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प्रसंग : अंधाधुंध के राज में

मृणाल पाण्डे पहले मुंबई फिल्म जगत के मशहूर गायक ने कहा कि बढ़ती आबादी वाले महानगरों में रात को फुटपाथ पर कुत्तों की तरह सोने वाले गाड़ियों की आवत-जावत से कुत्तों की मौत ही तो मरेंगे। इसमें वाहन चालक का क्या दोष? फिर हाल में दिल्ली के आला पुलिस अधिकारी का बयान भी अखबारों में […]
Author May 24, 2015 12:15 pm

मृणाल पाण्डे

पहले मुंबई फिल्म जगत के मशहूर गायक ने कहा कि बढ़ती आबादी वाले महानगरों में रात को फुटपाथ पर कुत्तों की तरह सोने वाले गाड़ियों की आवत-जावत से कुत्तों की मौत ही तो मरेंगे। इसमें वाहन चालक का क्या दोष? फिर हाल में दिल्ली के आला पुलिस अधिकारी का बयान भी अखबारों में पढ़ा कि अधिकतर बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं की वजह ‘रोड रेज’ यानी जनसंकुल सड़कों पर उतरे लोगों का गरमी और प्रदूषण से बिगड़ता मानसिक संतुलन है। इस तरह का दोष तो डंडे से नहीं, सिविल समाज और पुलिस संवाद, मनोवैज्ञानिक मशवरे और सामाजिक सुधार से ही मिटाया-कम किया जा सकेगा… आदि।

ईमान से सोचिए, जिस समय सिविल समाज, मीडिया और स्वयंसेवी संगठन सब पर सत्ता की भंवें और बंदूकें तनी हुई हों, क्या जानबूझ कर या अनजाने की गई हिंसा के शिकारों या मृतकों के परिजनों या खुद आपको भी इन तर्कों में कोई दम नजर आता है? हमारी राय में तो इस किस्म की घटनाएं जब लगातार बड़ी तादाद में रात गए ही नहीं, दिनदहाड़े भी होने लगें, तो इसका एक ही मतलब है: लोगों के बीच कानून और न्याय-व्यवस्था की घटती साख से पनपती अराजकता। इसलिए न्याय-व्यवस्था और प्रशासन को मनोवैज्ञानिक तर्कों या सड़कों पर बढ़ती भीड़ के दबाव की बात चला कर अपनी नाकामी छिपाने के बजाय सौ बात की एक बात जो सयाने कह गए, याद करनी चाहिए, ‘परजा नित रोती फिरे, सुनवैया कोउ नांय/ अधाधुंध के राज में गधा पंजीरी खाय।’

वर्ष 2014 में जब सरकार की गतिहीनता ने नागरिकों का आत्मविश्वास एकदम हिला दिया था, देश ने वोट के दम पर केंद्र से राज्यों तक के शासन में फेरबदल लाने का उपयोगी प्रयोग किया। इस प्रयोग से आए बदलाव ने कुछ महीने ठिठके हुए देश को गतिशीलता का सुखद बोध भी दिया। पर एक साल बाद भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अफरातफरी से जूझते कॉरपोरेट तबके ही नहीं, आम जनता के बीच भी नई गतिशीलता के कथित लक्ष्यों को लेकर असमंजस कुलबुलाने लगा है। सत्ता के विकेंद्रीकरण के बजाय अति विकेंद्रीकरण होने से जब मुद्दा कांग्रेस की जगह कौन के बजाय ऐसे गैर-कांग्रेसवाद से भी क्या का बनता जाए तो ठीकरा मीडिया पर क्या फोड़ना?

सरकार के शीर्ष पर भले राजा जनक सरीखा गहन विद्वान क्यों न बैठा हो, भारतीय मतदाता की नजरों में राजगद््दी के परे कानून-व्यवस्था की ठिठकी मशीनरी जो मिथिला को जल कर खाक होने दे, किसी भी सत्ता की सबसे बड़ी कमजोरी है। विगत में भी राजकीय अशासन के दौरों से जब-जब काठ की मिथिलाएं जल कर राख हुर्इं, भारतीय खुद अपने दम पर उस आग से तपे कुंदन बन कर नहीं, किसी न किसी बाहरी ताकत के मुखापेक्षी बन उसका हाथ थाम कर ही जैसे-तैसे उबरे हैं। और तुलसी से लेकर भारतेंदु तक हमारी कई पीढ़ियों ने उसके बाद भोगी पराधीनता के दौर में पाया कि पराधीन मनई को सपने में भी सुख नहीं मिलता।

यूपीए के खिलाफ भी जनता को बड़ी शिकायत यह नहीं थी कि वह बड़े थैलीशाहों की पोषक थी, बल्कि यह कि नाजुक फैसलों के समय उसके नेता तो विदेह राजा जनक की तरह तटस्थ दार्शनिक बने बैठे नजर आते थे और शासन की मशीनरी की जगह चौथ और सरदेशमुखी वसूलने के बाद फौरी तौर से अटका काम करवाने को अधिकृत चंद देसी-परदेसी पिंडारी दस्तों ने ले ली थी।

वह नेता-पुलिस-गुंडा गठजोड़ दिल्ली से मुंबई, बंगलुरु से चेन्नई तक अब भी खास गायब नहीं हुआ। और सरकार हर बार उसके संसद से सड़क तक लगातार दिखते नमूनों के लिए पुराने समाजवादी सेक्युलर सोच, समाज में बढ़ते मनोवैज्ञानिक दबावों, सांस्कृतिक पतन या पर्यावरण में आए बदलावों को ही दोष दे रही है। आरोप तय हो जाए, फिर भी न तो जम कर ज्ञात दोषियों का कानूनों के तहत तुरंत दंड से दमन किया जा रहा है, न क्षितिज पर किसी सुधारवादी न्यायिक, आर्थिक या सांस्कृतिक क्रांति का विहान दिखता है। अपनी गरजती तहरीरों में केंद्र और राज्यों के रिश्तों के आदर्श समन्वय की बात करने वाली यह सरकार भी दाऊद इब्राहीम जैसे डॉन या विदेशों में जमा काले पैसे की वापसी या राम मंदिर की तामीर को कभी हमारे पड़ोसी देशों के असहयोग, तो कभी राज्यसभा में पर्याप्त बहुमत के अभाव की बात कह कर अपनी प्राथमिकता या संभव कामों की सूची से बाहर कर रही है। साफ है कि लोकतंत्र में सुविधावादी तर्क नहीं चलते।

अगर आप उत्तर प्रदेश में किसानी को लेकर सरकार से जनता के असंतोष को जायज बताते हैं, तो फिर हरियाणा या राजस्थान में उसको गलत किस तरह बता सकते हैं? सच तो यह है कि आम आदमी को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की ही तरह राजग यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी बेजमीनों नहीं, छोटे-बड़े उद्योगपतियों और अर्धसंतुष्ट मध्यवर्ग के हितों का पोषक दिखाई देने लगा है। वह उन आतंकियों, नक्सलियों और माओवादियों तक का कस कर दमन नहीं कर पा रहा, जो उसके अनुसार किसी जनमुखी विचारधारा के समर्थक नहीं, बल्कि महज एक लुटेरे किस्म के अराजक दस्ते हैं।

कुशासन को हटा कर सुशासन कायम किया जा सकता है, पर उस संदर्भ में स्वच्छता अभियान, शिक्षक दिवस, सड़क सुरक्षा पखवाड़ा या पुलिस सप्ताह जैसे सीमित सांकेतिक कदम बेकार रहते हैं। क्योंकि दिल्ली, लखनऊ, बंगलुरु, हैदराबाद या चेन्नई की सड़कों पर उजड््ड अराजकता नई सरकार द्वारा भी कई बार अपनी राजनीतिक या कॉरपोरेट मैत्रियों के तहत लगातार पहले की तरह गुपचुप पुचकारी या ढंकी जा रही है। कथनी और करनी के बीच की यही खाई आगे जाकर समाज के हर आय और आयु वर्ग के बीच से नए और अधिक हिंसक अराजक दस्तों को बढ़ावा देती है, जो सड़कों पर हर रोज तमंचे, लोहे के सरिए और र्इंटें थामे महिलाओं, वाहन चालकों, बच्चों, सफाई करते कर्मचारियों तक को कुचलने चले आते हैं।

जो बच्चे आज सड़कों, सार्वजनिक परिवहन, बाजार, हर जगह पुलिस या उनके पाले छुटभैये गुंडों का हनक भरा ठेंगा कानून की पालना करने वालों के सिर पर पड़ते देख बड़े हो रहे हैं, स्कूली प्रार्थनाओं, जनहित में जारी कीमती सरकारी विज्ञापनों और उदात्त नागरिक कर्तव्यों की फेहरिस्त से भी वे क्या सीखेंगे? वे जब दिन-रात फिल्म जगत, राजनीति या आर्थिक दुनिया के दागी बड़े लोगों को टीवी पर बेदाग छुट्टा बन कर जेल से बचते देख रहे हों तो वे भी उद्दंड बनने में ही अपना भला समझेंगे। इसमें भला अचंभा कैसा?

सवाल है कि अगर पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की खराद पर गढ़े गए विकास के ब्लू प्रिंट और नारे सिर्फ संघर्षहीन और मुफ्तिया क्रांति के ही लचर नमूने थे, तो खुद को उससे एकदम फर्क क्रांति का वाहक बताती रही नई सरकार को अपनी सत्ता के पहले साल की उपलब्धियां गिनाने के लिए उनका ही सहारा क्यों चाहिए? विदेशों से भेजी गई शीर्ष विश्व नेताओं के साथ मुलाकातों की खबरें और तस्वीरें अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन सरकार आम नागरिक के आगे घरेलू जमीन पर अपने भ्रष्टाचार निरोध, महंगाई पर लगाम लगाने और सबका साथ सबका विकास में सत्ता के टटके कदमों और उनकी सफलता के कितने उदाहरण हमको गिना सकती है?

यह कहना भी हास्यास्पद लगता है कि कोई एकचालकानुवर्ती केंद्र खुद सत्ता का विकेंद्रीकरण करेगा। दिल्ली की किसी भी माई-बाप सरकार द्वारा मुद्दा महिला सशक्तीकरण का हो या विकेंद्रीकरण का, वह थाल में रख कर जनता को खैरात में नहीं दिया जा सकता। जैसे-जैसे नए-नए मतदाता वर्ग घर-भीतर और अपने राज्य में अपनी लोकतांत्रिक अस्मिता और हकों को लेकर जागरूक होंगे, वैसे-वैसे उन राज्यों की ताकत खुद-ब-खुद बढ़ने लगेगी। और लोकतंत्रीकरण की इसी जैविक प्रक्रिया के दौरान राज्य-दर-राज्य, परिवार-दर-परिवार देश में सत्ता का सार्थक और टिकाऊ विकेंद्रीकरण हो सकेगा। राजनीतिक स्वार्थों के तहत राज्य में किसी भी अकुशल नेतृत्व को विकेंद्रीकरण का उस्तरा थमा दिया गया, तो उससे किस तरह कालांतर में नाक कटने और घोर अराजकता बढ़ने का ही अंदेशा अधिक होता है, इसके उदाहरण खोजने आज हमें दूर नहीं जाना पड़ेगा।

हम राज्यों को ताकत देंगे, हम बेटियों-माताओं का सशक्तीकरण करेंगे यह कहने वालों के लिए, देश चलाने की घड़ी आने पर मात्र ‘मां बेटे की सरकार’ को हटाने का नकारात्मक वादा जनता को बहुत देर पुलकित-चकित नहीं रख सकेगा। लिहाजा, बेहतर हो कि जनता को मई 2015 के बाद भारत में शासन की सारी मशीनरी और संसद में हर बहस का लक्ष्य चौबीसों घंटे साठों मिनट सिर्फ परिवार विशेष या मां-बेटे की जड़ काटने का न दिखे। भूमि अधिग्रहण विधेयक पर जो बहस हमने संसद के बजट सत्र में सुनी, उसका स्वर और तेवर मूलत: अशासन और अराजकता को पनपाने वाली मानसिकता के ही प्रेरक लगते थे। अनुभव बताता है कि दिन-रात बदले की दांतपीस राजनीति और हुकूमत तथा सच्ची समस्याओं की अहंकारी उपेक्षा से राजकीय सत्ता अंतत: राख की ढेरी बन कर ही रह जाती है।

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