December 05, 2016

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नजरिए का सवाल

शुक्लजी ने अपना ‘इतिहास’ एक विशिष्ट नजरिए के साथ लिखा है, जो पूरे मध्ययुग को बाहरी आक्रमण के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं और उसी के संदर्भ में आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल की व्याख्या करते हैं।

Author October 23, 2016 03:00 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

जवरीमल्ल पारख

आज इतिहास संघर्ष का विराट क्षेत्र बना हुआ है। इतिहास का संबंध राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं से ही नहीं, साहित्य और संस्कृति से भी होता है। उनका अपना भी इतिहास होता है। इन इतिहासों से ही एक जाति, एक समाज और एक राष्टÑ का मुकम्मल इतिहास बनता है। इसलिए किसी समाज या राष्टÑ के इतिहास को समझने के लिए साहित्य के इतिहास को समझना भी जरूरी है। साहित्य समाज निरपेक्ष नहीं होता, इसलिए उसका इतिहास भी समाज निरपेक्ष नहीं हो सकता। साहित्य के इतिहास का महत्त्व तभी होता है जब तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ उसके संबंधों को उसकी पूरी जटिलता और अंतर्विरोधों के साथ समझने का प्रयास किया जाता है। रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य के ‘इतिहास’ का महत्त्व इसीलिए है कि वे तत्कालीन परिस्थितियों के साथ साहित्य को जोड़ कर देखते हैं। लेकिन इतने मात्र से यह मान लेना कि इस प्रक्रिया में लिखा गया इतिहास वस्तुपरक और तथ्यपरक होगा, शायद उचित नहीं है। यहां इतिहास लेखक की अपनी दृष्टि और विचारधारा की भी अहम भूमिका होती है। और यह बात शुक्लजी के इतिहास पर ही नहीं, अन्य इतिहासों पर भी लागू होती है।

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की एक लंबी परंपरा रही है, जो फ्रांसीसी विद्वान गार्सां द तासी से शुरू होती है और जार्ज ग्रियर्सन, मिश्रबंधु, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी से होती हुई आजादी के बाद भी कई तरह के इतिहास लेखन के रूप में सामने आती रही है। लेकिन इसके बावजूद सच्चाई यह है कि 1929 में लिखे गए शुक्लजी के इतिहास को ही विश्वविद्यालयों में पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ाया जाता है। यह ‘इतिहास’ वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों तरह के अध्यापकों और आलोचकों के बीच समादृत है। हालांकि समय-समय पर इसकी आलोचना भी होती रही है। शुक्लजी के इतिहास के बाद हिंदी साहित्य के इतिहास के विभिन्न पक्षों पर लिखने वाले हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शुक्लजी की कई मान्यताओं का खंडन किया था। लेकिन उनके काम को उनके शिष्यों ने भी आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा के समर्थन के बाद शुक्लजी का ‘इतिहास’ लगभग कालजयी मान लिया गया है।

शुक्लजी ने अपना ‘इतिहास’ एक विशिष्ट नजरिए के साथ लिखा है, जो पूरे मध्ययुग को बाहरी आक्रमण के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं और उसी के संदर्भ में आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल की व्याख्या करते हैं। यहां तक कि जब वे आधुनिक युग में प्रवेश करते हैं तब हिंदी-उर्दू विवाद को भी इसी दृष्टिकोण से पेश करते हैं। यह दृष्टिकोण शुक्लजी को उस राष्ट्रीय पुनर्जागरण से मिला था, जिसका एक हिस्सा ब्राह्मणवादी पुनरुत्थानवाद के भी गहरे प्रभाव में था। यह महज संयोग नहीं है कि शुक्लजी ने सिद्धों और नाथों के साहित्य को धार्मिक कह कर अपने इतिहास से निष्कासित कर दिया, कबीर सहित निर्गुणपंथी संत परंपरा को न केवल हाशिए पर धकेला, बल्कि उन्हें लोकविरोधी भी बताया, लेकिन इसके विपरीत सवर्ण हिंदू घरों में जिनका ‘रामचरित मानस’ धार्मिक ग्रंथ की तरह पढ़ा और पूजा जाता है, उन्हें लोक मंगल का सबसे बड़ा कवि घोषित किया। प्रगतिशीलता की ब्राह्मणवादी परंपरा ने शुक्लजी की इन सब मान्यताओं पर न सिर्फ मोेहर लगाई, बल्कि इसकी हल्की-सी आलोचना करना भी अपराध घोषित कर दिया गया।

भाषा को लेकर भी हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने मनमानेपन का रवैया अपनाया। हिंदी साहित्य की परंपरा को प्राचीन दिखाने के लिए उन सब भाषाओं के साहित्य को उसमें समाविष्ट किया, जो कथित हिंदी प्रदेशों के अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाती थीं और जिनमें साहित्य भी लिखा जाता था। इनमें मैथिली, अवधी, ब्रज, डिंगल आदि शामिल हैं, लेकिन जब आधुनिक काल में प्रवेश करते हैं तो ये सब भाषाएं हिंदी की बोलियां घोषित कर दी जाती हैं और उनके साहित्य को ‘इतिहास’ से बाहर कर दिया जाता है।  इसी तरह उन्नीसवीं सदी में हिंदी और उर्दू को सांप्रदायिक आधार पर अलगाने की जो कोशिशें हुर्इं और जिनके पीछे एक राजनीतिक मकसद था, उसे साहित्य इतिहास लेखन ने परिपुष्ट कर दिया। यह काम दो स्तरों पर हुआ। एक, हिंदी साहित्य परंपरा ने अपना संबंध इस क्षेत्र की विभिन्न भाषाई साहित्यिक परंपराओं से जोड़ा, जबकि उर्दू ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की। दो, उर्दू और हिंदी ने दो भिन्न लिपियां ही नहीं अपनार्इं, बल्कि दोनों ने एक-दूसरे से बिल्कुल अलग तरह की भाषा गढ़ने की कोशिश की। उर्दू वालों ने तत्सम और देशज शब्दों से परहेज किया और अरबी-फारसी के शब्द और मुहावरे ज्यादा से ज्यादा अपनाए और हिंदी वालों ने अरबी-फारसी के उन शब्दों को भी तिलांजलि देना आरंभ कर दिया, जो लोक व्यवहार में प्रचलित थे। संस्कृत की तत्सम शब्दावली को अपनाने की यह मुहिम छायावादी काव्य में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। प्रेमचंद और प्रगतिशील आंदोलन ने इस संस्कृतनिष्ठता की प्रक्रिया को कुछ हद तक संयमित किया। लेकिन हिंदी साहित्य के विद्वानों और अध्येताओं के बीच ये कभी विवाद के मुद्दे नहीं बने। इसके विपरीत छायावाद को भक्तिकाल के बाद हिंदी का दूसरा स्वर्ण युग कहा गया। इस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को सहजता से स्वीकार कर लिया गया।

नामवर सिंह का यह कहना उचित है कि ‘साम्राज्यवादियों की भेद-नीति के कारण सांस्कृतिक पुनर्जागरण में आरंभ से ही धार्मिक दरार पड़ गई, जिसके प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव से उस युग के बहुत कम विचारक बच सके’। हिंदी साहित्य के अधिकतर इतिहास लेखन पर इसी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की सांप्रदायिक और पुनरुत्थानवादी दृष्टि का गहरा प्रभाव है, जिसकी पहचान करने से प्राय: बचा गया। शुक्लजी या अन्य इतिहासकार रीतिवाद की आलोचना इसी पुनरुत्थानवादी आर्यसमाजी दृष्टि से कर रहे थे। वे राजाओं से अपेक्षा करते थे कि बाहरी आक्रमणकारियों से युद्ध करें, लेकिन जब उनके दौर में प्रेम और शृंगार की कविताएं लिखी जाने लगीं तो उनमें उनकी पतनशीलता ही नजर आई। वे यह भूल गए कि मध्ययुग के कथित बाहरी आक्रमणकारियों को ‘बाहरी’ के रूप में देखना औपनिवेशिक इतिहास लेखन के प्रभाव का नतीजा था। वे यह भी भूल जाते हैं कि इसी ‘पतनशील’ दौर में लघुचित्रकला, संगीतकला, शास्त्रीय गायकी, नृत्य कला आदि विभिन्न कलाओं का भी विकास हुआ था। रीतिकाव्य पर विचार करते हुए इन लौकिक कला परंपराओं के विकास को भी ध्यान में रखा जाता तो पतनशीलता शायद इतनी नहीं चुभती। यही वह दौर भी है जब मिलीजुली सांस्कृतिक परंपरा एक ठोस स्वरूप ग्रहण कर रही थी।

हिंदी साहित्य इतिहास लेखन की सीमा यह भी है कि इसने उन रचनात्मक प्रयासों को खोजने और मान्यता देने की कोई कोशिश नहीं की, जो समाज के पिछड़े और हाशिए पर डाल दिए गए वर्गों द्वारा लिखे गए थे। भक्ति काव्य की निर्गुणपंथी परंपरा को छोड़ दें तो उसके बाद और आधुनिक काल में भी दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य इतिहास से बहिष्कृत रहा और यह अब साहित्य के दलित आंदोलन द्वारा ही सामने आ पा रहा है। इसी तरह मीरां के अलावा पूरे मध्ययुग में किसी हिंदी कवयित्री को साहित्य के इतिहास में जगह नहीं दी गई। यहां मसला नाम गिनाने का नहीं है, वरन उस नजरिए का है, जो दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को तभी गिनती में लेती है, जब वे पुरुष वर्चस्ववादी और ब्राह्मणवादी परंपरा के समर्थन में हों। हिंदी साहित्य की परंपरा को इतिहास में शामिल करते हुए साम्राज्यवाद विरोध और सामंतवाद विरोध को तो ध्यान में रखा गया, लेकिन स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को प्राय: भुला दिया गया।

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First Published on October 23, 2016 3:00 am

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