ताज़ा खबर
 

अप्रासंगिक : संस्कृति के शत्रु

अपूर्वानंद जोसफ कोनार्ड के प्रसिद्ध उपन्यास ‘द सीक्रेट एजेंट: ए सिंपल टेल’ के पात्र वेर्लोक को काम दिया जाता है कि वह अराजकतावादियों के प्रति अंगरेजों की उदासीनता को तोड़ने के लिए ग्रीनविच वेधशाला को बम से उड़ा दे। सौ साल से भी पहले लिखे इस उपन्यास की कथाभूमि और पहले की, यानी 1886 का […]
Author March 22, 2015 07:33 am

अपूर्वानंद

जोसफ कोनार्ड के प्रसिद्ध उपन्यास ‘द सीक्रेट एजेंट: ए सिंपल टेल’ के पात्र वेर्लोक को काम दिया जाता है कि वह अराजकतावादियों के प्रति अंगरेजों की उदासीनता को तोड़ने के लिए ग्रीनविच वेधशाला को बम से उड़ा दे। सौ साल से भी पहले लिखे इस उपन्यास की कथाभूमि और पहले की, यानी 1886 का लंदन है। इसकी याद रॉबर्ट फिस्क को आई अभी ट्यूनिस में इस्लामिक स्टेट द्वारा किए गए हमले पर बात करते हुए।

ग्रीनविच वेधशाला विज्ञान और संस्कृति के बड़े प्रतीकों में एक है। उसको निशाना बना कर उस सभ्यता को ही हिला दिया जा सकता है, जो इस तरह की उपलब्धियों से अपने अस्तित्व की विलक्षणता की घोषणा करती है। उस पर हमले में मनुष्यों की हत्या का इरादा नहीं है।
ट्यूनिस का यह हमला बार्दो के मशहूर संग्रहालय पर हुआ। विडंबना है कि यह हमला उस देश में हुआ, जहां से अरब के वसंत का आरंभ हुआ था। लेकिन अभी तो पूरा अरब प्रदेश रक्तरंजित है। ट्यूनिसिया के इस आक्रमण पर बात करते हुए फिस्क कहते हैं कि यह हुस्नी मुबारक के राज में 1997 में विदेशी सैलानियों पर हुए हमले की नकल है, जिसमें सड़सठ लोगों की जान गई थी। वह हमला लक्सर में साम्राज्ञी हतशेपसूत के स्मारक के बाहर हुआ था।

फिस्क का कहना है कि जान के नुकसान के मामले में वह हमला कहीं अधिक घातक था। लेकिन वे इन दोनों हमलों के बीच के महत्त्वपूर्ण अंतर की ओर ध्यान दिलाते हैं। मिस्र के इस्लामी हमलावरों को उस ऐतिहासिक स्मारक में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह उनके लिए सिर्फ ऐसी जगह थी, जहां विदेशी बड़ी तादाद में मिल सकते थे, जिन पर हमला कर मिस्र की पर्यटन पर टिकी अर्थव्यवस्था को हिलाया जा सकता था। लेकिन पिछले बुधवार के ट्यूनिस के हमले के पहले इस्लामिक स्टेट की ओर से जारी किए गए ट्वीट को पढ़ने से दोनों हमलों का अंतर समझ में आता है। बगदादी के नाम से जारी इस ट्वीट में कहा गया कि यह ट्यूनिसिया के मुसलमानों के लिए अच्छी खबर है और काफिरों और बदगुमान लोगों के लिए सदमा। उन लोगों को ठीक से परिभाषित करते हुए ट्वीट का अंत यों होता है, यह सदमा ‘खासकर उनके लिए जो खुद को सुसंस्कृत कहते हैं।’

बगदादी और इस्लामिक स्टेट का निशाना संस्कृति मात्र है। इसके पहले उसकी ओर से एक वीडियो जारी किया गया, जिसमें इराक के उत्तरी शहर मोसुल के मशहूर संग्रहालय की मूर्तियों और कलाकृतियों को तोड़ते और बर्बाद करते हुए इस्लामिक स्टेट के लोग दिखाई पड़े। वे हथौड़ों और ड्रिलिंग मशीन से उन्हें नष्ट कर रहे थे। निनवा में प्राचीन असीरियन देवप्रतिमाओं को तबाह करते हुए वे दिखाई देते हैं। यह खबर भी थी कि मोसुल के विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उन्होंने किताबों की होली जलाई। वहां के केंद्रीय पुस्तकालय से भी इस्लामी किताबों को छोड़ कर बाकी किताबों को उन्होंने बर्बाद कर दिया। इनमें दुर्लभ पांडुलिपियां भी शामिल थीं।

मोसुल के पुरातत्त्व महाविद्यालय के प्रोफेसर आमिर अल जमाली ने कहा कि यह बहुत भयानक तबाही है। ऐसी तबाही जिससे उबरना मुश्किल है और जिसकी भरपाई नामुमकिन। बताया जाता है कि इराक के बारह हजार पुरातात्त्विक स्थलों में आठ हजार इस्लामिक स्टेट के कब्जे में हैं। यह भी कहा जा रहा है प्राचीन कलाकृतियों को नष्ट करने के अलावा बेचा भी जा रहा है, जिससे अपनी दहशतगर्द मुहिम वह जारी रख सके।

अगर इस्लामिक स्टेट के इस दोमुंहेपन को छोड़ दें, जो एक तरह से अच्छा ही है, क्योंकि इसके चलते कलाकृतियां बच तो जाएंगी, तो भी इस पर चर्चा करना जरूरी है कि संस्कृति मात्र से इस नफरत के मायने क्या हैं।

पुरातात्त्विक स्थल या कलाकृतियां पूरी तरह निस्सहाय हैं। वे अपने लिए वर्तमान के विवेक पर निर्भर हैं। अशोक वाजपेयी ठीक ही कहते हैं कि जब आप किसी संग्रहालय की किसी मूर्ति को देखते हैं तो यह न भूलिए कि वह भी आपको देख रही होती है। आखिर वह आपकी नश्वरता से परिचित जो है। आपसे पहले जाने कितनी पीढ़ियां आर्इं और काल प्रवाह में समा गर्इं और वह पाषाण प्रतिमा स्थिर भाव से मनुष्यता के आवागमन की साक्षी बनी रही। उस प्रतिमा को देखने का अर्थ सही मायनों में यह है कि आप अपने पहले गुजरी हुई शताब्दियों की संवेदना से संवलित हो पाएं। और अपने क्षणिक अस्तित्व की चेतना से भी। इसका अर्थ यह है कि आपमें जिम्मेदारी का एक विनम्र बोध जागना चाहिए। यह जितना वर्तमान या भविष्य के प्रति है उससे कम अतीत के प्रति नहीं।

अतीत की यह चेतना संस्कृति का एक अनिवार्य घटक है। अतीत राष्ट्रीय भौगोलिक सीमाओं से स्वतंत्र होता है। एक प्रकार से संपूर्ण मानवता का अधिकार उस पर होता है। आप आज की राष्ट्र की सीमा के कारण उसके मालिक होने की घोषणा करें और उसके साथ मनमर्जी का बर्ताव करने की आजादी चाहिए, यह आपका दंभ है।

इस्लामिक स्टेट की संस्कृति के प्रति घृणा की व्याख्या कुछ लोग उसे पाश्चात्य संस्कृति कह कर करना चाहेंगे। वे इसे पश्चिम द्वारा अरब जनता के प्रति किए गए अन्याय की प्रतिक्रिया भी कह सकते हैं। लेकिन दोनों ही व्याख्याएं स्वीकार्य नहीं। यह कहना कि निशाना विदेशी सैलानी हैं, कोई बचाव का अच्छा तर्क नहीं। विदेशियों को निशाना बना कर उन्हें स्थानीय जन से विरक्त करने की कोशिश की जा रही है, जिससे इस्लामिक स्टेट पूरी तरह उनका अभिभावक बन कर रह सके।

ट्यूनिस के इस आक्रमण को उसके पर्यटन उद्योग पर आक्रमण माना जा रहा है। लेकिन फिस्क का कहना है कि संस्कृति से घृणा इस हमले की वजह है। यह वही नफरत है, जिसने अफगानिस्तान में बामियान के बुद्धों को ध्वस्त कर दिया था।

कहा जा सकता है कि एक इंसानी जान की कीमत किसी भी पुरातात्त्विक कृति से कहीं अधिक है, और एक मायने में यह ठीक है। लेकिन सीमित अर्थ में ही। क्योंकि अपनी नश्वरता के प्रति सचेत मनुष्य इन कलाकृतियों में अपने समय और अमरत्व को गढ़ता है। काल से सीमित मनुष्य कालातीत की रचना करता है। संस्कृति का एक अर्थ है स्मृति।

आप किसी प्राचीन पुस्तक को पढ़ रहे हों या किसी प्राचीन कलाकृति को देख रहे हों, तो आप दो काल-बिंदुओं पर एक साथ खड़े होते हैं। आपके वर्तमान में वह अतीत प्रवेश करता या हस्तक्षेप करता है और उसे थोड़ा बदल भी देता है। थोड़ा गौर करें तो काल की निरंतरता या उसके प्रवाह का बोध आपको कुछ तरल कर देता है। सुसंस्कृत होने का आशय तरलता की यह संवेदना है।

संस्कृति मनुष्य निर्मित है, कुदरती नहीं। यहां तक कि जो दैवी है, वह भी संस्कृति का ही अंग है। कुदरत को कोई दैवी भाव नहीं सताता। इस्लामिक स्टेट को, जाहिर है, जड़ता चाहिए, तरलता नहीं। उसका मकसद ठेठ दुनियावी है, कोई रूहानी नहीं। इसलिए वह संस्कृति को अपने निशाने पर रखता है। इस रूप में वह हिटलर के मंत्री से अलग नहीं, जिसने कहा था कि संस्कृति शब्द सुनते ही उसका हाथ अपनी पिस्तौल पर चला जाता है।

इस्लामिक स्टेट ने धमकी दी है कि उसका इरादा स्फिंक्स और पिरामिडों को ध्वस्त कर देने का है। स्फिंक्स हम सब के बचपन से, और यह एक तरह का वैश्विक बचपन है, रहस्यमयता का प्रतीक रहा है। स्फिंक्स की पहेलियों के बारे में किसने नहीं सुना और कौन नहीं जानता कि स्फिंक्स की पहेली सुलझा न पाने का क्या हश्र होता है।

इस्लामिक स्टेट की धमकी एक तरह से मानवता मात्र को स्मृतिविहीन कर देने की है। यह पहले के किसी भी हिंसक अभियान के मुकाबले अधिक खतरनाक है। इसे किसी भी तरह रोकना जरूरी है। लेकिन यह कैसे होगा, जब हम सब किसी न किसी तरह स्मृति को नियंत्रित करना चाहते हैं। जब हम स्मृति को अपनी और पराई, देशी और विदेशी के खानों में बांट देते हैं तो इस्लामिक स्टेट के अभियान को एक तरह की वैधता देते हैं।

इस्लामिक स्टेट जब स्मृति संहार अभियान पर निकलेगा तो उसे मालूम होगा कि मानव-संहार से मुश्किल है यह। कोई न कोई टुकड़ा बचा रह जाएगा यह कहानी कहने को और फिर से मानवीय कल्पना को उकसाने को कि वह इस टुकड़े से पूरी मूर्ति बनाए।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.