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मतांतर : भ्रामक गौरव गान

असीम सत्यदेव प्रभाकर श्रोत्रिय के लेख ‘कामायनी की भविष्य दृष्टि’ (जनसत्ता, 15 मार्च) में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि आधुनिक यांत्रिक विकास की बदौलत योजनारहित तरीके से जिस तरह प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है उससे विनाशलीला हो रही है और पृथ्वी का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा […]
Author March 22, 2015 07:28 am

असीम सत्यदेव

प्रभाकर श्रोत्रिय के लेख ‘कामायनी की भविष्य दृष्टि’ (जनसत्ता, 15 मार्च) में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि आधुनिक यांत्रिक विकास की बदौलत योजनारहित तरीके से जिस तरह प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है उससे विनाशलीला हो रही है और पृथ्वी का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा है। इसे जयशंकर प्रसाद की ‘अंत:प्रज्ञा’ पहले ही भांप चुकी थी और ‘देवगणों के विलासी जीवन और उससे उत्पन्न प्रलयकारी विनाश’ के वर्णन के पीछे यही आशय है। प्रभाकर श्रोत्रिय के अनुसार ‘‘प्रसाद ने कामायनी में ‘प्रकृति विमर्श को संस्कृति-विमर्श का रूप दिया। सोच कर तो नहीं, पर कवि की अंत:प्रज्ञा ने पदार्थवादी सभ्यता विमर्श’ से, जिसके पदचाप भारत में तब सुनाई पड़ रहे थे।’’ सवाल है कि कामायनी की शुरुआत देव-जाति के जिस विनाश से होती है, क्या वह मुनाफे के लिए यंत्रों द्वारा प्रकृति के निर्बाध उपयोग का परिणाम है या बात कुछ और है?

मुक्तिबोध का तो अनुमान है कि भारतीय सामंतवाद के पतन की पीड़ा से कामायनी का आरंभ होता है। प्रसाद के सामने भारत के शासकों की विलासिता, यूरोपीय शक्तियों के षड्यंत्रों के प्रति उदासीनता, आपसी झगड़े और अंतत: पराजित होकर अंगरेजों की गुलामी में जकड़े जाने का इतिहास था। उन्होंने देखा कि 1757 में प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला की पराजय के चार वर्ष बाद 1761 में पानीपत का तीसरा संग्राम हुआ, यानी न तो मराठा और न ही अफगानिस्तान के शासक अंगरेजी षड्यंत्र और खतरे की ओर ध्यान दे रहे थे। यह उदासीनता यहां तक पहुंची कि टीपू सुल्तान का साथ न देकर मराठों ने भयंकर ऐतिहासिक भूल की और एक के बाद एक भारतीय राजा-महाराजा अंगरेजों के सामने पराजित होते गए।

भारतीय सामंतवाद की इस विलासिता ने ही ब्रिटिश साम्राज्य के हाथों सारे भारत को गुलाम बनाया। किसी प्रलय से कम विनाशकारी नहीं थी ऐसी पराजय। मुक्तिबोध की पीड़ा यही थी कि कामायनी में कलात्मक सौंदर्य जितनी ऊंचाई पर है, अगर मानवीय मूल्य भी उतनी ऊंचाई पर होता तो यह रचना दुनिया की कालजयी रचनाओं में गिनी जाती। लेकिन प्रसादजी के मनु में उच्च कोटि के मानवीय मूल्य के बजाय एक सामंती शासक के दोष दिखाई देते हैं। मनु अपनी पुत्री की आयु की इड़ा से संबंध बनाने की चेष्टा करते हैं, जनता का शोषण करना चाहते हैं, जनता विद्रोह करती है, पराजित, हताश मनु को श्रद्धा क्षमा करती है।

मुक्तिबोध ने सवाल उठाया कि क्षमाशील नारी के रूप में प्रसादजी ने श्रद्धा को ऊंचे स्थान पर तो बैठा दिया है, पर जनता के प्रति मनु ने जो अन्याय किया, वह केवल श्रद्धा का निजी मामला नहीं है, इसलिए जन-अन्याय के प्रति उसे क्षमा करने का अधिकार भी नहीं है। लेकिन प्रसादजी ने इड़ा के मुकाबले श्रद्धा को ऊंचा स्थान दे दिया है। इन सब कारणों को विश्लेषित करते हुए मुक्तिबोध ने निष्कर्ष दिया कि ‘कामायनी ऊंचाई पर चढ़ते-चढ़ते लुढ़क गई।’

प्रसादजी की कामायनी के बारे में यहां इस तरह दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई देते हैं। प्रसादजी ने यह रचना पिछले सौ वर्षों में हुए भारत के विनाश को लेकर की थी या आगामी सदी में मुनाफे की सत्ता को समर्पित यांत्रिकी द्वारा प्रकृति के अतिदोहन से उत्पन्न संभावित विनाश की कल्पना करके उन्होंने कामायनी लिखी थी? अतीत में हुआ विनाश या भविष्य का संभावित विनाश या इनमें से कुछ भी नहीं? समीक्षक इस विषय में कल्पना के घोड़े मनचाही दिशा में ले जा सकते हैं, पर यहां एक तथ्य की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है-

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियां विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मदद से की जा रही हैं, जिनमें यह स्थापित किया जा रहा है कि 1779 की औद्योगिक क्रांति से हजारों वर्ष पहले से भारत के ऋषिमुनियों को आधुनिक यंत्र निर्माण का ज्ञान था और वे चाहते तो हजारों वर्ष पहले ही भारत में आधुनिक उद्योग बड़े पैमाने पर लग जाते। लेकिन उन्हें पता था कि इससे भयंकर प्रदूषण होगा, पर्यावरण संकटग्रस्त हो जाएगा, इसलिए भारत में हवाई जहाज, रेल, पेट्रोल से चलने वाली कार, स्कूटर-मोटर साइकिल नहीं बनी, फ्रिज नहीं बने, कोयला खानें नहीं बनीं, भारी पैमाने पर लौह उद्योग नहीं खड़ा किया गया, बिजली के तार नहीं लगे, फोन, मोबाइल नहीं प्रचलित हुए, टीवी, रेडियो, पत्र-पत्रिकाओं से जनता को दूर रखा गया। यहां तक कि कृषिप्रधान भारत में ट्रैक्टर नहीं बनाया गया और हल-बैल से खेती होती रही।

इन संगोष्ठियों का विषय ‘प्राचीन भारत में पर्यावरणीय चिंतन’, ‘संस्कृत साहित्य में विज्ञान और पर्यावरण’, ‘प्रकृति-संतुलन और भारतीय मान्यता’ आदि रखे जाते हैं और निष्कर्ष निकाला जाता है कि ‘प्राकृतिक असंतुलन को ध्यान में रखते हुए प्राचीन भारत में भारी उद्योगों का प्रादुर्भाव नहीं हुआ’। इस निष्कर्ष के प्रमाणस्वरूप अग्नि, जल, वायु, पर्वत, नदी, समुद्र, वृक्ष आदि की पूजा-अर्चना में लिखे गए श्लोकों की झड़ी लगा दी जाती है और यह कहा जाता है कि ‘‘भारत प्रकृति का उपासक है विनाशक नहीं, इसलिए भारतवासियों ने भारी उद्योगों वाली सभ्यता ही नहीं बनाई।’’ ऐसे निष्कर्ष अपने पूर्वजों का गौरव नहीं बढ़ाते, बल्कि जाने-अनजाने उनका मजाक उड़ाने का साधन बन जाते हैं। साहित्यकारों और समीक्षकों को इससे बचना चाहिए।

 

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