देखते हैं। प्रमोद बाबू का बंटाईदार झमेली राम उनसे कहता है, ‘…खेती को परनाम! जिसके पास पैसा है उसी की है खेती। गरीब आदमी कहां से खरीदेगा खाद-बीज? कहां से करेगा निकौनी-पटौनी? मजदूरी का रेट कितना ऊंचा हो गया है, यह तो आप जानबे करते हैं। सवा सौ रुपए रोज की मजदूरी! तो यह मजदूरी ही क्यों न करें?’

रामधारी सिंह दिवाकर की दृष्टि गांव के यथार्थ और समस्याओं पर केंद्रित है। दो हजार पांच में पंचायतों में आरक्षण लागू हो गया। खवासिन की बहू टिकुली देवी रतनपुरा पंचायत की मुखिया बन गई। गांव के विकास के लिए उसके पास कोष है। ईमानदारी से काम करने का जज्बा भी। आत्मविश्वास से भरपूर टिकुली देवी अपनी सास से कहती है- ‘मां जी ई बाबू साहब मालिक थे आपके समय में, अब नहीं हैं। मुखिया मैं हूं ग्राम पंचायत की।’ जर्जर पुलिया को बनवाने के लिए लोग मुखिया टिकुली देवी के दरवाजे पर जाने में अपनी हेठी समझते हैं।

लेखक ने त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव व्यवस्था, इंदिरा आवास योजना, मनरेगा, बीपीएल सूची, पंचायत शिक्षक नियुक्ति जैसी सारी ग्राम विकास योजनाओं की कड़वी वास्तविकताओं को कथा-सूत्र में गूंथ कर उजागर किया है। रतनपुरा पंचायत की मुखिया टिकुली देवी की ईमानदारी अपवाद स्वरूप है। रामघाट पंचायत की महादलित जाति की सुखिया देवी ने मुखिया बनने के बाद स्कॉर्पियो गाड़ी खरीद ली है। सरायगंज के मुखिया सदानंद यादव ने बोलेरो के अलावा भाड़े पर चलाने के लिए तीन ट्रक खरीद लिए हैं। गांव के डॉक्टर झा प्रमोद बाबू से कहते हैं, ‘आमतौर पर आजकल एक मुखिया की कमाई पांच साल में कम से कम पचास लाख।’ यह है सत्ता के विकेंद्रीकरण का सच।

अर्थशास्त्र के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर प्रमोद सिंह के ग्रामीण जीवन के अर्थशास्त्र में ज्ञान के नए-नए अध्याय जुड़ने लगे। पंचायत चुनाव में स्त्रियों के लिए आरक्षण होने से गांव के अधिकतर घरों के पुरुष अपने-अपने परिवार की स्त्रियों को प्रत्याशी बनाते हैं।

प्रमोद सिंह को अपने घर में काम करने वाली कलिया के बलात्कारियों को गिरफ्तार कराने में एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। उन्हें जान से मार डालने और जयपुर में रह रहे उनके पोते के अपहरण की धमकी दी जाती है। अपने ही गांव में उन्हें पुलिस-सुरक्षा में रहना पड़ता है। अपराधी राजनीतिक और आर्थिक रूप से इतने सक्षम हैं कि वे प्रमोद बाबू का गांव में रहना असंभव कर देते हैं। भाई-भतीजे भी उन्हें गांव से भगाने के तमाम हथकंडे अपनाते हैं। हर धमकी के पहले उनके लिए ‘विद्वान आदमी’ विशेषण तकिया कलाम की तरह लगाया जाता है, ‘आप विद्वान आदमी हैं, अत: चुपचाप गांव में रहिए।’

प्रमोद बाबू का गांव में रहने का सपना टूट जाता है। गांव में पुस्तकालय बनाने का सपना, लिंक कैनाल बनवाने का सपना, जहरीले सराय पोखर को फिर से कमलपोखर बनाने का सपना और हृदय के एकांत कोने में मीठे सपनों की भांति बसी स्कूल के दिनों की संगी ज्योत्स्ना के रोपे हुए वटवृक्ष की छांव में जीवन के सायंकाल में मधुर स्मृतियों में जीने का सपना- सब बिखर गए।

पूंजीवादी उत्पादन ने सारे आत्मीय संबंधों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। गांव छोड़ते समय बड़े बेटे अमरेश का फोन आता है। वह माता-पिता को जयपुर के अपने फ्लैट में रहने के लिए बुलाता है, पर किस शर्त पर? वह कहता है, ‘ऐसा है पापा कि फ्लैट तो मैंने लोन लेकर खरीदा है। हर महीने पंद्रह हजार रुपए किस्त के जमा करने होते हैं। तो पापा, आपको अच्छी-खासी पेंशन मिलती है। आप आराम से आकर फ्लैट में रहें। बस पंद्रह हजार रुपए बैंक की माहवारी किस्त देते रहें।’ ऐसे में ज्योत्स्ना ही छांव देती है। ज्योत्स्ना, जो उसके छोटे पुत्र की सास भी है, दिल्ली के अपने घर में रहने के लिए न सिर्फ आग्रहपूर्वक बुलाती है, बल्कि अपना घर बेटी-दामाद के नहीं, प्रमोद बाबू के नाम करने का आग्रहपूर्ण निर्णय प्रकट करती है।

जीवन की सांध्यवेला में सबसे निकट पत्नी है और: ‘पृष्ठभूमि में थोड़ी ही दूरी पर बरगद का एक छतनार पेड़ था, जिसके साए में धवल वस्त्रों में लिपटी एक स्त्री सागर की लौटती लहरों-सी निर्मल उजली हंसी हंस रही थी।’ गांव के जीवन में भी उन्हें सहयोग देने वालों में मुख्य रूप से स्त्रियां ही थीं- टिकुली देवी, जयमाला देवी, स्कूल के दिनों के मित्र और स्मृतिलोप के मरीज कविजी की पत्नी रामकली देवी। कभी-कभी कथा की अंतर्धारा में उसके गौण प्रसंग या कि आनुषंगिक कथाएं मुख्य कथा के समांतर प्रभावी हो जाती हैं। गांव की समस्याओं के घटाटोप से निकल कर प्रमोद बाबू बाहर आते हैं।

उपन्यास के अंत में यह संकेतित है कि गांव का कुछ भला होना है तो मुखिया टिकुली देवी के माध्यम से। उपन्यासकार ने अगड़ों-पिछड़ों, दलितों और स्त्रियों की समस्याओं और उनके जीवन के यथार्थ को उपन्यास में संवेदना के स्तर पर घटित किया है। कथा-प्रवाह में कुछ घटना-प्रसंगों की पुनरावृत्ति टाली जा सकती थी।

चैती बयार में गेहूं के भूसे की गंध कितनी प्यारी लगती है और चैत की पछिया हवा गेहूं की कटी फसल की ओसौनी के लिए कितनी अनुकूल होती है, यह एक किसान लेखक ही बता सकता है। ओसौनी, गदहवेला, मुड़कट्टी हिसाब, हन-हन करना, हाही, सुद्धा आदमी आदि ग्राम प्रचलित शब्दों और घबहा बूढ़े बैल, कोढ़िया डेराबे थूक से आदि कहावतों के प्रयोग से अभिव्यक्ति-भंगिमा अत्यंत आत्मीय हो उठी है।
दाखिल खारिज: रामधारी सिंह दिवाकर: राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 400 रुपए।

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