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पुस्तकायन : आदिवासी स्त्री के बिंब

रमेश बर्णवाल निर्मला पुतुल अपने नए काव्य-संग्रह ‘बेघर सपने’ में संवेदना के पर्वतीय दुर्गम इलाकों से समतल मैदान की तरफ उतरती नजर आती हैं। उन्होंने हिंदी में आदिवासी कविता को पुख्ता पहचान दिलाई है। वे अपनी कविताओं में आदिवासियों की रूढ़ छवि के बरक्स उनकी प्रामाणिक संज्ञाओं के साथ प्रस्तुत करती हैं। जहां हर संज्ञा […]
Author May 24, 2015 12:00 pm

रमेश बर्णवाल

निर्मला पुतुल अपने नए काव्य-संग्रह ‘बेघर सपने’ में संवेदना के पर्वतीय दुर्गम इलाकों से समतल मैदान की तरफ उतरती नजर आती हैं। उन्होंने हिंदी में आदिवासी कविता को पुख्ता पहचान दिलाई है। वे अपनी कविताओं में आदिवासियों की रूढ़ छवि के बरक्स उनकी प्रामाणिक संज्ञाओं के साथ प्रस्तुत करती हैं। जहां हर संज्ञा एक जीवंत चरित्र है; चाहे वह फूलमनी बेसरा हो जो नौकरी की आस में एक स्वयंसेवी संस्था के पचास वर्षीय प्रमुख के हाथों लगातार तीन साल तक यौन शोषण का शिकार होती रही; सत्रह वर्षीय सोनामुनी हांसदा हो जो उत्तर प्रदेश के एक जनपद में पांच हजार में बेच दी गई; मेलचो मुर्सु हो जो हिजला मेला देख कर लौटते वक्त सामूहिक बलात्कार की शिकार हो गई; मंगरू और बुधवा हों जो भूख और बीमारी से लड़-मर रहे हैं; समरू पहाड़िया हो जिसने इलाज की खातिर राशन कार्ड गिरवी रख दिया है; लुइस मुर्मु हो जिसने थक-हार कर निराश होकर चुप्पी साध ली है। ऐसे कितने ही संघर्षरत चरित्र यातनामय कविता बन गए हैं।

‘आपके शहर में, आपके बीच रहते, आपके लिए’ शीर्षक कविता शहरी मध्यवर्ग की आदिवासियों के प्रति मानसिकता पर सीधी चोट करती है। संरचना की दृष्टि से एक सघन तनावपूर्ण लंबी कविता के रूप में यह हिंदी कविता में एक नया आयाम जोड़ती है। यह अनायास नहीं है कि इस संग्रह की अनेक कविताएं शहरी मध्यवर्ग को संबोधित हैं। वे शहरी मध्यवर्गीय लेखकों की तरह इतिहासप्रसिद्ध आदिवासी वीर नायकों को बांटती नहीं हैं। बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, सिद्धो-कान्हू सभी को उनकी वर्तमान पीढ़ी से जोड़ कर देखती हैं। एक कविता में वे कहती हैं: ‘अंगरेजों के अप्रत्यक्ष उत्तराधिकारी अभी भी/ अपनी मानसिकता के साथ सक्रिय हैं सिद्धो-कान्हू।’

वे चाहती हैं कि आदिवासी तमाशबीन नेताओं और अधिकारियों के सामने रंग-बिरंगी वेशभूषा पहन कर और नाच-गाकर तमाशा न बनें, क्योंकि वे उनकी बहादुरी पर नहीं उनकी मूर्खता और नादानी पर तालियां बजाते हैं। आदिवासियों को दिक करते दिकु यानी बाहरी मध्यवर्ग और उनसे स्वार्थपूर्ण गठजोड़ करने वाले अपने अवसरवादी आदिवासी नेताओं के अलावा उन्होंने अपने घर-समाज और निजी जीवन से जुड़े अनेक आत्मीय जनों को संबोधित करते हुए भी कविताएं लिखी हैं। ये सब मिल कर आदिवासी जीवन और खासकर आदिवासी स्त्रियों के संघर्ष की महागाथा प्रस्तुत करती हैं।

संग्रह की पहली कविता ‘मां’ में कहती हैं: ‘क्या मां सचमुच धरती है/ जो कभी नहीं थकती है।’ ‘मां की घड़ी में/ कुल्ही में बैलगाड़ी की/ चरमराहट से बजती है सुबह की घंटी/ माथे के ऊपर/ टघरते सूरज से बजते हैं बारह/ गाय बकरी के घर लौट आने से शाम/ आकाश में चमकते सप्तऋषि तारों को चमकते देख/ होती है उनके लिए रात।’ तो इसके ठीक विपरीत ‘सबसे डरावनी रात’ कविता में एक मां की अस्तित्व को हिला देने वाली तस्वीर पेश करती हैं, जिसमें ‘नशे में धुत लड़खड़ाती हुई तुमने जोरदार धक्के से/ खोला था मेरा दरवाजा… घुस आई थी कमरे में/ गोरे चिट्टे उस अधेड़ पुरुष के साथ/ फुसफुसाहटों में बोलती हुई… कोई और नहीं/ मुझे जन्म देने वाली मां तुमने/ मुझे एक भेड़िए के हवाले कर दिया’।

‘स्वर्गवासी पिता के नाम पाती’ कविता में पिता की संरक्षणकारी भूमिका और साहस को याद किया गया है। कुछ प्रेम कविताएं भी हैं, जिनमें पुरुष के साथ द्वंद्वात्मक संबंध और समर्पण दोनों व्यक्त हुए हैं। ‘और तुम बांसुरी बजाते रहे’, ‘तुम्हारे हाथ’, ‘जमाने में और भी गम हैं मोहब्बत के सिवा’ और ‘कुछ भी तो बचा नहीं सके तुम’ ऐसी ही कविताएं हैं। संग्रह की सबसे बड़ी ताकत आदिवासी स्त्री संबंधी कविताएं हैं। जहां ‘पहाड़ी यौवना’ कविता में ‘समस्त बदन पट्टू से लपेटे/ माथे पर डाटू बांधे/ पीठ पर किल्टा लिए’ पहाड़ की ओर चल पड़ी किशोरी का वर्णन किया गया है, जो ‘जाती सेब के बागानों में/ वह थकी लौटेगी/ भारी पांव घसीटते/ तोड़ लाएगी वह बेचने के लिए कुछ फल, कुछ लकड़ियां/ कुछ घास लाएगी छील नोच कर घर के पशुओं के लिए भी… खूबसूरत पहाड़िन/ पीठ पर किल्टा में पहाड़-सा समय लिए/ खड़ी है और बंद हो रहे हैं उत्सव के सारे पट…।’

बहुत-सी कविताओं में आदिवासी स्त्री के दर्द, अपमान, संघर्षों, संकल्पों, आशा और निराशा की प्रामाणिक अभिव्यक्ति हुई है। ‘स्त्रियां लिखेंगी अपना इतिहास’, ‘ईश्वर से स्त्रियों की मांग’, ‘अखबार बेचती लड़की’, ‘गजरा बेचने वाली स्त्री’, ‘मिटा पाओगे सब कुछ’, ‘अगर तुम मेरी जगह होते’ आदि ऐसी ही कविताएं हैं। ‘वह जो अक्सर तुम्हारी पकड़ से छूट जा रहा है’ शीर्षक कविता में वे दो विपरीत वर्गों की स्त्रियों का वर्णन करती हैं और उभरती नई स्त्री के बारे में सवाल पूछती हैं- ‘एक स्त्री पीठ पर बच्चा बांधे धान रोप रही है/ दूसरी सरकार गिराने और बनाने में लगी है… एक स्त्री पहाड़ पर रो रही है/ और दूसरी स्त्री/ महल की तिमंजिली इमारत की खिड़की से बाहर/ झांक कर मुस्करा रही है/ ओ कवि गोष्ठी में स्त्रियों पर कविता पढ़ रहे कवियो/ देखो कुछ हो रहा है/ इन दो स्त्रियों के बीच छूटी हुई जगहों में/ इस कहीं कुछ हो रहे को दर्ज करो/ कि वह अक्सर तुम्हारी पकड़ से छूट जाता है।’

विकास का सपना दिखा कर आदिवासियों की जमीन हड़पने और उनको बेजमीन करने की सरकार और देशी-विदेशी कंपनियों की साजिश को अनेक कविताओं में सामने लाया गया है। ‘तुम्हारे एहसान लेने से पहले सोचना पड़ेगा हमें’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं: ‘हमें बाजार उपलब्ध कराना है/ या बाजार को हम तक पहुंचने का देना है रास्ता/ हमीं से हमारे पत्थरों को तोड़वा कर/ शहर ले जाने का इरादा है तुम्हारा/ या दिख गई है किसी नई खदान की संभावना’।

ऐसी कविताओं में झारखंड में हो रही छोटी-बड़ी सभी राजनीतिक हलचलों को देखा जा सकता है। वे खुद को आदिवासियों की एक प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जिस कारण सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति उनकी कविताओं का एक जरूरी सरोकार हो गई है। ‘मैं झारखंड के मानचित्र पर संताल परगना का चेहरा हूं/ मेरी आंखों में उजड़ते जंगलों का बियावान दृश्य है/ पलायन कर रहे लोगों की भीड़ है।’

हालांकि इस संग्रह में ऐसी कविताएं बड़ी संख्या में हैं, जो मुकम्मल कविता नहीं बन पाई हैं। इनमें संवेदना और विचार का काव्यात्मक विकास नहीं हो पाया है। संग्रह में आम, बांस, गदहा, कुत्ते, बिल्ली, बाघ आदि को विषय बना कर लिखी कविताएं किसी कार्यशाला में लिखी होने का आभास देती हैं, जिनमें न सिर्फ कच्चापन है, बल्कि वे मजबूत कवितापन भी नहीं हैं, जिसकी उम्मीद निर्मला पुतुल से हम करते हैं। इनमें कुछ संवेदनात्मक पंक्तियां हैं, कवयित्री का निजी परिवेश भी है, लेकिन तथ्यमूलकता और सपाट वर्णनात्मकता पूरी कविता को समतल कर देती हैं। साथ ही शहरी कवियों की हर चीज को बचाने की चिंता करने वाली टेक पंक्तियां भी हैं। चिंता का आभास देने के बावजूद ये पंक्तियां वास्तविकता का अंतर्द्वंद्व और संवेदना की सघनता प्रस्तुत नहीं करतीं।

इस सबके बावजूद कवयित्री की एक अलग और मजबूत भाषा इस संग्रह में पढ़ी जा सकती है, यथा- ‘आपके लॉन की हरी मखमली घास नहीं है मेरी देह/ दुमका की मिट्टी से बनी झारखंड का पठार हूं मैं’, ‘मेरे लिए दिल/ जंग लगा हुआ ताला है/ और प्रेम-प्यार जैसे शब्द/ जिंदगी की भाग-दौड़ में खो गई चाबी’, ‘हमारी लाशों की र्इंट गारे से/ ऊंची करते रहेंगे घर की दीवारें’, ‘उन्हें यह बात चुभती है पेट में पथरी-सी’, कुछ पलों के लिए/ थम-सी गई है दुनिया/ देखो कहां कुछ हिल रहा है/ पृथ्वी नाचना भूल गई है, सूरज अवाक है’, ‘जुलूस के शोर में तुम्हारी बांसुरी की आवाज गुम हो गई’, ‘अंधेरों से घिरा आदमी लगातार लड़ रहा है/ अपने बाहर और भीतर के अंधेरे से/ और सामने रोशनी से नहाई अट्टालिकाएं हैं/ कि वर्षों से हंस रही हैं उसकी पराजय पर।’

निर्मला पुतुल के पिछले संग्रह की कुछ कविताओं में लोकगीतों की अनुगूंज मौजूद थी। इस संग्रह में उसकी कुछ कमी महसूस होती है। यह संग्रह कुछ अच्छी कविताओं की उपस्थिति के बावजूद उनकी पिछली सफलता नहीं दोहरा पाया है।

बेघर सपने: निर्मला पुतुल, आधार प्रकाशन, एससीएफ-67, सेक्टर-16, पंचकूला, हरियाणा; 150 रुपए।

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